पिता की जिद, बेटे का प्यार और एक मुलाकात जिसने सब बदल दिया


"मैं मर जाऊंगा, लेकिन उस लड़की को इस घर की बहू नहीं बनने दूंगा।"

बैठक में गूंजती यह आवाज सुनकर घर की दीवारें तक कांप उठी थीं।

महेश त्रिपाठी का चेहरा गुस्से से लाल था।

सामने उनका बेटा अर्नव खड़ा था।

उसकी आंखों में भी पहली बार विद्रोह दिखाई दे रहा था।

"पापा, मैं आपको पहले भी बता चुका हूं। मैं अनाया से प्यार करता हूं और शादी भी उसी से करूंगा।"

"तो कर लो..." मगर वह लड़की मेरे घर में बहू बन कर नहीं आएगी, यह मेरा अंतिम निर्णय है.’’

महेश लगभग चिल्ला पड़े।

तो ठीक है, नहीं लाऊंगा इस घर में उसे. आप बस धर्मजाति को पूजते रहना

"हाँ और इस घर से कोई रिश्ता मत रखना।" महेश झल्लाकर बोले

अर्नव पैर पटकते हुए अपना बैग उठा कर औफिस चला गया.

कमरे में सन्नाटा छा गया।

मां सुमन की आंखों में आंसू थे। उसने महेश से कहा आखिर एक बार अनाया से मिल तो लो, पढ़ीलिखी है. अर्नव के औफिस में ही अच्छे पद पर है, सिर्फ दूसरी जाति का होना तो कोई अवगुण नहीं है.

महेश गुर्राए, ‘‘तुम चुप रहो, तुम ने ही अर्नव को शह दी है, देख लूंगा मैं उसे.’’

छोटी बहन आर्या सहमी हुई खड़ी थी।

महेश अब अक्सर अर्नव के लिए लड़की देखते रहते. अर्नव का मूड अकसर खराब ही रहने लगा था. सुमन भी स्वभाव से विनम्र, हंसमुख और होनहार बेटे की उदासी देख कर उदास ही रहती. आर्या भी सहमी सहमी गुमसुम सी रहती महेश सुबहशाम ताना देते, ‘‘इस घर में मेरी मरजी चलती है, यहां रहना है तो मेरे हिसाब से रहना पड़ेगा.

अर्नव ने कुछ पल तक पिता की तरफ देखा।

फिर शांत स्वर में बोला—

"पापा, आपने हमेशा मुझे सच बोलना सिखाया है। आज सच बोल रहा हूं। मैं अनाया को नहीं छोड़ सकता।"

"और मैं अपनी जाति, अपने संस्कार और अपने समाज के सामने सिर नहीं झुका सकता।"

"समाज मेरी जिंदगी है.

और अनाया मेरी, मुझे आप लोगो का आशीर्वाद चाहिए समाज का नहीं?"

महेश की मुट्ठियां भींच गईं।

"बहुत जबान चलने लगी है तुम्हारी।"

"जुबान नहीं पापा, अपनी जिंदगी के बारे में फैसला लेने की कोशिश कर रहा हूं।"

"जब तक इस घर में हो, फैसला मैं करूंगा।"

अर्नव मुस्कुराया।

लेकिन उस मुस्कान में दर्द था।

"शायद इसी वजह से मुझे यह घर छोड़ना पड़ेगा।"

सुमन चीख पड़ीं—

"अर्नव!"

लेकिन तब तक देर हो चुकी थी।


उस रात अर्नव ने अपना बैग पैक किया।

मां उसके कमरे में आईं।

"बेटा, मत जा।"

अर्नव ने मां का हाथ पकड़ लिया।

"मां, मैं पापा से नफरत नहीं करता। लेकिन हर दिन अपमान सुनकर जी भी नहीं सकता।"

"वो तुम्हारे पिता हैं।"

"जानता हूं। और शायद इसी वजह से इतने साल चुप भी रहा।"

उसने मां को गले लगा लिया।

दोनों रो रहे थे।

दरवाजे के बाहर खड़े महेश सब सुन रहे थे।

लेकिन उनका अहंकार उनके प्यार से बड़ा हो चुका था।


दिन बीतने लगे।

अर्नव शहर के दूसरे हिस्से में किराए के फ्लैट में रहने लगा।

वह नौकरी करता।

दोस्तों के साथ समय बिताता।

अनाया से मिलता।

धीरे-धीरे जीवन पटरी पर लौटने लगा।

लेकिन उधर महेश का जीवन बदलने लगा था।

हर सुबह चाय के साथ बेटे की खाली कुर्सी दिखाई देती।

रात को खाने की मेज पर सन्नाटा बैठा रहता।

कभी जिस घर में हंसी गूंजती थी, वहां अब केवल बहसों की यादें बची थीं।

फिर भी महेश मानने को तैयार नहीं थे।


एक दिन गुस्से में उन्होंने अखबार में विज्ञापन छपवा दिया।

"मैं अपने पुत्र अर्नव त्रिपाठी को अपनी चल-अचल संपत्ति से बेदखल करता हूं।"

पूरा शहर यह खबर पढ़ रहा था।

रिश्तेदार फोन कर रहे थे।

कुछ लोग सलाह दे रहे थे।

कुछ मजे ले रहे थे।

लेकिन सबसे ज्यादा टूटी थीं सुमन।

उन्होंने पहली बार पति से कहा—

"आप जीतना क्या चाहते हैं?"

महेश चौंक गए।

"क्या मतलब?"

"बेटे को खोकर सम्मान मिलेगा?"

महेश चुप रह गए।


कुछ महीने बाद बेटी आर्या के लिए रिश्ता आया।

बहुत अच्छा परिवार था।

महेश पूरे आत्मविश्वास के साथ पहुंचे।

बातचीत अच्छी चली।

फिर लड़के के पिता ने अचानक पूछा—

"आपका बेटा अर्नव है ना?"

महेश का चेहरा उतर गया।

"जी।"