नरेन्द्र पाण्डेय : 15 अगस्त आते ही देश का माहौल बदलने लगता है। सड़कों पर तिरंगे दिखाई देते हैं, देशभक्ति के गीत सुनाई देते हैं, स्कूलों और सरकारी संस्थानों में ध्वजारोहण होता है। कुछ घंटों के लिए देशभक्ति सार्वजनिक जीवन का सबसे प्रमुख भाव बन जाती है। फिर 16 अगस्त आते-आते हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में लौट जाते हैं।
लेकिन देशभक्ति क्या केवल राष्ट्रीय पर्वों तक सीमित है?
शायद नहीं। वह व्यक्ति जो अपने काम को ईमानदारी से करता है, अपने कर्तव्य का निर्वहन करता है, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करता है, कानून का सम्मान करता है और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाता है—वह भी प्रतिदिन राष्ट्र निर्माण में योगदान देता है।
इसी सवाल के बीच 2026 में वंदे मातरम् को लेकर एक नई कानूनी और राजनीतिक बहस सामने आई है। Prevention of Insults to National Honour कानून में संशोधन के जरिए वंदे मातरम् के गायन में जानबूझकर बाधा डालने या उसका अपमान करने को भी दंडनीय बनाने का प्रावधान चर्चा के केंद्र में है। इससे एक बार फिर सवाल उठा है कि राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत का संवैधानिक, कानूनी और सांस्कृतिक स्थान क्या है?
वंदे मातरम्: एक गीत से राष्ट्रीय प्रतीक तक
वंदे मातरम् की कहानी केवल एक गीत की कहानी नहीं है। यह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन, राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक राजनीति के कई दौरों से होकर गुजरी है।
बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 19वीं सदी के उत्तरार्ध में इसकी रचना की। इसके शुरुआती दो पदों में मातृभूमि की प्रकृति, उसकी हरियाली, समृद्धि और सौंदर्य का वर्णन मिलता है। बाद में इसे उनके उपन्यास ‘आनंदमठ’ का हिस्सा बनाया गया और गीत के विस्तृत संस्करण में देवी दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसे धार्मिक प्रतीकों का उल्लेख आया।
यहीं से वंदे मातरम् के साथ एक जटिल बहस भी जुड़ गई।
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष का लोकप्रिय गीत बना। 1896 के कांग्रेस अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे गाया। आगे चलकर यह स्वतंत्रता सेनानियों के बीच प्रेरणा का स्रोत बना।
लेकिन समय के साथ इसके धार्मिक संदर्भों को लेकर मुस्लिम समाज के एक हिस्से में आपत्तियां भी सामने आईं। 1930 के दशक में यह विवाद इतना बढ़ा कि कांग्रेस कार्यसमिति को इस पर विचार करना पड़ा। रवींद्रनाथ टैगोर से भी सलाह ली गई। अंततः यह तय हुआ कि सार्वजनिक राजनीतिक कार्यक्रमों में गीत के शुरुआती दो पदों का इस्तेमाल किया जाए, क्योंकि उनमें धार्मिक विवाद की संभावना अपेक्षाकृत कम थी।
यानी स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं ने राष्ट्रवाद और धार्मिक संवेदनशीलता—दोनों के बीच संतुलन खोजने का प्रयास किया।
फिर जन गण मन और वंदे मातरम् दोनों के बराबर सम्मान पर बहस क्यों ?
आज भी एक धारणा बार-बार सामने आती है कि वंदे मातरम् को पीछे छोड़कर जन गण मन को राष्ट्रगान बनाने के पीछे किसी राजनीतिक या धार्मिक दबाव की भूमिका थी। लेकिन इतिहास इससे अधिक जटिल है।
24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अंतिम सत्र में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि ‘जन गण मन’ भारत का राष्ट्रगान होगा और ‘वंदे मातरम्’, जिसने स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई, उसे समान सम्मान दिया जाएगा।
इसलिए दोनों के बीच श्रेष्ठता की लड़ाई खड़ी करना इतिहास को बहुत सरल बना देना होगा।
जन गण मन को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार करने के पीछे उसकी भाषा, संगीत, संरचना और राष्ट्रीय समारोहों में उपयोग की व्यावहारिकता जैसे तर्क भी दिए गए थे। दूसरी ओर वंदे मातरम् स्वतंत्रता आंदोलन की ऐतिहासिक स्मृति और भावनात्मक ऊर्जा का प्रतीक बना रहा।
इस दृष्टि से दोनों की भूमिकाएं अलग होते हुए भी राष्ट्रीय चेतना में महत्वपूर्ण हैं।
अब बात हमारे राष्ट्रीय ध्वज की .
