scgnews (लाइफ वर्सिटी) : आज के डिजिटल दौर में कंटेंट सिर्फ मनोरंजन नहीं रह गया, बल्कि समाज के सोचने के तरीके को गढ़ने वाला सबसे बड़ा माध्यम बन चुका है। लेकिन जब यही कंटेंट सवालों के घेरे में आ जाए, तो बहस जरूरी हो जाती है। हाल ही में सरके चुनर तेरी सरके को लेकर उठा विवाद इसी बहस का केंद्र बन गया है। इस गाने में नोरा फतेही और संजय दत्त की मौजूदगी ने इसे और ज्यादा चर्चा में ला दिया। फिल्म केडी: द डेविल का यह आइटम नंबर रिलीज होते ही सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, लेकिन तारीफ से ज्यादा आलोचना ने इसे घेर लिया।
आधा एक्शन, पूरा सवाल
मेकर्स ने बढ़ते विवाद के बाद इस गाने का हिंदी वर्जन यूट्यूब से हटा लिया, लेकिन सवाल यह है कि जब कंटेंट पर आपत्ति है तो बाकी भाषाओं में यह अब भी क्यों मौजूद है? यह कदम किसी ठोस संवेदनशीलता से ज्यादा "डैमेज कंट्रोल" जैसा नजर आता है। राष्ट्रीय स्तर पर भी मामला पहुंचा, जब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस पर नोटिस जारी किया। शिकायत में कहा गया कि यह गाना न सिर्फ अश्लीलता को बढ़ावा देता है, बल्कि महिलाओं को एक वस्तु की तरह पेश करता है।
आइटम नंबर: परंपरा या समस्या?
बॉलीवुड में आइटम नंबर कोई नई बात नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हम दशकों से चली आ रही इस परंपरा को बिना सवाल किए स्वीकार करते जा रहे हैं? दबंग 2 का गाना फेविकोल से पहले भी इसी तरह के विवादों में रहा था। उस वक्त भी महिलाओं के ऑब्जेक्टिफिकेशन को लेकर बहस हुई थी। लेकिन आज का कंटेंट उससे एक कदम आगे निकल चुका है—जहां इशारों की जगह सीधे शब्दों में भद्दापन परोसा जा रहा है।
असली दोषी कौन?
हम अक्सर स्क्रीन पर दिखने वाले चेहरों—एक्ट्रेस या डांसर्स—को जिम्मेदार ठहरा देते हैं। लेकिन असली सवाल उन शब्दों का है, जो इस कंटेंट की आत्मा होते हैं। इस गाने के लिरिक्स रकीब आलम ने लिखे हैं, जो पहले ऊ अंतावा ऊ ऊ अंतावा जैसे चर्चित गानों से जुड़े रहे हैं। यह वही गाना था, जिसने "मेल गेज" पर बहस छेड़ी थी। लेकिन "सरके चुनर" के मामले में बहस सिर्फ नजरिए की नहीं, बल्कि भाषा और सोच के स्तर तक पहुंच गई है।
दिलचस्प बात यह है कि इंडस्ट्री के भीतर से भी इस तरह के कंटेंट पर विरोध सामने आया है। अरमान मलिक ने इस गाने को सॉन्ग राइटिंग के गिरते स्तर का उदाहरण बताया। वहीं, पहले श्रेया घोषाल जैसे कलाकार भी ऐसे गानों को गाने से इनकार कर चुके हैं, क्योंकि उन्हें इसके शब्दों से आपत्ति थी।
युवाओं पर असर
सोशल मीडिया ने इस गाने को वायरल भी किया और उसी तेजी से इसकी आलोचना भी। यही इस युग की सबसे बड़ी विडंबना है—जिस प्लेटफॉर्म से कंटेंट फैलता है, वहीं से उसका विरोध भी उठता है। लेकिन क्या यह विरोध स्थायी बदलाव ला रहा है? या फिर हर विवाद के बाद हम कुछ दिन शोर मचाकर आगे बढ़ जाते हैं?
आज की पीढ़ी कंटेंट को सिर्फ देखती नहीं, बल्कि उससे प्रभावित भी होती है। जब बार-बार महिलाओं को एक "आइटम" के रूप में पेश किया जाता है, तो यह सोच धीरे-धीरे सामान्य बन जाती है। यह सिर्फ एक गाने का मुद्दा नहीं है, बल्कि उस मानसिकता का आईना है, जो मनोरंजन के नाम पर परोसी जा रही है।
जिम्मेदारी किसकी?
क्या सिर्फ कलाकार जिम्मेदार हैं? या फिर लेखक, निर्देशक, निर्माता—सभी को बराबर जवाबदेह होना चाहिए? अगर तारीफ सभी को मिलती है, तो आलोचना भी सभी को मिलनी चाहिए। क्योंकि कंटेंट सिर्फ स्क्रीन पर नहीं रहता, वह समाज के दिमाग में जगह बनाता है।
"सरके चुनर" विवाद हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम मनोरंजन के नाम पर हर चीज स्वीकार करने लगे हैं?
जरूरत सिर्फ गानों को हटाने की नहीं, बल्कि सोच को बदलने की है। क्योंकि जब शब्द बदलेंगे, तभी समाज का नजरिया बदलेगा।
और शायद तभी मनोरंजन, सच में मनोरंजन रह पाएगा—मानसिक प्रदूषण नहीं।