स्तन कैंसर से जंग : खामोशी तोड़ने का समय- प्रो.डॉ मंजू सिंह ( ब्रैस्ट ओकोप्लास्टी सर्जन एवं विभागाध्यक्ष सर्जरी )


रायपुर : कभी-कभी आँकड़े सिर्फ संख्या नहीं होते… वे समाज की चुप्पी का आईना होते हैं। और स्तन कैंसर से जुड़े आँकड़े भारत की उसी चुप्पी की दर्दनाक कहानी कहते हैं। भारत में महिलाओं में सबसे ज्यादा होने वाला कैंसर स्तन कैंसर (ब्रेस्ट कैंसर) है। यह एक गंभीर लेकिन समझने और समय पर पहचानने वाली बीमारी है। आँकड़े बताते हैं कि भारत में हर 4 मिनट में एक महिला को ब्रेस्ट कैंसर होता है और हर 8 मिनट में एक महिला की इस बीमारी से मौत हो जाती है। अनुमान है कि वर्ष 2035 तक भारत में कैंसर का बोझ 1.5 गुना बढ़कर 17 लाख से अधिक हो जाएगा। जरा ठहरकर सोचिए… जब आप यह कॉलम पढ़ रहे हैं, तब शायद देश के किसी कोने में किसी घर का दरवाज़ा खुला होगा, रिपोर्ट हाथ में होगी… और एक परिवार की दुनिया अचानक बदल गई होगी।


बीमारी से ज्यादा खतरनाक — हमारी मानसिकता

सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि भारत में ब्रेस्ट कैंसर का पता अक्सर देर से चलता है। कई महिलाएँ शर्म, डर या जानकारी की कमी के कारण डॉक्टर के पास जाने में देर कर देती हैं। जब तक बीमारी का पता चलता है, तब तक वह गंभीर अवस्था में पहुँच जाती है। यही कारण है कि भारत में कैंसर से ठीक होने की दर पश्चिमी देशों की तुलना में काफी कम है।

स्तन कैंसर केवल शरीर की बीमारी नहीं है… यह हमारे सामाजिक व्यवहार की भी परीक्षा है। भारत में स्तन कैंसर से जुड़ी सबसे बड़ी त्रासदी बीमारी नहीं, बल्कि संकोच, डर और अज्ञान है। हमारे समाज में महिलाओं को बचपन से सिखाया जाता है— “दर्द सहना है, चुप रहना है, घर संभालना है।” और यही संस्कार कई बार बीमारी को चुपचाप बढ़ने देते हैं। महिला अक्सर अपनी तकलीफ को परिवार की जिम्मेदारियों के पीछे छिपा देती है। परिणाम… जब तक अस्पताल पहुँचती है, बीमारी तीसरे या चौथे चरण में पहुँच चुकी होती है। यही वजह है कि जहाँ पश्चिमी देशों में कैंसर से लड़ाई समय रहते शुरू हो जाती है, वहीं भारत में लड़ाई अक्सर तब शुरू होती है जब बीमारी आधी जीत हासिल कर चुकी होती है।


चिकित्सा की प्रगति… लेकिन पहुँच का संकट

आज चिकित्सा विज्ञान ने चमत्कार किए हैं। ब्रेस्ट ऑनकोप्लास्टी, टार्गेटेड थेरेपी, इम्यूनोथेरेपी, लिक्विड बायोप्सी—ये शब्द केवल मेडिकल टर्म नहीं हैं, बल्कि हजारों महिलाओं के लिए उम्मीद की नई खिड़की हैं। लेकिन सच्चाई यह भी है कि भारत के कई हिस्सों में आज भी कैंसर का मतलब इलाज नहीं… बल्कि किस्मत मान लिया जाता है।