राष्ट्रगान जहां राष्ट्र की आवाज बनता है, वहीं राष्ट्रीय ध्वज राष्ट्र की दृश्य पहचान है।
भारत के राष्ट्रीय ध्वज की यात्रा भी एक दिन में पूरी नहीं हुई। 1906 में कोलकाता के पारसी बागान स्क्वायर में एक राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया। इसके बाद मैडम भीकाजी कामा ने विदेश की धरती पर भारतीय ध्वज को प्रदर्शित किया। एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक के होमरूल आंदोलन से जुड़े ध्वज ने भी राष्ट्रीय प्रतीक के विकास में भूमिका निभाई।
1921 में पिंगली वेंकैया ने एक ध्वज का प्रारूप प्रस्तुत किया, जिसमें लाल और हरे रंग थे। महात्मा गांधी के सुझाव पर सफेद रंग और चरखे को इसमें शामिल किया गया।
1931 में तिरंगे का एक अधिक स्पष्ट स्वरूप सामने आया और अंततः 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने वर्तमान तिरंगे को भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकार किया।
चरखे की जगह अशोक चक्र आया। महत्वपूर्ण बात यह थी कि राष्ट्रीय ध्वज के तीन रंगों को किसी विशेष धर्म का प्रतिनिधि नहीं माना गया। तिरंगा एक पंथनिरपेक्ष राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में स्वीकार किया गया।
यहाँ एक बात समझने की है कि झंडा केवल कपड़ा नहीं,यह सामूहिकता की पहचान है
समाजशास्त्र और संकेत-विज्ञान यानी Semiotics की दृष्टि से देखें तो झंडा एक शक्तिशाली प्रतीक है। वह कुछ रंगों और आकृतियों से कहीं अधिक होता है।
एक तिरंगे को देखते ही हमारे भीतर स्वतंत्रता आंदोलन, सैनिकों का बलिदान, संविधान, सीमाएं, संस्कृति और करोड़ों नागरिकों की साझा पहचान जैसी अनेक भावनाएं एक साथ सक्रिय हो जाती हैं।
यही कारण है कि दुनिया के लगभग हर राष्ट्र के पास अपना ध्वज है।
झंडा हमें बताता है कि हम कौन हैं और किस सामूहिक पहचान से जुड़े हैं। युद्ध के मैदान में वह सेनाओं की पहचान था; आधुनिक राष्ट्र-राज्य में वह संप्रभुता और राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक बन गया।
मगर भारत में राष्ट्रीय ध्वज को लेकर राजनीतिक बहस भी नई नहीं है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के भगवा ध्वज को लेकर उसकी वैचारिक परंपरा और तिरंगे के साथ उसके संबंध पर लंबे समय से राजनीतिक विवाद होता रहा है।
आरएसएस की स्थापना के शुरुआती दौर में भगवा ध्वज को संगठनात्मक प्रतीक के रूप में महत्व दिया गया। बाद के दशकों में तिरंगे के प्रति संगठन के रुख को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप हुए। हालांकि वर्तमान में संघ नेतृत्व सार्वजनिक रूप से तिरंगे के सम्मान और उसके लिए बलिदान की बात करता रहा है।
फिर देशभक्ति आखिर है क्या? शायद सबसे बड़ा सवाल यही है।
क्या देशभक्ति केवल वंदे मातरम् गाने में है? क्या केवल तिरंगा फहराने में है? क्या केवल सोशल मीडिया पर राष्ट्रवादी पोस्ट डालने में है?
इन सबका अपना भावनात्मक महत्व है। लेकिन राष्ट्रभक्ति का वास्तविक अर्थ इससे कहीं बड़ा है।
जब कोई शिक्षक ईमानदारी से पढ़ाता है, किसान मेहनत से अन्न पैदा करता है, डॉक्टर अपने मरीज की सेवा करता है, सैनिक सीमा पर खड़ा रहता है, पत्रकार सत्ता से सवाल पूछता है, नागरिक कानून का पालन करता है और कोई व्यक्ति सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी को चुनता है—तब राष्ट्रभक्ति किसी गीत या झंडे से आगे बढ़कर जीवन का व्यवहार बन जाती है।
तिरंगा हमें केवल गर्व करना नहीं सिखाता, वह जिम्मेदारी भी याद दिलाता है।
वंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं, स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृति है। जन गण मन केवल राष्ट्रगान नहीं, आधुनिक भारत की सामूहिक आकांक्षा का प्रतीक है। और तिरंगा केवल तीन रंगों का कपड़ा नहीं—यह उस भारत का दृश्य रूप है, जिसे करोड़ों लोगों ने मिलकर बनाया है।
इसलिए 15 अगस्त को तिरंगा जरूर फहराएं, वंदे मातरम् और जन गण मन का सम्मान जरूर करें। लेकिन 16 अगस्त को भी यह सवाल अपने साथ रखें—
क्या हम अपने हिस्से की ईमानदारी, जिम्मेदारी और कर्तव्य निभा रहे हैं?
क्योंकि शायद राष्ट्रभक्ति का सबसे सुंदर रूप वही है, जिसे दिखाने के लिए किसी मंच, माइक या कैमरे की जरूरत नहीं पड़ती।
वन्दे मातरम . जय हिन्द