नरेन्द्र पाण्डेय : शासन और प्रशासन का रिश्ता कुछ वैसा ही होता है, जैसे एक ही रथ के दो पहिए। लोकतंत्र में सरकार नीतियां बनाती है और प्रशासन उन नीतियों को जमीन पर उतारता है। लेकिन जब इन दोनों के बीच की दूरी कम होने लगती है और प्रशासनिक तंत्र पर राजनीतिक प्रभाव की चर्चा तेज होती है, तब एक बड़ा सवाल खड़ा होता है—क्या नौकरशाही राजनीति से प्रभावित हो रही है या फिर नौकरशाह स्वयं राजनीति का हिस्सा बनने के लिए प्रशासनिक सेवा छोड़ रहे हैं?
उत्तर प्रदेश की पूर्व आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल के हालिया इस्तीफे ने एक बार फिर इसी बहस को जन्म दिया है। 2013 बैच की अधिकारी दिव्या मित्तल ने करीब 13 वर्ष की सेवा के बाद स्वैच्छिक इस्तीफा दिया है। मिर्जापुर सहित कई जिलों में उनके काम की चर्चा रही और लहुरियादह जैसे गांव में लंबे समय से लंबित पेयजल व्यवस्था को लेकर उनका काम विशेष रूप से उल्लेखित हुआ।
उनके इस्तीफे के बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा शुरू हुई कि क्या वह भविष्य में राजनीति का रुख करेंगी? राहुल गांधी से उनकी कथित मुलाकात को भी इस अटकल से जोड़ा गया। लेकिन महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि दिव्या मित्तल ने स्वयं राजनीति में आने की अटकलों से इनकार किया है। इसलिए फिलहाल उनके इस्तीफे को किसी राजनीतिक दल से जोड़ना तथ्य नहीं, बल्कि कयास ही माना जाना चाहिए।
लेकिन सवाल सिर्फ दिव्या मित्तल का नहीं है। भारतीय लोकतंत्र में प्रशासनिक सेवा से राजनीति में आने की परंपरा पुरानी है। छत्तीसगढ़ इसका बड़ा उदाहरण है। अविभाजित मध्य प्रदेश में आईएएस अधिकारी रहे अजीत जोगी ने प्रशासनिक सेवा छोड़कर राजनीति का रास्ता चुना। वे कांग्रेस में शामिल हुए, राज्यसभा पहुंचे और आगे चलकर वर्ष 2000 में छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री बने।
यानी एक आईएएस अधिकारी के लिए कलेक्टर की कुर्सी से मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचना भारतीय लोकतंत्र में असंभव नहीं है।ये उन्होंने बता दिया .
छत्तीसगढ़ का दूसरा महत्वपूर्ण उदाहरण ओपी चौधरी का है। 2005 बैच के आईएएस अधिकारी और रायपुर के तत्कालीन कलेक्टर चौधरी ने वर्ष 2018 में सेवा से इस्तीफा दिया और कुछ ही दिनों बाद भाजपा में शामिल हो गए। उन्होंने उस समय सक्रिय राजनीति के माध्यम से लोगों की सेवा करने की इच्छा को अपने निर्णय का कारण बताया था।
आज वही ओपी चौधरी छत्तीसगढ़ सरकार में वित्त मंत्री हैं। यह उदाहरण बताता है कि प्रशासनिक अनुभव राजनीति में एक बड़ी पूंजी बन सकता है। अफसर व्यवस्था को भीतर से जानता है, सरकारी मशीनरी की कार्यप्रणाली समझता है, जिलों की सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं से परिचित होता है और नीति लागू करने की चुनौतियों को करीब से देख चुका होता है।
लेकिन यहीं से एक दूसरा सवाल भी पैदा होता है। क्या प्रशासनिक पद राजनीतिक भविष्य की तैयारी का मंच बनता जा रहा है?