बीमारी को नहीं… समय को हराना है

4 फ़रवरी – विश्व कैंसर दिवस का उद्देश्य केवल बीमारी के बारे में बताना नहीं, बल्कि समग्र देखभाल और संवेदनशीलता को बढ़ावा देना है। इस वर्ष विश्व कैंसर दिवस की थीम है—

“United for Unique” इसका अर्थ केवल इतना नहीं कि हम कैंसर से लड़ने के लिए एकजुट हों। इसका अर्थ यह भी है कि हम हर मरीज को एक आँकड़ा नहीं… बल्कि एक इंसान समझें। हर मरीज की कहानी अलग होती है। किसी के लिए यह बीमारी आर्थिक संकट बन जाती है… किसी के लिए मानसिक संघर्ष… और किसी के लिए सामाजिक अलगाव। इलाज केवल शरीर का नहीं… बल्कि आत्मविश्वास का भी होना चाहिए। स्तन कैंसर को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता। लेकिन मृत्यु को रोका जा सकता है… और इसका सबसे बड़ा हथियार है समय पर पहचान

महिलाएँ महीने में एक बार स्वयं स्तन की जांच करें (Self Breast Examination)।

✔ अगर स्तन में गांठ, दर्द, सूजन, त्वचा में बदलाव या निप्पल से असामान्य स्राव दिखे तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।

✔ 40 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं को नियमित जांच करवानी चाहिए।

✔ परिवार में कैंसर का इतिहास हो तो विशेष सावधानी रखें।

पश्चिमी देशों ने 1980 के दशक में ही जागरूकता अभियान शुरू कर दिए थे। लगभग दो दशक बाद वहाँ मृत्यु दर कम होने लगी। भारत ने 2017 में स्तन कैंसर स्क्रीनिंग कार्यक्रम शुरू किया। लेकिन नीति और ज़मीन के बीच की दूरी आज भी बनी हुई है। कई शहरों में महिलाएँ आज भी यह नहीं जानतीं कि स्वयं स्तन परीक्षण कैसे किया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो यह विषय अब भी संकोच की दीवार के पीछे कैद है।


कैंसर — बीमारी नहीं, सामाजिक संवाद का विषय

कैंसर का इलाज केवल डॉक्टर नहीं करते… इसमें परिवार, समाज और सरकार—तीनों की भूमिका होती है। परिवार को समझना होगा कि महिला केवल जिम्मेदारियों की मशीन नहीं है। उसे अपने स्वास्थ्य के लिए समय और सम्मान दोनों चाहिए। समाज को यह स्वीकार करना होगा कि शरीर से जुड़ी बीमारियाँ शर्म का विषय नहीं होतीं। और सरकार को यह समझना होगा कि स्वास्थ्य योजनाएँ केवल घोषणा नहीं, बल्कि जीवन बचाने का संकल्प होती हैं।

स्तन कैंसर से लड़ाई अस्पताल से पहले घर से शुरू होती है। माँ अपनी बेटी से इस विषय पर बात करे… पति अपनी पत्नी को स्वास्थ्य जांच के लिए प्रेरित करे…समाज महिलाओं को यह भरोसा दे कि बीमारी कमजोरी नहीं होती। याद रखिए— कैंसर शरीर में अचानक नहीं बनता… यह धीरे-धीरे चुपचाप बढ़ता है। और जागरूकता ही वह रोशनी है जो इस अंधेरे को समय रहते पहचान सकती है।

विश्व कैंसर दिवस हमें डराने के लिए नहीं… जगाने के लिए है। और इसलिए… यह दिन केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक जीवन मंत्र लेकर आता है— “डरने की जरूरत नहीं… जागरूक रहें, सतर्क रहें… क्योंकि समय पर लिया गया एक कदम, जिंदगी बचा सकता है।”

 

प्रो.डॉ मंजू सिंह ( ब्रैस्ट ओकोप्लास्टी सर्जन एवं विभागाध्यक्ष सर्जरी )

पं. जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल मेडिकल कॉलेज, रायपुर छग)

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