SCGNEWS/लाईफ वर्सिटी : जब कोई सरकार अपने तीसरे बजट को “संकल्प” कहती है, तो वह सिर्फ एक शब्द नहीं चुनती… वह अपने राजनीतिक इरादे की दिशा तय करती है। ज्ञान से शुरुआत हुई थी, गति से रफ्तार दिखाई गई, और अब बात संकल्प की है। यानी ठहरकर सोचने की नहीं, ठानकर करने की मुद्रा। संकल्प… सात अक्षरों का यह शब्द इस बार पूरे बजट का दर्शन बन गया है।
समावेशी विकास — यानी विकास का लाभ केवल शहरों तक सीमित न रहे, गांव और वनांचल भी उसका हिस्सा बनें।
अधोसंरचना — सड़क, पुल, अस्पताल, स्कूल, डिजिटल नेटवर्क… विकास की रीढ़।
निवेश — निजी और सार्वजनिक पूंजी, जो रोजगार का रास्ता खोलती है।
कुशल मानव संसाधन — यानी केवल डिग्री नहीं, दक्षता।
अंत्योदय — सबसे अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक पहुंच।
लाइवलीहुड — रोजगार, आजीविका, आत्मनिर्भरता।
और अंत में पॉलिसी से परिणाम — नीति का मूल्य तभी है, जब वह जमीन पर असर दिखाए।
छत्तीसगढ़ विधानसभा में 24 फरवरी को जब वित्त मंत्री ओपी चौधरी ने 1 लाख 72 हजार करोड़ रुपये का बजट पेश किया, तो यह केवल आय-व्यय का लेखा-जोखा नहीं था। यह एक राजनीतिक घोषणा-पत्र की तरह था, एक संदेश था कि साय सरकार अपने तीसरे वर्ष में किस दिशा में राज्य को ले जाना चाहती है। वित्त मंत्री ओपी चौधरी ने इसे “सुशासन से समृद्धि” की दिशा में निर्णायक कदम बताया। विधानसभा की सीढ़ियों पर माथा टेककर उन्होंने बजट पेश किया — यह दृश्य प्रतीकात्मक था, जैसे सरकार यह जताना चाहती हो कि यह केवल अर्थशास्त्र नहीं, आस्था और उत्तरदायित्व का विषय भी है। लेकिन लोकतंत्र में हर दस्तावेज़ की दो परतें होती हैं — एक सरकारी प्रस्तुति, दूसरी विपक्ष की प्रतिक्रिया। और इन दोनों के बीच छिपी होती है जनता की अपेक्षा। यह बजट भी इसी त्रिकोण के भीतर खड़ा है। राज्य निर्माण के समय जब छत्तीसगढ़ का बजट महज 5 हजार करोड़ था, तब संसाधन सीमित थे, अपेक्षाएं अनंत थीं। आज वही बजट 35 गुना बढ़कर 1 लाख 72 हजार करोड़ तक पहुंच गया है। यह केवल आंकड़ों की वृद्धि नहीं, यह राज्य की आर्थिक यात्रा का दस्तावेज़ है।
पर सवाल यह है कि क्या राशि का विस्तार ही विकास है?

आर्थिक आकार बढ़ना एक उपलब्धि है, पर विकास की असली कसौटी वितरण है — पैसा कहां जा रहा है, किसके जीवन में बदलाव ला रहा है, किस क्षेत्र को प्राथमिकता मिल रही है।
यदि समावेशी विकास सच में लागू होता है, तो यह बजट सामाजिक संतुलन की नई इबारत लिख सकता है। यदि अधोसंरचना निवेश रोजगार में बदलता है, तो यह आर्थिक छलांग साबित हो सकता है। यदि अंत्योदय केवल भाषण में नहीं, बजट आवंटन में दिखे, तो संकल्प सार्थक होगा।
क्योंकि जनता अब आंकड़ों से प्रभावित नहीं होती, वह असर देखती है। सड़क बनी या नहीं? अस्पताल में डॉक्टर है या नहीं? युवा को नौकरी मिली या नहीं? किसान को लाभ मिला या नहीं?
संकल्प शब्द में दृढ़ता है, पर परिणाम में विश्वसनीयता होती है।
इस पूरे बजट को समझने के लिए हमें इसे दस आयामों में देखना होगा — थीम, क्षेत्रीय संतुलन, सामाजिक न्याय, स्वास्थ्य, शिक्षा, उद्योग, अधोसंरचना, रोजगार, राजनीतिक प्रतिक्रिया और अंततः उसके क्रियान्वयन की चुनौती।
छत्तीसगढ़ राज्य बनने के समय 5 हजार करोड़ का बजट था। आज वह 35 गुना बढ़कर 1.72 लाख करोड़ पहुंच गया है। यह वृद्धि केवल संख्यात्मक नहीं, बल्कि राज्य की आर्थिक क्षमता और राजस्व विस्तार का संकेत है।
लेकिन प्रश्न यह है कि बजट का आकार बढ़ना क्या विकास का प्रमाण है?
