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नरेन्द्र पाण्डेय : होली है। भैया होली और होली की आप सभी को गाडा-गाडा टोपरा-टोपरा, बधाई और शुभकामनाएं, क्योंकि छत्तीसगढ़ में इस बार रंगों से पहले आ रही है “सायं–सायं” की आवाज़ । कहते हैं हवा चलती है तो सायं–सायं करती है। यहाँ विकास भी सायं–सायं कर रहा है। इसकी रफ्तार इतनी तेज़ है कि दिखाई कम, सुनाई ज़्यादा देता है। साय सरकार की नीतियाँ इन दिनों हवा की रफ़्तार से चल रही हैं। हर हफ्ते नई घोषणा, हर महीने नई योजना, हर मंच से नया विज़न। पोस्टर चमक रहे हैं, स्लोगन दमक रहे हैं, और जनता मोबाइल में वीडियो देखकर समझ रही है कि विकास बहुत तेज़ है—बस उसके मोहल्ले तक आते-आते थोड़ा ट्रैफिक में फँस जाता है। सरकार की नीतियाँ भी कुछ ऐसी ही हैं जिसमे पोस्टर पहले, पसीना बाद में। और समीक्षा? वो अगली होली पर होगी का आश्वासन है ।
धान के कटोरे में नीति का रंग अलग है। नीति स्पष्ट है—किसान हित सर्वोपरि। समर्थन मूल्य, बोनस, खरीदी केंद्र, डिजिटल ट्रैकिंग—सब कुछ व्यवस्थित बताया जा रहा है। फिर भी गोदामों से खबर आती है—धान कम, चूहे ज्यादा है । अब ये चूहे कोई साधारण जीव तो है नहीं । ये इतने समझदार हैं... इतने समझदार कि न निजी गोदाम छूते हैं, न बाजार का माल। ये सिर्फ सरकारी धान खाते हैं। लगता है इन्हें भी सरकारी सब्सिडी का स्वाद पसंद है। सरकार कहती है—जांच होगी। किसान कहता है—फसल फिर बो दूँगा, पर भरोसा कहाँ से बोऊँ? किसान अभी भी गोदाम की तरफ देखता है और सोचता है—इस साल चूहे एमबीए करके आएँगे या पुरानी टीम ही खेलेगी? कागज़ पर व्यवस्था स्टील की है, ज़मीन पर बोरा अब भी कमजोर है। होली में रंग उड़ता है, यहाँ जवाबदेही उड़ जाती है।
अब आते हैं उस नीति पर जिसने राजकोष को फिट और समाज को थोड़ा कन्फ्यूज कर रखा है जी बात शराब नीति की। ये राजस्व का सबसे चमकीला गुलाल। दुकानें इतनी सजी-धजी कि लगे “विकास महोत्सव” चल रहा है। हर मोहल्ले में उपलब्धता—सुलभ, सरल, सुगम। राज्य आत्मनिर्भर है— अपना उत्पादन, अपनी बिक्री, अपनी कमाई। दुकानें व्यवस्थित हैं। यह भी तथ्य है। ग्राफ ऊपर है। यह तो प्रस्तुति में सबसे चमकीली स्लाइड है। गाँव में अब रास्ता बताने का नया तरीका है— “स्कूल के आगे से मत मुड़ना, शराब दुकान के पास से दाएँ ले लेना ।” लैंडमार्क स्पष्ट और प्रशासनिक दक्षता दिखती है।
फिर सरकार ने घोषणा की—बड़े स्तर पर नशा मुक्ति केंद्र खोले जाएँगे। तब नरेन्द्र मुस्कुरा कर कहता है यानी पहले प्रेरणा, फिर परामर्श। पहले आदत, फिर उपचार। एक ही राज्य में “एंट्री” भी और “एग्जिट” भी। यह ऐसा मॉडल है जिस पर मैनेजमेंट कॉलेज केस स्टडी बना सकते हैं— Revenue Generation and Recovery: A Complete Cycle. सुबह आबकारी विभाग मुस्कुराता है— “इस तिमाही आय रिकॉर्ड रही।” शाम को स्वास्थ्य विभाग बताता है— “नशा मुक्ति केंद्रों में पंजीयन बढ़ा।” दोनों विभाग संतुष्ट। जनता थोड़ा कन्फ्यूज। यह आत्मनिर्भरता का उन्नत मॉडल है। “आप पीजिए निश्चिंत होकर, हम छुड़ाएँगे