Gen Alpha की राजनीति — अगली पीढ़ी के दिमाग में कौन लिखेगा भारत का राजनीतिक भविष्य?


आज का बच्चा… कल का भविष्य है।
जिसके हाथ में आज मोबाइल है, कल उसी हाथ में लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत—वोट होगा।
सरकार अपने वादों से उसे प्रभावित करेगी… विपक्ष अपने आंदोलनों से… और सोशल मीडिया अपनी विचारधारा से।
मोदी का “दिमागी नक्सल” हो या राहुल गांधी का सड़क पर धरना—ये सिर्फ आज की राजनीति नहीं है।
ये अगली पीढ़ी के दिमाग में राजनीति की जमीन तैयार करने की लड़ाई है। सवाल है— Gen Alpha को कौन प्रभावित करेगा… और क्या वह खुद सोचेगा?
यही विषय आज के चिंतन का ........


नरेन्द्र पाण्डेय : भारतीय राजनीति में इस समय एक बदलाव बहुत तेजी से हो रहा है। यह बदलाव केवल सत्ता और विपक्ष के बीच नहीं है, बल्कि पीढ़ियों के बीच राजनीति की भाषा बदलने का बदलाव है।

एक तरफ सरकारें युवाओं को रोजगार, शिक्षा, तकनीक, स्टार्टअप, मुफ्त प्रशिक्षण, आर्थिक अवसर और विकसित भारत जैसे सपने दिखा रही हैं। दूसरी तरफ विपक्ष सड़क पर उतरकर युवाओं के सवालों को राजनीतिक आंदोलन में बदलने की कोशिश कर रहा है।

21 अगस्त 2026 को दिल्ली में राहुल गांधी का पुलिस स्टेशन के बाहर धरना इसी बदलते राजनीतिक परिदृश्य का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। पैलेट से घायल छात्र की शिकायत पर FIR दर्ज कराने की मांग को लेकर राहुल गांधी कई घंटे धरने पर बैठे और इसके बाद दिल्ली पुलिस ने FIR दर्ज की। कांग्रेस ने इसे जनदबाव की जीत बताया, जबकि भाजपा ने इसे राजनीति और व्यवस्था पर दबाव बनाने की रणनीति करार दिया। सवाल यह नहीं है कि इस घटना में राजनीतिक जीत किसकी हुई। सवाल यह है कि इसे देखने वाली अगली पीढ़ी ने क्या सीखा? यहीं से Gen Alpha की राजनीति शुरू होती है।

Gen Alpha सामान्यतः 2010 के बाद जन्मी पीढ़ी को कहा जाता है। आज इसका बड़ा हिस्सा अभी वोट देने की उम्र में नहीं पहुंचा है। लेकिन यही बात इसे राजनीतिक दलों के लिए और महत्वपूर्ण बनाती है।

क्योंकि राजनीतिक दल केवल आज के वोटर को नहीं देख रहे। वे उस नागरिक को देख रहे हैं जो आने वाले वर्षों में पहली बार मतदान केंद्र तक जाएगा। भारत में युवा मतदाताओं की संख्या और उनके प्रभाव को लेकर राजनीतिक दल पहले से गंभीर हैं। हालांकि 18 से 29 वर्ष के लोगों की कुल मतदाता हिस्सेदारी समय के साथ घट रही है, फिर भी Gen Z और उसके बाद आने वाली पीढ़ियां डिजिटल राजनीतिक विमर्श में असाधारण प्रभाव रखती हैं।

Gen Alpha का बचपन टीवी के सामने नहीं, मोबाइल स्क्रीन के सामने बीत रहा है। उसके लिए नेता का भाषण केवल टीवी पर प्रसारित कार्यक्रम नहीं है। वह 30 सेकंड की Reel है। वह YouTube Shorts है। वह meme है। वह वायरल क्लिप है। वह influencer की टिप्पणी है। और सबसे महत्वपूर्ण बात—वह सूचना को केवल सुनता नहीं, उसे अपनी पहचान का हिस्सा बना सकता है। यही राजनीति के लिए सबसे बड़ा अवसर भी है और सबसे बड़ा खतरा भी।

15 अगस्त 2026 को लाल किले से जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सशस्त्र नक्सलवाद के कमजोर होने की बात करते हुए "दिमागी नक्सल" शब्द का इस्तेमाल किया और ऐसे लोगों को पहचानने तथा अलग-थलग करने की बात कही, जिन्हें उन्होंने माओवादी विचारधारा का समर्थक बताया। यह बयान आने वाले वर्षों की राजनीति के लिए महत्वपूर्ण है।

