नरेन्द्र पाण्डेय : अपराध हमारे समाज का ऐसा विषय है, जिसे हम अक्सर घटना के बाद देखते हैं। अपराध हुआ, पुलिस पहुंची, आरोपी पकड़ा गया, अदालत में मामला गया और फिर हमारा ध्यान किसी दूसरी खबर की ओर चला जाता है। लेकिन अपराध की कहानी इतनी सरल नहीं होती। अपराध के पीछे एक व्यक्ति होता है, उसका मन होता है, उसका परिवार होता है, उसका सामाजिक परिवेश होता है और कई बार ऐसी परिस्थितियां होती हैं, जिन्हें समझे बिना अपराध की पूरी तस्वीर सामने नहीं आती।
डॉ. शुभ्रा सान्याल की पुस्तक Crime and Criminality: A Mirror to the Criminal World इसी जटिल दुनिया को समझने का प्रयास करती है। पुस्तक अपराध को केवल कानून या दंड के नजरिए से नहीं देखती, बल्कि criminology, psychology, sociology, victimology और correctional studies जैसे विभिन्न आयामों को साथ लेकर अपराध के कारणों, उसके स्वरूप और उसके परिणामों को समझने की कोशिश करती है।
डॉ. शुभ्रा सान्याल जी से मेरा जुड़ाव पिछले लगभग पांच वर्षों से है। इस दौरान कई ऑनलाइन कार्यक्रमों में उनके साथ संवाद और चर्चा करने का अवसर मिला। अपराध, Criminal Psychology, किशोर अपराध, सुधार और समाज की भूमिका जैसे विषयों पर उनसे बातचीत करते हुए मैंने महसूस किया कि उनकी दृष्टि अपराध को केवल ‘अपराध’ के रूप में देखने की नहीं, बल्कि उसके पीछे के मनुष्य को समझने की है। इसलिए जब उनकी यह पुस्तक पढ़ी तो मेरे लिए यह केवल एक पुस्तक समीक्षा का विषय नहीं रहा, बल्कि उन वर्षों के संवादों को एक व्यवस्थित रूप में देखने का अवसर भी बना।
अपराध हुआ क्यों?
इस पुस्तक का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न मुझे यही लगता है—अपराध हुआ क्यों?
हम अक्सर पूछते हैं—अपराध किसने किया? उसे कितनी सजा मिलनी चाहिए? ये प्रश्न अपनी जगह बिल्कुल आवश्यक हैं। लेकिन यदि हम अपराध को रोकना चाहते हैं, तो हमें यह भी पूछना होगा कि उस व्यक्ति के व्यवहार के पीछे कौन-सी परिस्थितियां थीं।
पुस्तक बताती है कि आपराधिक व्यवहार के पीछे मनोवैज्ञानिक संघर्ष, प्रतिकूल सामाजिक वातावरण और सामाजिक असमानताएं जैसे कई कारक भूमिका निभा सकते हैं। साथ ही समय पर हस्तक्षेप, काउंसलिंग और समुदाय की भागीदारी को अपराध की रोकथाम और सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण माना गया है।
यहां एक बात बहुत स्पष्ट है—अपराध को समझना, अपराध का समर्थन करना नहीं है।
अपराधी को उसके अपराध के लिए जवाबदेह होना ही चाहिए। पीड़ित को न्याय मिलना चाहिए। कानून का पालन होना चाहिए। लेकिन यदि हम केवल सजा पर रुक जाते हैं और अपराध की जड़ों को नहीं समझते, तो शायद हम अगले अपराध को रोकने की दिशा में बहुत आगे नहीं बढ़ पाएंगे।
अपराधी के पीछे का मनुष्य
पुस्तक की एक बड़ी विशेषता इसका मानवीय दृष्टिकोण है। अपराधी को केवल एक ‘अपराधी’ मानकर समाप्त कर देने के बजाय उसके व्यवहार और मानसिकता को समझने की कोशिश की गई है।
डॉ. सान्याल का अपना अनुभव इस दृष्टिकोण को और महत्वपूर्ण बनाता है। पुस्तक के अनुसार उन्होंने 2006 से 2014 तक दिल्ली के Kingsway Camp स्थित Correctional Home में Children in Conflict with Law के साथ काउंसलिंग का कार्य किया। वे वयस्क अपराधियों और उनके rehabilitation के अध्ययन के लिए Jawaharlal Nehru Fellowship की मिली ।
यह अनुभव विशेष रूप से किशोर अपराध को समझने में महत्वपूर्ण है। जब कोई बच्चा अपराध करता है तो हमें केवल उसका अपराध नहीं देखना चाहिए। उसके पीछे का बचपन, परिवार, शिक्षा, वातावरण और मानसिक स्थिति भी देखनी चाहिए।
सजा जरूरी है, लेकिन जहां सुधार की संभावना हो, वहां सुधार का अवसर देना भी समाज की जिम्मेदारी है।
अपराध की बदलती दुनिया
पुस्तक की विषय-वस्तु काफी व्यापक है। इसमें Criminal Profiling, Juvenile Delinquency, Crimes against Women, Terrorism, Cyber-crime, Prison Subculture और Offender Rehabilitation जैसे विषय शामिल हैं।