वैज्ञानिक तरीके से।” अगर यह फार्मूला सफल हुआ तो भविष्य में और नवाचार संभव हैं— जाम बढ़े तो “जाम शांति केंद्र” खोलिए। गड्ढे बढ़ें तो “गड्ढा ध्यान शिविर” कराइए। समस्या और समाधान—दोनों एक ही सरकार के पास है । पैकेज पूर्ण। सरकार कहती है—आबकारी से जो राजस्व आएगा, उसी से सड़कें बनेंगी, अस्पताल सुधरेंगे, बस्तर में विकास होगा। तर्क बुरा नहीं है। पर गाँव की बैठक में एक बुजुर्ग ने कहा— “बेटा, घर से जो पैसा बोतल में गया, वही अगर बचता तो हमारे घर का बजट भी संतुलित रहता।”
ट्रैफिक व्यवस्था भी कम रोचक नहीं। राजधानी में जाम स्थायी पहचान बन चुका है। फ्लाईओवर की घोषणाएँ हर बजट में ताजे गुलाल की तरह उड़ती हैं। ज़मीन पर गाड़ियाँ धीरे-धीरे चलती हैं, लेकिन भाषणों में विकास 120 की स्पीड से दौड़ता है। ट्रैफिक सुधार की योजना है—फ्लाईओवर, सिग्नल, स्मार्ट सिस्टम। पर जाम में खड़ा आदमी सोचता है—“सिस्टम स्मार्ट है, शायद हम ही स्लो हैं।” स्वास्थ्य विभाग की हालत पर तो अलग से होली खेली जा सकती है। विभाग में सुधार की घोषणाएँ हैं- डॉक्टरों की भर्ती की घोषणा, मेडिकल कॉलेज का वादा, मशीनों का आधुनिकीकरण—सब कागज़ पर उत्तम। मरीज लाइन में खड़ा है, काउंटर पर लिखा है—“थोड़ा इंतज़ार करें।” इलाज भी सायं–सायं मोड में है और मरीज पूछता है—“डॉक्टर साहब मिलेंगे या अगली होली पर अपॉइंटमेंट है?”
की बात करें तो वहाँ सायं–सायं की जगह कभी-कभी धम–धम भी सुनाई देती थी। अब नक्सल खात्मे के दावे तेज़ हैं। सड़कें बन रही हैं, कैंप बढ़ रहे हैं, योजनाएँ पहुँच रही हैं। सरकार कहती है—शांति लौट आई है। जंगल अब भी देख रहा है—क्या विकास भरोसे में बदलेगा या सिर्फ फोटो में? बस्तर में असली विकास तब दिखेगा जब युवा हाथ में रोज़गार लेगा, न कि सिर्फ सुरक्षा का आश्वासन। सांय-सांय विकास अगर जंगल में भी हवा की तरह बहे, तो शांति टिकेगी; वरना सिर्फ प्रेस नोट में बहती रहेगी।
सांय-सांय सिर्फ विकास नहीं, रणनीति भी है। विकास मॉडल मजबूत दिखना चाहिए। क्योंकि मॉडल ही ब्रांड है। और विपक्ष? वह हवा का रुख देख रहा है। इस होली में वो थोड़ा सूखा दिख रहा है। बयान देता है, ट्वीट करता है, पर मैदान में रंग कम दिखता है। सत्ता सायं–सायं विकास कर रही है, विपक्ष सायं–सायं विरोध कर रहा है। मगर लोकतंत्र की होली में अगर एक पक्ष ही रंग लगाए और दूसरा सिर्फ टिप्पणी करे, तो तस्वीर थोड़ी एकतरफा लगती है।
कुल मिलाकर छत्तीसगढ़ में इस बार होली का नया थीम है— “नीति भी हमारी, नतीजा भी हमारा।” सरकार कमाती भी है, छुड़ाती भी है। घोषणा भी करती है, उद्घाटन भी। हँसी इसलिए आती है क्योंकि मॉडल दिलचस्प है। सोच इसलिए आती है क्योंकि असर असली है। होली में रंग दो दिन में उतर जाते हैं। नीतियों का रंग पाँच साल टिकता है—या फिर अगले चुनाव तक। सायं–सायं विकास की इस हवा में जनता बस इतना चाहती है— रंग कम उड़ें, और असर थोड़ा ज़्यादा दिखे। क्योंकि अगर हर बार सिर्फ आवाज़ आए—सायं–सायं… और दृश्य वही रहे— तो अगली होली में लोग रंग नहीं, सीधा हिसाब माँगेंगे।