क्योंकि अब लड़ाई केवल जंगल में मौजूद बंदूकधारी नक्सलियों के खिलाफ नहीं बताई जा रही, बल्कि विचारधारा और विचार के स्तर पर भी एक संघर्ष की बात की जा रही है।

लेकिन यहां एक गंभीर प्रश्न है—

अगर कोई युवा सरकार से सवाल करता है, व्यवस्था की आलोचना करता है, पुलिस की कार्रवाई पर प्रश्न उठाता है, बेरोजगारी पर आंदोलन करता है या किसी सरकारी नीति का विरोध करता है, तो क्या उसे भी किसी वैचारिक लेबल में बांध दिया जाएगा?

और दूसरी तरफ विपक्ष यदि हर सरकारी कार्रवाई को लोकतंत्र के संकट के रूप में प्रस्तुत करेगा, तो क्या वह युवा को वास्तविक मुद्दे समझने में मदद करेगा या केवल राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ाएगा?

Gen Alpha के सामने आने वाला भारत इन दोनों सवालों का जवाब मांग सकता है।

वैसे राजनीति का पुराना तरीका था ,वादा करो, चुनाव जीतो और सरकार बनाओ। अब राजनीति का नया तरीका बन रहा है—

वादा करो, उसे डिजिटल अभियान बनाओ, युवा को आकर्षित करो और उसके मन में अपनी राजनीतिक कहानी स्थापित करो।

सरकारें युवाओं को विकसित भारत, AI, रोजगार, शिक्षा, कौशल और नए अवसरों की तस्वीर दिखा रही हैं। दूसरी तरफ विपक्ष बेरोजगारी, पेपर लीक, महंगाई, संस्थाओं की स्वतंत्रता, पुलिस कार्रवाई और नागरिक अधिकारों को लेकर आंदोलन की राजनीति कर रहा है।

यानी आने वाले समय में युवा के सामने दो राजनीतिक narratives होंगे— "सरकार आपको भविष्य दे रही है" बनाम "सरकार से भविष्य मांगना पड़ेगा।"

जिस narrative को युवा अपनी जिंदगी के अनुभव से जोड़ पाएगा, वही मजबूत होगा। यहीं राजनीति की असली परीक्षा है।

राहुल गांधी का धरना एक संकेत है कि आने वाले समय में विपक्ष केवल संसद के भीतर नहीं, बल्कि सड़क और डिजिटल प्लेटफॉर्म दोनों पर राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश करेगा। आज एक धरना होता है। कल उसका वीडियो वायरल होगा। फिर उसके छोटे-छोटे हिस्से सोशल मीडिया पर जाएंगे।

Influencers उस पर टिप्पणी करेंगे।

Memes बनेंगे।

Hashtags चलेंगे।

और कुछ ही घंटों में स्थानीय घटना राष्ट्रीय राजनीतिक narrative बन सकती है। यह लोकतंत्र को अधिक जीवंत भी बना सकता है और अधिक उत्तेजित भी। क्योंकि सोशल मीडिया का algorithm तर्क से ज्यादा भावनात्मक प्रतिक्रिया को महत्व देता है।

क्रोध तेजी से फैलता है।

भय तेजी से फैलता है।

नायक और खलनायक तेजी से बनाए जाते हैं।

और इसी प्रक्रिया में लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण तत्व—तथ्य और विवेक—पीछे छूट सकता है।

यह सबसे बड़ा प्रश्न है।

क्या सरकार? ,क्या विपक्ष? ,क्या परिवार?, क्या स्कूल? या फिर YouTube, Instagram और AI?

शायद सबसे बड़ा प्रभाव इन सबका मिलाजुला होगा। लेकिन यहां हमें एक बात समझनी होगी।

बच्चे और किशोर राजनीतिक विचारधारा लेकर पैदा नहीं होते। उनकी राजनीतिक समझ परिवार, शिक्षा, समाज, मीडिया, इंटरनेट और व्यक्तिगत अनुभवों से बनती है।

इस उम्र में बने विश्वास लंबे समय तक प्रभाव डाल सकते हैं। इसलिए यदि किसी बच्चे को लगातार यह बताया जाए कि "सत्ता ही सही है", तो उसके भीतर एक राजनीतिक धारणा बन सकती है। और यदि लगातार यह बताया जाए कि "सरकार हर समस्या की जड़ है", तो दूसरी धारणा बन सकती है।

दोनों स्थितियां लोकतंत्र के लिए स्वस्थ नहीं हैं। लोकतंत्र को भक्त नहीं चाहिए। लोकतंत्र को अंधविरोधी भी नहीं चाहिए। उसे सवाल करने वाला नागरिक चाहिए।

