शिल्पी कौन?


नरेन्द्र पाण्डेय : आज 17 सितंबर है। हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद शुक्ल पक्ष की षष्ठी है और आज के दिन भगवान विश्वकर्मा की जयंती मनाई जाती है। भारतीय परंपरा में विश्वकर्मा को देवताओं का शिल्पी कहा गया है आज की भाषा में कहें तो आर्किटेक्ट, इंजीनियर । लेकिन आज की तारीख का एक और संयोग देखिए। 17 सितंबर ही नरेंद्र मोदी का जन्मदिन है। जो 2014 से भारत के प्रधानमंत्री हैं।

भारतीय जनता पार्टी और उनके समर्थक नरेंद्र मोदी को कई बार “नए भारत का शिल्पी” जैसे विशेषणों से संबोधित करते हैं। तो आज एक दिलचस्प सवाल खड़ा होता है— शिल्पी आखिर होता कौन है? क्या वह केवल वह व्यक्ति है जो ईंट-पत्थर से कोई भवन खड़ा करता है? या वह भी शिल्पी है जो किसी समाज की सोच बदलता है? जो किसी नदी को दिशा देता है? जो किसी भाषा को नया स्वरूप देता है? जो संविधान बनाता है? जो बिखरे हुए देश को एक सूत्र में पिरोता है? या वह व्यक्ति भी शिल्पी है जो किसी देश को नई तकनीक, नई अर्थव्यवस्था और नई दिशा देने का प्रयास करता है?

अगर शिल्प की परिभाषा इतनी व्यापक है, तो भारत का इतिहास ऐसे विश्वकर्माओं से भरा पड़ा है। सबसे पहले याद आते हैं—भगवान विश्वकर्मा। भारतीय परंपरा में उन्हें देवताओं के दिव्य वास्तुकार के रूप में देखा गया है। उनके साथ निर्माण, वास्तु, औजार, तकनीक और सृजन की पूरी परंपरा जुड़ी हुई है। और शायद इसीलिए विश्वकर्मा पूजा केवल किसी एक पेशे की पूजा नहीं है। यह उस कौशल का सम्मान है, जो किसी विचार को वास्तविकता में बदलता है। यानी विचार से निर्माण तक की यात्रा। और यहीं से भारत के दूसरे विश्वकर्माओं की कहानी शुरू होती है।

 भारत की सभ्यता का सबसे बड़ा आधार क्या रहा है? जल।

जल नहीं तो कृषि नहीं। कृषि नहीं तो अन्न नहीं। अन्न नहीं तो सभ्यता नहीं। हमारी पुराण परंपरा में राजा भगीरथ की कथा आती है—जिनके तप और प्रयास से गंगा के पृथ्वी पर अवतरण की कथा जुड़ी है। वहीं गोदावरी के संदर्भ में महर्षि गौतम की कथा आती है, जिनसे गोदावरी के पृथ्वी पर प्रकट होने की परंपरा जुड़ी हुई है। कथाएं चाहे धार्मिक आस्था के स्तर पर हों, लेकिन उनके भीतर एक बड़ा संदेश छिपा है— सभ्यता वहीं फलती है, जहां जल पहुंचता है। और आधुनिक भारत में जब हम जल-प्रबंधन और इंजीनियरिंग की बात करते हैं तो सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया को कैसे भूल सकते हैं? वे केवल इंजीनियर नहीं थे। वे सिंचाई, जलाशय, बांध, पेयजल और औद्योगिक विकास के बड़े योजनाकारों में गिने जाते हैं। कृष्णराज सागर बांध और जल प्रबंधन के उनके कार्य इसका उदाहरण हैं।

इसलिए भारत में शिल्प की परंपरा केवल मंदिरों और मूर्तियों तक सीमित नहीं रही। कभी उसने नदी को दिशा दी। कभी खेत तक पानी पहुंचाया। कभी शहर को बाढ़ से बचाया। और कभी पूरे समाज की आर्थिक दिशा बदल दी।

