2047 तक 5.8 ट्रिलियन डॉलर का हो सकता है भारत का रियल एस्टेट बाजार, घरेलू निवेशकों की बढ़ी ताकत


नई दिल्ली। भारत का रियल एस्टेट बाजार आने वाले वर्षों में अर्थव्यवस्था के प्रमुख विकास क्षेत्रों में शामिल हो सकता है। ANAROCK और FICCI की रिपोर्ट 'द चेंजिंग लैंडस्केप ऑफ रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट' के मुताबिक, वर्ष 2025 में भारतीय रियल एस्टेट बाजार का आकार करीब 600 अरब डॉलर था। अनुमान है कि 2030 तक यह बढ़कर 1 ट्रिलियन डॉलर और 2047 तक 5.8 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है।

रिपोर्ट में निवेश के बदलते स्वरूप को भी रेखांकित किया गया है। अब विदेशी निवेशकों के साथ घरेलू फंड्स की भूमिका भी तेजी से बढ़ रही है। इसके अलावा, निवेशकों का रुझान पारंपरिक आवासीय और व्यावसायिक संपत्तियों से आगे बढ़कर डेटा सेंटर, लॉजिस्टिक्स, वेयरहाउस और होटल जैसे क्षेत्रों की ओर बढ़ रहा है।


छह बड़े आर्थिक झटकों के बाद भी मजबूत हुआ बाजार

पिछले दो दशकों में भारतीय रियल एस्टेट बाजार को कई आर्थिक और नीतिगत चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इनमें 2008-09 का वैश्विक वित्तीय संकट, 2011 से 2013 के बीच नीतिगत सुस्ती, नोटबंदी, RERA-GST से जुड़े बदलाव, 2018-19 का NBFC संकट, कोरोना महामारी और 2022-23 में ब्याज दरों में बढ़ोतरी शामिल हैं।

इन चुनौतियों के बावजूद रियल एस्टेट में निजी इक्विटी यानी प्राइवेट इक्विटी (PE) निवेश ने लंबी अवधि में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की।

रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2009 में इस क्षेत्र में PE निवेश घटकर 1.1 अरब डॉलर रह गया था, जबकि 2017 में यह बढ़कर 7.7 अरब डॉलर तक पहुंच गया। वर्ष 2025 में निवेश 6.9 अरब डॉलर रहा। वहीं, 2026 के पहले नौ महीनों में ही 6.1 अरब डॉलर का PE निवेश दर्ज किया गया। इस दौरान कुल 55 सौदों का खुलासा हुआ, जिनमें डेटा सेंटर क्षेत्र में 2.5 अरब डॉलर और ऑफिस प्रॉपर्टी में 1.7 अरब डॉलर का निवेश शामिल था।


घरेलू निवेशकों की भूमिका में 6.4 गुना वृद्धि

भारतीय रियल एस्टेट बाजार में घरेलू पूंजी की बढ़ती भागीदारी रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्षों में से एक है।

वर्ष 2020 में भारतीय घरेलू फंड्स ने रियल एस्टेट में 0.4 अरब डॉलर का PE निवेश किया था। वर्ष 2025 में यह बढ़कर 1.8 अरब डॉलर हो गया। वहीं, 2026 के पहले नौ महीनों में घरेलू फंड्स का निवेश 2.6 अरब डॉलर तक पहुंच गया।

इस प्रकार, 2020 की तुलना में 2026 के पहले नौ महीनों में घरेलू फंड्स का निवेश करीब 6.4 गुना हो गया। रिपोर्ट के मुताबिक, इस अवधि में कुल PE निवेश में घरेलू फंड्स की हिस्सेदारी लगभग 42 प्रतिशत रही।

दूसरी ओर, 2021 से 2025 के बीच विदेशी PE निवेश में औसतन करीब 19 प्रतिशत सालाना वृद्धि दर्ज की गई। इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय रियल एस्टेट में विदेशी और घरेलू, दोनों तरह की पूंजी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।


मुंबई और बेंगलुरु में निवेश का दबदबा

रियल एस्टेट निवेश के मामले में देश के बड़े महानगरों की स्थिति अब भी मजबूत बनी हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2021 से 2025 के बीच मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन (MMR) को कुल PE निवेश की वैल्यू का 49 प्रतिशत मिला, जबकि बेंगलुरु की हिस्सेदारी 18 प्रतिशत रही।