किसी अधिकारी का नौकरी छोड़कर राजनीति में आना अपने आप में गलत नहीं है। संविधान लोकतांत्रिक राजनीति में प्रवेश का अधिकार देता है और यदि कोई अधिकारी सेवा छोड़कर खुले तौर पर किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है, तो यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। समस्या तब पैदा होती है, जब किसी अधिकारी के प्रशासनिक कार्यकाल और उसके राजनीतिक भविष्य के बीच हितों के टकराव की आशंका दिखाई देने लगे।
मसलन, यदि कोई अधिकारी किसी राजनीतिक दल के नेतृत्व के साथ लगातार निकटता में दिखाई देता है और उसके बाद अचानक इस्तीफा देकर उसी दल में शामिल हो जाता है, तो जनता सवाल पूछेगी। यह सवाल भी स्वाभाविक है कि क्या सेवा के दौरान लिए गए निर्णय पूरी तरह प्रशासनिक थे या भविष्य की राजनीतिक संभावनाओं से भी प्रभावित थे? और यही कारण है कि नौकरशाही की निष्पक्षता लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण शर्तों में से एक है।
इस कहानी का दूसरा पहलू और भी गंभीर है।
मध्य प्रदेश के कटनी में निलंबित डीएसपी नेहा पच्चीसिया का मामला प्रशासनिक व्यवस्था के लिए अलग तरह का सवाल खड़ा करता है। जमीन सौदे से जुड़े मामले में उनके खिलाफ कार्रवाई हुई, गिरफ्तारी से बचने के बाद उन पर ₹10 हजार का इनाम घोषित होने और लुकआउट सर्कुलर की प्रक्रिया शुरू किए जाने की रिपोर्ट सामने आई है।
छत्तीसगढ़ में भी को कथित वित्तीय अनियमितताओं, पद के दुरुपयोग, एक कारोबारी से जुड़े संवेदनशील पुलिस संबंधी संपर्क और आय से अधिक संपत्ति के आरोपों की प्रारंभिक जांच के बाद निलंबित किया गया। हालांकि किसी आईएएस या आईपीएस अधिकारी पर भ्रष्टाचार या आय से अधिक संपत्ति का आरोप लग जाना अपने आप में उसकी दोषसिद्धि नहीं है। जांच, न्यायिक प्रक्रिया और अंतिम निर्णय का इंतजार करना लोकतांत्रिक और कानूनी दोनों दृष्टियों से आवश्यक है। लेकिन यदि किसी अधिकारी के खिलाफ गंभीर आरोप सामने आते हैं, जांच लंबित रहती है और कार्रवाई होती है, तो इससे पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल जरूर उठता है। क्योंकि जनता के लिए पुलिस और प्रशासन सिर्फ एक सरकारी विभाग नहीं हैं—वे राज्य की विश्वसनीयता का चेहरा हैं।
तमिलनाडु के के. अन्नामलाई का उदाहरण इस पूरी बहस को एक अलग दिशा देता है। उन्होंने 2019 में भारतीय पुलिस सेवा से इस्तीफा दिया और 2020 में भाजपा में शामिल हुए। बाद में वे तमिलनाडु भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बने और राज्य की राजनीति में एक प्रमुख चेहरा बनकर उभरे। लेकिन 2026 में उन्होंने भाजपा भी छोड़ दी और एक नए राजनीतिक आंदोलन की घोषणा की, जिसे आगे चलकर राजनीतिक दल में बदलने की बात कही। उन्होंने अपने निर्णय के पीछे तमिलनाडु की राजनीति को लेकर भाजपा नेतृत्व से मतभेदों का उल्लेख किया।
अन्नामलाई का मामला यह दिखाता है कि प्रशासन से राजनीति में आने वाला प्रत्येक व्यक्ति केवल किसी दल का कार्यकर्ता नहीं रहता। वह अपनी प्रशासनिक छवि, व्यक्तिगत लोकप्रियता और जनता के बीच बनी विश्वसनीयता को राजनीतिक पूंजी में बदल सकता है। यही कारण है कि राजनीतिक दल भी ब्यूरोक्रेसी से आने वाले चेहरों को आकर्षित करते हैं।
लेकिन फिर देशसेवा का सवाल क्यों उठता है?
जब कोई अधिकारी राजनीति में प्रवेश करता है तो वह अक्सर कहता है—“मैं अब और व्यापक स्तर पर जनता की सेवा करना चाहता हूं।” यह तर्क सुनने में बिल्कुल उचित है। लेकिन तब जनता का एक सरल सवाल भी है—
जब आप आईएएस या आईपीएस थे, तब भी तो आप देश और जनता की सेवा ही कर रहे थे। फिर राजनीति में आने की आवश्यकता क्यों पड़ी?
