बच्चे सड़क पर हैं, सत्ता किस बात का इंतजार कर रही है?


नरेन्द्र पाण्डेय : राजनीति में कुछ घटनाएं खबर बनकर आती हैं और चली जाती हैं, लेकिन कुछ घटनाएं आने वाले समय की राजनीति का संकेत बन जाती हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों में स्कूली बच्चों का अपनी बुनियादी समस्याओं को लेकर सड़क पर उतरना ऐसी ही घटना है।

नरसिंहपुर में बच्चे स्कूल की यूनिफॉर्म पहनकर कलेक्टर कार्यालय पहुंचे। मांग थी—स्कूल तक जाने वाली सड़क ठीक कराइए। उन्नाव में छात्र शिक्षक, भोजन और बुनियादी सुविधाओं को लेकर प्रदर्शन करते हैं। महोबा में खराब सड़क और जलभराव से परेशान बच्चे हाईवे तक पहुंच जाते हैं। उज्जैन में छात्राएं स्कूल शिफ्ट किए जाने के फैसले का विरोध करती हैं और सरकार को अपना निर्णय रोकना पड़ता है।

इन घटनाओं को अलग-अलग जिलों की स्थानीय समस्याएं कहकर नजरअंदाज किया जा सकता है। लेकिन ऐसा करना बड़ी भूल होगी।

क्योंकि यहां सवाल केवल सड़क, शिक्षक, भोजन या स्कूल की इमारत का नहीं है। सवाल है कि क्या हमारी व्यवस्था अपने सबसे छोटे नागरिक की आवाज सुन रही है?



जब शिकायत आंदोलन बन जाए

किसी बच्चे का कलेक्टर कार्यालय पहुंचना सामान्य घटना नहीं है। वह बच्चा प्रशासन की भाषा नहीं समझता, उसे फाइलों की प्रक्रिया नहीं मालूम, उसे बजट की बाधाएं नहीं पता। वह सिर्फ इतना जानता है कि रास्ता खराब है और स्कूल पहुंचना मुश्किल है।

जब वही बच्चा अपनी समस्या लेकर अधिकारी के पास पहुंचता है, तो प्रशासन के लिए यह चेतावनी होनी चाहिए कि शिकायत व्यवस्था की सामान्य प्रक्रिया से आगे निकल चुकी है।

लोकतंत्र की खूबसूरती यह है कि नागरिक को अपनी बात रखने का अधिकार है। लेकिन लोकतंत्र की कमजोरी तब सामने आती है जब नागरिक को अपनी सामान्य समस्या के समाधान के लिए असामान्य रास्ता चुनना पड़े।

अगर सड़क की शिकायत करने के लिए बच्चे को कलेक्टर कार्यालय जाना पड़े, तो सवाल बच्चे से ज्यादा व्यवस्था से पूछा जाना चाहिए।



Gen Alpha का असली सवाल

आज की नई पीढ़ी को अक्सर Gen Alpha या Gen Z के नाम से पहचाना जाता है। यह पीढ़ी इंटरनेट के दौर में बड़ी हो रही है। इनके पास सूचना तक पहुंच है। ये सवाल पूछने में संकोच नहीं करती और इन्हें यह समझाने की कोशिश भी मुश्किल है कि केवल इसलिए चुप रहो क्योंकि सामने कोई बड़ा अधिकारी या राजनीतिक व्यक्ति है।

इसे केवल पीढ़ी की उद्दंडता मानना आसान है।

लेकिन हर विरोध को उद्दंडता कहना भी व्यवस्था की सुविधाजनक भूल है।

बच्चा अगर खराब सड़क की शिकायत करता है, छात्र अगर शिक्षक की कमी की बात करता है और छात्रा अगर सुरक्षित आवागमन की मांग करती है, तो इन सवालों को सुनना ही लोकतांत्रिक शासन का पहला कर्तव्य है।

हां, विरोध का तरीका शांतिपूर्ण होना चाहिए। सड़क जाम करना, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना या कानून अपने हाथ में लेना किसी भी स्थिति में उचित नहीं है।

लेकिन विरोध के तरीके की आलोचना करने से पहले विरोध के कारण को समझना भी जरूरी है।



राजनीति की प्राथमिकताएं बनाम जनता की प्राथमिकताएं

आज देश की राजनीति में बड़े-बड़े मुद्दों पर बहस हो रही है। वंदे मातरम् पर राजनीतिक दलों के रुख से लेकर परिसीमन तक, संसद से लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा तक—हर मुद्दे की अपनी जगह है।

लेकिन एक गांव के बच्चे के लिए राष्ट्रीय राजनीति का सबसे बड़ा सवाल कई बार यह होता है कि कल वह स्कूल तक पहुंचेगा कैसे?

