नरेन्द्र पाण्डेय : इस साल दीपावली आई तो घर के हर कोने में वही पुरानी खुशबू थी — मिट्टी के दीयों की, पकवानों की, और माँ लक्ष्मी के स्वागत की।
अनामिका ने सुबह से ही घर सजाना शुरू कर दिया था, आयुषी ने रंगोली बनाई, और मैं दीयों की कतार सजाते हुए बार–बार मोबाइल स्क्रीन देख रहा था।
हर बार उम्मीद होती — शायद हर्षित का कॉल आ जाए, शायद कह दे – “मैं इस बार अचानक घर आ रहा हूँ।”
पर इस बार वह नहीं आया।
हैदराबाद में उसकी कंपनी का प्रोजेक्ट चल रहा था। आवाज़ में वही अपनापन था, पर बीच में एक दूरी थी — जो इंटरनेट की गति से नहीं, बल्कि समय की दौड़ से बनी थी।
सबकुछ पहले जैसा था — बस एक नहीं थी... माँ।
वो माँ, जो हर बार लक्ष्मी–पूजन से पहले कहती थी —
“दीयों की लौ ऊँची जलनी चाहिए, तभी घर में सुख रहेगा।”
अब वह आवाज़ नहीं गूँजती, पर वह एहसास अब भी हर दीपक में जलता है।
जब दीये जलते हैं, तो बाहर का अंधेरा मिटता है,
पर कुछ अंधेरे ऐसे होते हैं जो भीतर बस जाते हैं —
और उन्हें मिटाने के लिए कोई तेल, कोई बाती काफी नहीं होती।
इस बार वही अंधेरा था — माँ की याद का।
हर्षित ने वीडियो कॉल किया। स्क्रीन पर उसकी मुस्कान में अपनापन था, पर उस पार का अकेलापन भी साफ़ दिख रहा था।
अनामिका ने आरती की थाली उठाई और बोली — “चलो, हर्षित को आरती दिखा देते हैं।”
मैंने देखा — पूजा पूरी हुई, दीये जले, पर मन का एक दीया बुझा ही रहा।
दीवाली हमें हर साल यह याद दिलाती है कि घर की सबसे बड़ी सजावट रिश्तों की गर्माहट है।
फेयरी लाइट्स से कहीं ज़्यादा रोशनी तब होती है जब परिवार के लोग एक साथ हँसते हैं,
जब माँ की रसोई से वही पुरानी खुशबू आती है,
जब पिता की आँखों में संतोष झलकता है कि — “सब घर पर हैं।”
माँ जब थी, तब दीवाली केवल उत्सव नहीं थी — एक परंपरा थी,
जिसमें स्नेह, अनुशासन और अपनापन घुला होता था।
वो पूजा की थाली में कपूर जलाते हुए कहती —
“बुराई बाहर नहीं, भीतर से मिटाओ।”
हम सब लक्ष्मी के आगमन की कामना करते हैं,
पर असली लक्ष्मी वही होती है जो संतोष बनकर घर में रहती है।
अनामिका की थकान भरी मुस्कान में,
आयुषी के अधूरे प्रश्नों में,
और हर्षित की स्क्रीन पर झलकती आँखों में — वही सच्ची समृद्धि दिखी।
क्योंकि धन से ज़्यादा जरूरी है वो लोग, जिनके साथ उसे बाँटा जा सके।
जब पूजा खत्म हुई, अनामिका ने एक दीया बालकनी में रखा और बोली —
“ये दीया हर्षित के लिए।”
मैंने देखा — वह छोटा–सा दीया हवा में डोल रहा था, पर बुझा नहीं।
शायद यही जीवन का अर्थ है —
परिवार का कोई सदस्य भले दूर हो,
पर प्रेम की लौ अगर भीतर जल रही हो —
तो घर कभी अंधेरे में नहीं रहता।
दीवाली खत्म हो जाएगी, दीये बुझ जाएंगे,
पर माँ की याद, बेटे की मुस्कान, पत्नी का स्नेह, बेटी की रंगोली —
ये सब मिलकर एक ऐसा उजाला बनाते हैं जो समय के पार चला जाता है।
क्योंकि दीवाली का असली अर्थ यही है —
रोशनी केवल बाहर नहीं, भीतर भी जलनी चाहिए।
नरेन्द्र पाण्डेय