लेकिन राष्ट्र केवल बांधों से नहीं बनता। राष्ट्र विचारों से बनता है। और विचारों को समाज तक पहुंचाने का सबसे बड़ा माध्यम है—भाषा। इसलिए हिंदी साहित्य के आधुनिक विकास की बात हो तो भारतेन्दु हरिश्चंद्र का नाम सामने आता है। उन्हें आधुनिक हिंदी साहित्य और हिंदी गद्य के विकास का प्रमुख युगप्रवर्तक माना जाता है। उन्होंने साहित्य, पत्रकारिता, नाटक और सार्वजनिक विमर्श के माध्यम से हिंदी को आधुनिक सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना से जोड़ा। यानी भाषा का शिल्प भी एक तरह का राष्ट्र निर्माण है।

फिर आया वह समय जब भारत को स्वतंत्र होना था। आजादी केवल अंग्रेजों से सत्ता हासिल कर लेने का नाम नहीं थी। असली चुनौती थी— अब यह देश चलेगा कैसे? यहां विचारों की एक पूरी परंपरा सामने आती है। महात्मा गांधी का नैतिक और सामाजिक चिंतन, जवाहरलाल नेहरू की आधुनिक राष्ट्र-निर्माण की दृष्टि, सरदार पटेल का राजनीतिक एकीकरण और डॉ. भीमराव आंबेडकर की संवैधानिक दृष्टि—इन सबने स्वतंत्र भारत के निर्माण में अलग-अलग भूमिकाएं निभाईं।

संविधान निर्माण की बात हो तो डॉ. आंबेडकर का योगदान केंद्रीय है। वे संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे। लेकिन संविधान किसी एक व्यक्ति की रचना नहीं था; यह संविधान सभा की सामूहिक प्रक्रिया का परिणाम था। और इसी बात को याद रखना जरूरी है— राष्ट्र का निर्माण कभी अकेला शिल्पी नहीं करता।

कई हाथ लगते हैं। कई विचार मिलते हैं। कई मतभेद होते हैं। और तब कहीं जाकर एक संरचना खड़ी होती है। अगर भारत को एक राजनीतिक इकाई के रूप में जोड़ने की बात करें तो सरदार वल्लभभाई पटेल का योगदान सामने आता है। सैकड़ों रियासतों के एकीकरण की जटिल प्रक्रिया में उनकी निर्णायक भूमिका रही। इसे भी एक तरह का शिल्प ही कहिए। फर्क इतना है कि यहां ईंट-पत्थर नहीं थे। यहां नक्शे पर बिखरे हुए भूभाग थे। और शिल्प था—एक भारत की राजनीतिक संरचना का निर्माण।

फिर दौर आयाजवाहरलाल नेहरू का । स्वतंत्र भारत को आधुनिक औद्योगिक और वैज्ञानिक आधार देने के लिए बड़े उद्योगों, सार्वजनिक क्षेत्र, वैज्ञानिक संस्थानों और बड़े बांधों जैसी परियोजनाओं पर जोर दिया गया। यह वह दौर था जब भारत ने खुद से पूछा— क्या हम केवल विरासत में मिले देश को संभालेंगे, या भविष्य का भारत भी बनाएंगे? और यह प्रश्न आज भी प्रासंगिक है।

फिर आया राजीव गांधी का दौर। उन्होंने भारत को 21वीं सदी की ओर ले जाने की बात को राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाया और कंप्यूटर तथा दूरसंचार के विस्तार को गति मिली। सी-डॉट की स्थापना 1984 में हुई और भारत में स्वदेशी दूरसंचार तकनीक के विकास की दिशा में उसका महत्वपूर्ण योगदान रहा।

आज हमारे हाथ में स्मार्टफोन है। हम इंटरनेट पर हैं। कंप्यूटर, लैपटॉप और डिजिटल तकनीक हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हैं। इसलिए तकनीकी भारत की कहानी को भी कई पीढ़ियों के शिल्पियों की कहानी के रूप में देखना चाहिए।