एक प्रश्न और उठता है की प्रधानमंत्री मोदी द्वारा उपजा "दिमागी नक्सल" शब्द Gen Alpha को कितना प्रभावित करेगा? यह इस बात पर निर्भर करेगा कि इस शब्द का राजनीतिक इस्तेमाल कैसे होता है।

यदि इसे केवल सशस्त्र माओवादी विचारधारा के वैचारिक समर्थकों के संदर्भ में सीमित और स्पष्ट अर्थ में इस्तेमाल किया जाता है, तो यह एक राजनीतिक-वैचारिक बहस का हिस्सा रह सकता है।

लेकिन यदि इसका इस्तेमाल हर आलोचक, हर आंदोलनकारी, हर असहमत छात्र या हर सरकार-विरोधी आवाज को चिह्नित करने के लिए किया गया, तो इसका उल्टा असर भी हो सकता है।

क्योंकि Gen Alpha की एक विशेषता है—वह authority को केवल इसलिए स्वीकार नहीं करेगा क्योंकि सामने सत्ता है।

वह पूछेगा—

"क्यों?"

और अगर उसे संतोषजनक उत्तर नहीं मिला तो वह अगला वीडियो देखेगा, दूसरा स्रोत खोजेगा और अपनी कहानी बना लेगा। इसीलिए आने वाली राजनीति में केवल भाषण पर्याप्त नहीं होंगे। विश्वसनीयता सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी होगी।

इसलिए मै कहता हूँ कि भारत में आने वाले वर्षों में राजनीतिक संघर्ष केवल चुनावी सीटों का संघर्ष नहीं रहेगा। यह narrative का संघर्ष होगा।

एक तरफ सरकार विकास, राष्ट्रवाद, सुरक्षा और आत्मनिर्भरता की कहानी लिखेगी। दूसरी तरफ विपक्ष लोकतंत्र, अधिकार, रोजगार और जवाबदेही की कहानी लिखेगा। और इन दोनों कहानियों के बीच खड़ा होगा—Gen Alpha और Gen Z का युवा। वह पूछेगा— रोजगार कहां है?,शिक्षा कैसी है?,मेरी आजादी कितनी है?,मेरी आवाज कौन सुनेगा?, सरकार मुझसे क्या चाहती है?, विपक्ष मुझे क्या दे सकता है? और सबसे बड़ा सवाल— मेरे भविष्य की राजनीति कौन तय करेगा?

इसलिए आज राजनीतिक दल Gen Alpha को भविष्य का वोटर समझकर उसकी मानसिक दुनिया तक पहुंचने की कोशिश करेंगे। इसमें कोई आश्चर्य नहीं। लेकिन राजनीतिक दलों के सामने एक नैतिक जिम्मेदारी भी है। बच्चों और किशोरों को राजनीतिक प्रचार का उपकरण बनाना लोकतंत्र को मजबूत नहीं करेगा। उन्हें विचार देना चाहिए, नफरत नहीं। इतिहास बताना चाहिए, मिथक नहीं। सवाल करना सिखाना चाहिए, किसी व्यक्ति की पूजा नहीं। असहमति समझानी चाहिए, दुश्मनी नहीं।

क्योंकि आज का बच्चा कल का वोटर है। और आज उसके दिमाग में बोया गया विचार कल उसके वोट में दिखाई देगा। इसलिए आने वाले भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक लड़ाई शायद यह नहीं होगी कि कौन चुनाव जीतेगा।

असली लड़ाई यह होगी कि—

कौन अगली पीढ़ी को यह विश्वास दिला पाएगा कि भारत का भविष्य उसके हाथ में है? और यहां सरकार हो या विपक्ष—दोनों को सावधान रहना होगा। क्योंकि Gen Alpha को प्रभावित किया जा सकता है, लेकिन हमेशा नियंत्रित नहीं किया जा सकता। उसे नारे दिए जा सकते हैं, लेकिन वह सवाल पूछेगा। उसे सपने दिखाए जा सकते हैं, लेकिन वह परिणाम मांगेगा। और शायद भारतीय लोकतंत्र का भविष्य इसी एक सवाल पर तय होगा—

क्या हम अगली पीढ़ी को राजनीतिक अनुयायी बनाएंगे या एक स्वतंत्र नागरिक? उत्तर मिले तो कॉमेंट्स करियेगा . नमस्कार

नरेन्द्र कुमार पाण्डेय (संपादक , लाईफ वर्सिटी )

 

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