यह विषय-विस्तार बताता है कि अपराध भी समय के साथ बदलता है।
आज Cyber-crime हमारे सामने एक बड़ी चुनौती है। अपराध अब केवल सड़क या घर तक सीमित नहीं रहा। डिजिटल दुनिया ने अपराध के नए तरीके भी पैदा किए हैं। ऐसे में अपराध को समझने के लिए तकनीक के साथ-साथ मानव व्यवहार और मनोविज्ञान को समझना भी आवश्यक हो गया है।
यही वजह है कि पुस्तक केवल अपराध की घटनाओं का अध्ययन नहीं करती, बल्कि अपराध की व्यापक सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि को सामने लाने का प्रयास करती है।
पीड़ित को केंद्र में रखना
अपराध पर चर्चा करते समय एक खतरा यह भी रहता है कि हमारा पूरा ध्यान अपराधी पर चला जाता है और पीड़ित पीछे छूट जाता है।
इस पुस्तक की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह अपराध को सनसनीखेज बनाने के बजाय पीड़ितों की पीड़ा, justice, accountability और rehabilitation के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करती है।
मेरे विचार से यह दृष्टिकोण आज के मीडिया और सोशल मीडिया के दौर में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
आज अपराध की कोई भी घटना कुछ ही मिनटों में वायरल हो जाती है। वीडियो, तस्वीरें और अधूरी जानकारियां लोगों तक पहुंचती हैं और कई बार न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही सोशल मीडिया पर फैसला हो जाता है।
लेकिन पत्रकारिता का काम केवल सनसनी पैदा करना नहीं है। अपराध की सूचना देना जरूरी है, लेकिन उसके पीछे के सामाजिक कारणों को समझाना भी उतना ही जरूरी है।
यह पुस्तक आईना क्यों है?
पुस्तक का उपशीर्षक—A Mirror to the Criminal World—अपने आप में बहुत अर्थपूर्ण है।
आईना चेहरा नहीं बदलता। वह सिर्फ चेहरा दिखाता है।
यह पुस्तक भी अपराध की दुनिया को हमारे सामने रखती है और हमें देखने के लिए मजबूर करती है कि अपराध के पीछे कौन-से मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और संस्थागत कारण काम कर सकते हैं।
लेकिन इस आईने में केवल अपराधी का चेहरा दिखाई नहीं देता।
इसमें समाज का चेहरा भी दिखाई देता है।
हमारे परिवारों का, हमारी शिक्षा का, हमारी सामाजिक व्यवस्था का, हमारी संस्थाओं का और बदलती डिजिटल दुनिया का।
पिछले पांच वर्षों में डॉ. शुभ्रा सान्याल जी के साथ हुए मेरे संवादों ने मुझे यह समझने में मदद की है कि अपराध पर बात करते समय संवेदना और वैज्ञानिक दृष्टि दोनों आवश्यक हैं। अपराध को लेकर भावनात्मक प्रतिक्रिया स्वाभाविक है, लेकिन समाधान के लिए हमें उससे आगे जाना होगा।
Crime and Criminality: A Mirror to the Criminal World अपराध को एक व्यापक और मानवीय दृष्टि से समझने का प्रयास करती है। यह पुस्तक अपराधी की मानसिकता, अपराध के सामाजिक कारणों, पीड़ित की स्थिति, किशोर अपराध, साइबर अपराध और अपराधियों के पुनर्वास जैसे महत्वपूर्ण विषयों को एक साथ सामने लाती है।
मेरे लिए इस पुस्तक का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि अपराध को केवल दंड के नजरिए से नहीं, रोकथाम और सुधार के नजरिए से भी देखना होगा।
न्याय जरूरी है।
जवाबदेही जरूरी है।
पीड़ित के प्रति संवेदना जरूरी है।
लेकिन अपराध की जड़ों को समझना भी जरूरी है।
किसी अपराधी को पकड़ लेना कानून की सफलता हो सकती है, लेकिन अपराध को पैदा होने से रोक देना समाज की बड़ी सफलता होगी।
शायद यही इस पुस्तक की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि यह हमें अपराधी को देखने के साथ-साथ अपने समाज को देखने के लिए भी प्रेरित करती है।
अपराध की कहानी केवल अपराधी की कहानी नहीं होती। वह पीड़ित की कहानी भी होती है, परिवार की कहानी भी होती है और उस समाज की कहानी भी होती है, जिसमें अपराध जन्म लेता है।
और इसीलिए Crime and Criminality केवल अपराध की दुनिया का आईना नहीं है—यह कहीं न कहीं हमारे समाज का भी आईना है।