और फिर मारुति की कहानी को कैसे भुलाया जा सकता है . संजय गांधी ने भारत में छोटी कार बनाने की परियोजना के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक और औद्योगिक पहल की थी और जब उनका  निधन 1980 में हुआ, तब  मारुति उद्योग लिमिटेड 1981 में भारत सरकार और सुजुकी मोटर कॉरपोरेशन के संयुक्त उपक्रम के रूप में बनी और 1983 में पहली मारुति 800 बाजार में आई।

खैर अब वापस लौटते हैं 17 सितंबर पर।

आज भगवान विश्वकर्मा की पूजा है। और भारत के वर्तमान प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी का जन्मदिन । नरेंद्र मोदी को उनके समर्थक और भारतीय जनता पार्टी से जुड़े लोग नए भारत के निर्माण का शिल्पी बताते हैं। इस दावे को समझने के लिए हमें उनके शासनकाल की नीतियों, परियोजनाओं और राजनीतिक विचारधारा को अलग-अलग देखकर समझना होगा। लेकिन एक बात निश्चित है—

भारत के राजनीतिक विमर्श में “नए भारत” की एक अलग कल्पना पिछले वर्षों में प्रमुखता से सामने आई है।

इसे कोई उपलब्धियों के रूप में देखता है। कोई इसे राजनीतिक दृष्टि के रूप में देखता है। और कोई इसकी आलोचना भी करता है। लोकतंत्र में इन सभी दृष्टियों के लिए जगह होनी चाहिए। क्योंकि शिल्पी का सबसे बड़ा काम केवल निर्माण करना नहीं है। निर्माण के बाद यह भी देखना होता है कि वह संरचना कितनी टिकाऊ है, कितने लोगों के काम आती है और आने वाली पीढ़ियों के लिए क्या छोड़कर जाती है। और शायद यही विश्वकर्मा पूजा का सबसे बड़ा संदेश भी है। औजार की पूजा से ज्यादा जरूरी है—उस औजार का सही इस्तेमाल।

ईंट से भवन बन सकता है। उसी ईंट से दीवार भी बन सकती है।    पैदा हो सकता है। इसलिए असली शिल्पी वह नहीं जो केवल कुछ बना दे। असली शिल्पी वह है जो ऐसा निर्माण करे, जो समय की कसौटी पर खरा उतर सके।

आज भगवान विश्वकर्मा को नमन करते हुए हमें उन सभी शिल्पियों को याद करना चाहिए जिन्होंने भारत के निर्माण में अपनी-अपनी भूमिका निभाई— भगीरथ से विश्वेश्वरैया तक, गौतम ऋषि से लेकर आधुनिक जल-इंजीनियरों तक, भारतेन्दु से लेकर आधुनिक साहित्यकारों तक, गांधी, आंबेडकर, नेहरू और पटेल से लेकर स्वतंत्र भारत के असंख्य संविधान-निर्माताओं तक, वैज्ञानिकों से लेकर इंजीनियरों तक, और आज के उन लाखों कामगारों तक, जिनके हाथों से भारत रोज बनता है।

क्योंकि भारत का निर्माण किसी एक दिन में नहीं हुआ। और न ही किसी एक शिल्पी ने इसे बनाया है। भारत एक सतत निर्माणाधीन सभ्यता है। हर पीढ़ी अपनी एक ईंट जोड़ती है। हर पीढ़ी अपना एक विचार देती है। हर पीढ़ी अपने समय का एक शिल्प रचती है।

तो आइए— आज केवल विश्वकर्मा पूजा न मनाएं। अपने भीतर के शिल्पी को भी जगाएं। कुछ ऐसा सोचें, जो उपयोगी हो। कुछ ऐसा बनाएं, जो टिकाऊ हो। और कुछ ऐसा छोड़कर जाएं, जिसे आने वाली पीढ़ियां देखकर कह सकें— हां, हमारे पहले भी कुछ लोग थे, जिन्होंने भारत को बनाने की कोशिश की थी।

मैं नरेन्द्र पाण्डेय भगवान विश्वकर्मा को नमन करता हूँ । भारत के सभी ज्ञात-अज्ञात शिल्पियों को नमन। और आप सभी को विश्वकर्मा पूजा एवं शिल्प-परंपरा के इस पावन दिन की हार्दिक शुभकामनाएं देता हूँ ।

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