हालांकि, निवेश का दायरा अब छोटे शहरों तक भी फैल रहा है। टियर-2 शहरों में PE निवेश के सौदों की संख्या 2016 से 2020 के बीच 11 थी, जो 2021 से 2025 के दौरान बढ़कर 20 हो गई। इसी अवधि में निवेश के लिए शामिल शहरों की संख्या आठ से बढ़कर 12 हो गई।

इसके बावजूद कुल PE निवेश की वैल्यू में टियर-2 शहरों की हिस्सेदारी अभी केवल 3 से 4 प्रतिशत है। यानी निवेश के लिहाज से महानगरों का दबदबा कायम है, लेकिन छोटे शहरों में विस्तार की संभावनाएं बढ़ रही हैं।

होटल और हॉस्पिटैलिटी क्षेत्र में भी छोटे शहरों की भूमिका बढ़ने के संकेत हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 2026 की पहली छमाही में नए ब्रांडेड होटल कमरों में से 45 प्रतिशत टियर-3 और टियर-4 शहरों के लिए निर्धारित किए गए थे।


डेटा सेंटर और लॉजिस्टिक्स बने निवेश के नए केंद्र

भारतीय रियल एस्टेट में निवेश का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अब निवेशक केवल आवासीय संपत्तियों और ऑफिस बिल्डिंग तक सीमित नहीं हैं। डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ डेटा सेंटर और ई-कॉमर्स एवं आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े लॉजिस्टिक्स तथा वेयरहाउसिंग क्षेत्रों में भी निवेश बढ़ रहा है।

रिपोर्ट के मुताबिक, 2021 से सितंबर 2026 के बीच हुए कुल 33.5 अरब डॉलर के PE निवेश में इंडस्ट्रियल और लॉजिस्टिक्स क्षेत्र की हिस्सेदारी 11.5 प्रतिशत रही, जबकि डेटा सेंटर की हिस्सेदारी 9.2 प्रतिशत थी।

इसके मुकाबले 2013 से 2020 के दौरान इन दोनों क्षेत्रों की संयुक्त हिस्सेदारी केवल 3.4 प्रतिशत थी।

दूसरी ओर, रेजिडेंशियल प्रॉपर्टी में PE निवेश की हिस्सेदारी 2013-2020 के 34 प्रतिशत से घटकर 2021 से सितंबर 2026 के दौरान 21 प्रतिशत रह गई।

हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि आवासीय संपत्तियों की मांग घट रही है। रिपोर्ट के अनुसार, इस क्षेत्र में निवेश के स्रोत बदल रहे हैं और घरेलू फंड्स सहित वित्तपोषण के अन्य माध्यमों की भूमिका बढ़ रही है।


निर्माणाधीन संपत्तियों की वैल्यू 503 अरब डॉलर

रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में भारत में निर्माणाधीन रियल एस्टेट संपत्तियों की कुल अनुमानित वैल्यू 503 अरब डॉलर थी। इसमें आवासीय संपत्तियों की वैल्यू 430 अरब डॉलर रही, जो कुल मूल्य का लगभग 85 प्रतिशत है। वहीं, कमर्शियल प्रॉपर्टी की वैल्यू 73 अरब डॉलर आंकी गई।

वर्ष 2019 में निर्माणाधीन रियल एस्टेट संपत्तियों की कुल वैल्यू 267 अरब डॉलर थी। इस तरह छह वर्षों में इसमें उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।

रिपोर्ट में यह भी अनुमान लगाया गया है कि भारत की GDP में रियल एस्टेट क्षेत्र का योगदान 2017 के लगभग 6 प्रतिशत से बढ़कर 2030 तक 13 प्रतिशत हो सकता है।


भविष्य में कहां बनेंगे निवेश के अवसर?

रिपोर्ट के आकलन के अनुसार, आने वाले वर्षों में भारतीय रियल एस्टेट बाजार में घरेलू निवेशकों की भूमिका और बढ़ सकती है। डेटा सेंटर, लॉजिस्टिक्स, वेयरहाउस, होटल और अन्य ऑपरेशनल एसेट्स में निवेश के नए अवसर उभर रहे हैं।

इसके साथ ही टियर-2 शहरों और महानगरों के बाहरी क्षेत्रों में भी रियल एस्टेट गतिविधियां बढ़ने की संभावना है।

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