यही भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती है।

हम एक साथ दो तरह की राजनीति देख रहे हैं।

एक तरफ टीवी स्टूडियो और संसद में बड़े राष्ट्रीय मुद्दों पर बहस है।

दूसरी तरफ गांव का बच्चा पूछ रहा है—“मेरे स्कूल की सड़क कब बनेगी?”

दोनों सवाल महत्वपूर्ण हैं। लेकिन विकास की असली परीक्षा दूसरे सवाल के जवाब में होती है।



कंगना-रामदेव विवाद भी इसी राजनीति का एक आईना

इसी समय भाजपा सांसद कंगना रनौत और योगगुरु बाबा रामदेव के बीच सार्वजनिक विवाद भी चर्चा में है।

यह विवाद शुरुआत में Gen Z पर कंगना की टिप्पणी को लेकर था, लेकिन जल्द ही व्यक्तिगत टिप्पणियों तक पहुंच गया। दोनों सार्वजनिक जीवन की प्रभावशाली हस्तियां हैं और दोनों का संबंध व्यापक दक्षिणपंथी सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्श से रहा है।

इसलिए यह विवाद केवल व्यक्तिगत असहमति नहीं रह जाता।

यह सवाल खड़ा करता है कि क्या सार्वजनिक जीवन में वैचारिक असहमति को व्यक्तिगत हमलों में बदलने से किसी विचारधारा की प्रतिष्ठा बढ़ती है?

निश्चित रूप से नहीं।

किसी भी राजनीतिक या वैचारिक समूह की वास्तविक ताकत उसके नेताओं और समर्थकों की भाषा, व्यवहार और सार्वजनिक मर्यादा से भी तय होती है।

यह कहना जल्दबाजी होगी कि इस विवाद से भाजपा की राजनीतिक ताकत कमजोर हो रही है। लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि ऐसे सार्वजनिक टकराव उस व्यापक सामाजिक गठबंधन में तनाव की झलक दिखाते हैं, जिस पर लंबे समय से दक्षिणपंथी राजनीति का प्रभाव रहा है।

राजनीति में मतभेद स्वाभाविक हैं। लेकिन मतभेद और मर्यादाहीनता के बीच एक स्पष्ट रेखा होनी चाहिए।



कश्मीर की खबर और एक महत्वपूर्ण संदेश

अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर का जम्मू-कश्मीर दौरा और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से मुलाकात भी इसी दिन की महत्वपूर्ण खबरों में है। जम्मू-कश्मीर को भारत का अहम हिस्सा बताए जाने पर पाकिस्तान ने आपत्ति जताई।

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में उमर अब्दुल्ला का यह कहना खासा महत्वपूर्ण है कि जम्मू-कश्मीर की समस्याओं का समाधान भारत को ही करना है।

यह लोकतंत्र का मूल सिद्धांत है।

भारत की समस्याओं का समाधान भारत के लोकतांत्रिक संस्थानों को ही करना होगा। चाहे वह कश्मीर हो या किसी गांव की सड़क।



सत्ता के लिए सबसे बड़ा खतरा सवाल नहीं, सवालों को नजरअंदाज करना है

आज बच्चे सवाल पूछ रहे हैं।

कल युवा पूछेंगे।

फिर किसान, कर्मचारी, महिलाएं, व्यापारी और आम नागरिक पूछेंगे।

लोकतंत्र में सवाल खत्म नहीं होते। लेकिन सरकारों की विश्वसनीयता इस बात से तय होती है कि वे सवालों का सामना कैसे करती हैं।

सरकार मजबूत तब नहीं होती जब उसके सामने कोई विरोध न हो।

सरकार मजबूत तब होती है जब उसके सामने विरोध हो और वह बिना घबराए उसका समाधान कर सके।

नरसिंहपुर के बच्चे अगर सड़क मांग रहे हैं तो सड़क बननी चाहिए।

उन्नाव के बच्चे शिक्षक और बेहतर भोजन मांग रहे हैं तो व्यवस्था सुधरनी चाहिए।

महोबा में सड़क और जलभराव की शिकायत है तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

उज्जैन की छात्राओं को सुरक्षा और आवागमन की चिंता है तो निर्णय लेते समय उनकी बात सुनी जानी चाहिए।

और अगर कहीं पुलिस ने बच्चों के साथ अनुचित व्यवहार किया है, तो उसकी निष्पक्ष जांच भी होनी चाहिए।

क्योंकि बच्चों को सड़क से हटाना आसान है।

लेकिन उनके मन में व्यवस्था के प्रति पैदा हो रहे अविश्वास को हटाना आसान नहीं होगा।

आज का बच्चा सिर्फ भविष्य का नागरिक नहीं है।

वह आज का नागरिक भी है।

और शायद आज की सबसे बड़ी राजनीतिक खबर यही है—

देश का भविष्य अब सिर्फ भाषण सुनना नहीं चाहता। वह अपने सवालों के जवाब चाहता है।

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