इसका उत्तर भी उतना ही सरल है—प्रशासन व्यवस्था को लागू करता है, जबकि राजनीति व्यवस्था की दिशा तय करती है। एक कलेक्टर जिले में योजनाओं को लागू कर सकता है, लेकिन विधायक कानून बनाने में भूमिका निभाता है। मंत्री नीतियां बनाता है। मुख्यमंत्री शासन की प्राथमिकताएं तय करता है। इसलिए कोई अधिकारी यह मान सकता है कि उसकी क्षमता का बेहतर उपयोग राजनीति में हो सकता है। इस सोच को गलत नहीं कहा जा सकता।
गलत तब होगा, जब प्रशासनिक सेवा को राजनीतिक महत्वाकांक्षा की सीढ़ी बनाया जाए।
भ्रष्टाचार के आरोप और राजनीति में प्रवेश के बीच एक और संवेदनशील प्रश्न है—क्या कभी अधिकारी भ्रष्टाचार या जांच से बचने के लिए राजनीति का रास्ता चुनते हैं? इसका सामान्यीकृत उत्तर देना थोड़ा खतरनाक होगा।
क्योंकि किसी अधिकारी के इस्तीफे को भ्रष्टाचार से जोड़ देना केवल इसलिए उचित नहीं है क्योंकि उसने बाद में राजनीति में प्रवेश किया। इसी तरह किसी अधिकारी के किसी राजनीतिक नेता से मिलने भर से यह निष्कर्ष निकालना भी उचित नहीं कि वह राजनीति में जाने वाला है।
भारत जैसे लोकतंत्र में हमेंकयास और तथ्य के बीच की रेखा बनाए रखनी होगी। किसी अधिकारी पर आरोप है तो जांच हो। दोष सिद्ध है तो कार्रवाई हो। राजनीति में आना है तो खुले तौर पर आए। और यदि कोई अधिकारी सेवा छोड़कर चुनाव लड़ना चाहता है तो जनता उसके प्रदर्शन, विचार और चरित्र के आधार पर फैसला कर ही देती है ।
आज असली चिंता यह नहीं होनी चाहिए कि कितने आईएएस या आईपीएस राजनीति में आए। असल चिंता यह होनी चाहिए कि सेवा में रहते हुए उनकी निष्पक्षता कितनी सुरक्षित रही? लोकतंत्र में सरकार बदलती रहती है, राजनीतिक दल बदलते रहते हैं, मंत्री बदलते रहते हैं। लेकिन प्रशासनिक संस्थाएं बनी रहती हैं। इसलिए एक अधिकारी को सत्ता में बैठे व्यक्ति से नहीं, संविधान से निष्ठा रखनी चाहिए। उसे सरकार की नीतियों को लागू करना है, लेकिन कानून और नियमों के भीतर। उसे मंत्री के निर्देशों का पालन करना है, लेकिन गैरकानूनी आदेशों का नहीं। उसे जनता के प्रति जवाबदेह होना है, किसी राजनीतिक दल के प्रति नहीं।
दिव्या मित्तल का इस्तीफा आने वाले दिनों में राजनीति से जुड़ता है या नहीं, यह भविष्य बताएगा। मगर ओपी चौधरी का उदाहरण बताता है कि प्रशासन से राजनीति में आकर व्यक्ति प्रभावशाली राजनीतिक भूमिका निभा सकता है।
अजीत जोगी का उदाहरण बताता है कि एक नौकरशाह लोकतांत्रिक राजनीति की सर्वोच्च राज्य स्तरीय कुर्सी तक पहुंच सकता है। अन्नामलाई का उदाहरण बताता है कि प्रशासन से राजनीति और एक राजनीतिक दल से अलग राजनीतिक मंच तक की यात्रा भी संभव है। और कटनी तथा छत्तीसगढ़ के मामलों में सामने आई जांच यह याद दिलाती है कि वर्दी या प्रशासनिक पद किसी व्यक्ति को कानून से ऊपर नहीं रखता।
इसलिए बहस यह नहीं होनी चाहिए कि “अफसर राजनीति में क्यों जा रहे हैं?” बहस यह होनी चाहिए कि— “जब तक वे अफसर हैं, क्या वे पूरी तरह निष्पक्ष हैं?”
और दूसरी तरफ— “जब वे राजनीति में आ जाएं, तो क्या जनता उन्हें उनके प्रशासनिक रिकॉर्ड के साथ-साथ उनके राजनीतिक विचारों और जवाबदेही के आधार पर परखती है?”
लोकतंत्र में सत्ता बदलना सामान्य है, लेकिन संस्थाओं की विश्वसनीयता का गिरना खतरनाक है। आईएएस हो या आईपीएस, मंत्री हो या मुख्यमंत्री—पद अस्थायी है, लेकिन संस्थाएं स्थायी हैं। इसलिए देश को ऐसे नौकरशाह चाहिए जो राजनीति में आएं तो खुले चेहरे के साथ आएं और सेवा में रहें तो बिना राजनीतिक चश्मे के काम करें। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ी जरूरत राजनीतिक नौकरशाही की नहीं, बल्कि निष्पक्ष नौकरशाही और जवाबदेह राजनीति की है। यही दोनों मिलकर सुशासन की नींव रखते हैं।