विकास तब प्रमाणित होता है जब —
- प्रति व्यक्ति आय बढ़े,
- बेरोजगारी घटे,
- स्वास्थ्य और शिक्षा की गुणवत्ता सुधरे,
- और क्षेत्रीय असमानता कम हो।
इस बजट में सरकार ने इन सभी पहलुओं को छूने का प्रयास किया है। लेकिन छूना और सुलझाना — दोनों में फर्क है।
साय सरकार का यह तीसरा बजट है। पहले ‘ज्ञान’, फिर ‘गति’ और अब ‘संकल्प’। यह थीम आधारित प्रस्तुति बताती है कि सरकार बजट को केवल वित्तीय दस्तावेज़ नहीं, बल्कि विचारधारा का विस्तार बनाना चाहती है।
S – समावेशी विकास
A – अधोसंरचना
N – निवेश
K – कुशल मानव संसाधन
A – अंत्योदय
L – लाइवलीहुड
P – पॉलिसी से परिणाम
यह संरचना प्रभावशाली लगती है। लेकिन लोकतंत्र में हर शब्द की कसौटी ज़मीन होती है।
समावेशी विकास का अर्थ — क्या आदिवासी अंचलों की वास्तविक भागीदारी?
अधोसंरचना — क्या केवल सड़कों और पुलों तक सीमित?
निवेश — क्या स्थानीय रोजगार सृजन से जुड़ा?
कुशल मानव संसाधन — क्या स्किलिंग और उद्योग का समन्वय?
अंत्योदय — क्या अंतिम व्यक्ति तक योजनाओं की पहुंच?
लाइवलीहुड — क्या ग्रामीण आय में वृद्धि?
पॉलिसी से परिणाम — क्या पारदर्शी मॉनिटरिंग?
यही वे प्रश्न हैं जो आने वाले वर्षों में इस ‘संकल्प’ की परीक्षा लेंगे।
इस बजट का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है — बस्तर और सरगुजा पर विशेष फोकस।
- अबूझमाड़ और जगरगुंडा में दो एजुकेशन सिटी (100 करोड़)
- 1,500 बस्तर फाइटर्स के पद
- बस्तर नेट परियोजना (5 करोड़)
- धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान (200 करोड़)
- बस्तर-सरगुजा विकास प्राधिकरण (75 करोड़)
- पशुपालन गतिविधियां (15 करोड़)
- अतिरिक्त पोषण सहायता (15 करोड़)
यह संकेत है कि सरकार नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में अब केवल सुरक्षा बलों के भरोसे नहीं, बल्कि शिक्षा, इंटरनेट, खेल, पर्यटन और पोषण की रणनीति के साथ प्रवेश कर रही है। यदि एजुकेशन सिटी वास्तव में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का केंद्र बनती है, तो यह अबूझमाड़ जैसे क्षेत्र में सामाजिक क्रांति की शुरुआत हो सकती है। लेकिन यदि यह केवल भवन निर्माण तक सीमित रह गई, तो इसका प्रभाव प्रतीकात्मक ही रहेगा।
सरकार ने पांच प्रमुख मिशन की घोषणा की है:
- मुख्यमंत्री एआई मिशन
- मुख्यमंत्री खेल उत्कर्ष मिशन
- मुख्यमंत्री पर्यटन विकास मिशन
- मुख्यमंत्री अधोसंरचना मिशन
- मुख्यमंत्री स्टार्टअप एवं एनआईपीयूएन मिशन
एआई मिशन विशेष ध्यान आकर्षित करता है। रायपुर के मेकाहारा में एआई के उपयोग के लिए 10 करोड़ का प्रावधान किया गया है। यह दर्शाता है कि सरकार तकनीकी हस्तक्षेप के माध्यम से स्वास्थ्य सेवाओं को आधुनिक बनाना चाहती है।
खेल उत्कर्ष मिशन के तहत पांच वर्षों तक प्रतिवर्ष 100 करोड़ का प्रावधान — यह युवा शक्ति को खेल के माध्यम से राष्ट्रीय मंच देने की कोशिश है। बस्तर और सरगुजा ओलंपिक इसका सामाजिक विस्तार हैं। पर्यटन विकास मिशन के अंतर्गत मैनपाट के लिए 5 करोड़ — यह पहाड़ी क्षेत्र को पर्यटन मानचित्र पर मजबूत करने का प्रयास है।
स्वास्थ्य क्षेत्र में बड़े प्रावधान किए गए हैं:
- आयुष्मान योजना: 1,500 करोड़
- राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन: 2,000 करोड़
- पांच नए मेडिकल कॉलेज
- रायपुर में होम्योपैथी कॉलेज
- एडवांस कार्डियक इंस्टीट्यूट
- बिलासपुर में राज्य कैंसर संस्थान
- 25 डायलिसिस केंद्र
- 50 जन औषधि केंद्र
- कर्मचारियों के लिए कैशलेस उपचार योजना (100 करोड़)
यदि यह ढांचा समयबद्ध पूरा होता है, तो ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं का स्तर बदल सकता है। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि अस्पतालों की बकाया राशि और डॉक्टरों की कमी को देखते हुए यह राशि पर्याप्त नहीं है।

किसान, मजदूर - महिला और सामाजिक संतुलन साधने का प्रयास किया गया
- जी राम जी योजना: 4,000 करोड़
- खाद्य सुरक्षा: 6,500 करोड़
- तेंदूपत्ता संग्राहकों के लिए चरण पादुका योजना
- गन्ना किसानों को बोनस
- महिलाओं के लिए संपत्ति पंजीयन शुल्क में 50% छूट
यह बजट सामाजिक आधार को मजबूत करने की कोशिश करता है। विशेष रूप से महिलाओं को संपत्ति में रियायत — यह आर्थिक सशक्तिकरण का संकेत है। लेकिन महिला सुरक्षा और गैस सिलेंडर जैसे वादों पर स्पष्ट प्रावधान नहीं दिखने से विपक्ष को हमला करने का अवसर मिला।
उद्योग और अधोसंरचना
- 23 नए औद्योगिक पार्क (250 करोड़)
- औद्योगिक विकास मद (100 करोड़)
- मटनार और देवरगांव बैराज (2024 करोड़)
- आदर्श शहर समृद्धि योजना (200 करोड़)
सरकार का लक्ष्य स्पष्ट है — निवेश आकर्षित करना और रोजगार सृजित करना। लेकिन विपक्ष इसे “कॉरपोरेट झुकाव” कह रहा है और पूछ रहा है कि छोटे उद्योगों और कृषि आधारित इकाइयों के लिए क्या विशेष है?
तंज, ठहाके और टकराव
बजट पेश होने में तीन मिनट की देरी — और विपक्ष का हमला। “जो समय का प्रबंधन नहीं कर पा रहा, उसका वित्तीय प्रबंधन क्या होगा?” ज्ञान, गति के बाद “दुर्गति” का तंज। आलू उत्पादन पर चर्चा और “चूहों” का सवाल। कवासी लखमा का कहना — “हम बजट सुनते-सुनते थक गए।” यह दृश्य लोकतंत्र की जीवंतता दिखाता है। सदन केवल गंभीरता का मंच नहीं, राजनीतिक व्यंग्य का भी अखाड़ा है।
कांग्रेस ने की आलोचना
पूर्व मुख्यमंत्री ने इसे “जुमलों की पतंग” कहा। रोजगार सृजन पर ठोस प्रावधान न होने का आरोप। संविदा कर्मचारियों के नियमितीकरण पर चुप्पी। महिलाओं के लिए विशेष पैकेज का अभाव। विपक्ष का मुख्य तर्क है — घोषणाएं अधिक, परिणाम संदिग्ध।
यह बजट आकार में बड़ा, दृष्टि में व्यापक और प्रस्तुति में प्रभावशाली है। लेकिन असली परीक्षा क्रियान्वयन की है। यदि बस्तर की एजुकेशन सिटी में बच्चों की आवाज गूंजे, यदि सरगुजा के युवा स्टार्टअप शुरू करें, यदि आयुष्मान कार्ड से मरीज को बिना उधारी इलाज मिले, यदि महिला संपत्ति की मालकिन बने — तब यह बजट ऐतिहासिक कहा जाएगा। अन्यथा यह भी राजनीतिक दस्तावेज़ों की भीड़ में खो जाएगा।
छत्तीसगढ़ आज एक चौराहे पर है। एक रास्ता संकल्प से समृद्धि की ओर जाता है। दूसरा रास्ता घोषणाओं से निराशा की ओर। अब देखना है — यह बजट एक इरादा प्रकट करता है — नीति को परिणाम तक ले जाने का। अब देखना यह है कि यह संकल्प प्रशासनिक इच्छाशक्ति में कितना बदलता है। यह बजट किस दिशा का सेतु बनता है। क्योंकि इतिहास गवाह है — घोषणाएं तालियां पाती हैं, पर परिणाम विश्वास कमाते हैं।