नरेन्द्र पाण्डेय : क्या आपने कभी सोचा है… जिस पार्वती के पास राजमहल था, सौंदर्य था, आभूषण थे और संसार की सारी सुख-सुविधाएं थीं… आखिर उन्हें ऐसा क्या त्यागना पड़ा कि स्वयं महादेव उनके जीवनसाथी बने?
क्या शिव उनके सौंदर्य से प्रभावित नहीं हुए? या फिर पार्वती को यह समझ आ गया था कि शिव को पाने के लिए केवल सुंदर दिखना पर्याप्त नहीं है? यहीं से हरितालिका तीज की कथा एक साधारण व्रत-कथा से आगे बढ़कर जीवन का एक गहरा दर्शन बन जाती है।
एक ओर राजकुमारी पार्वती थीं—सौंदर्य और वैभव से संपन्न।
दूसरी ओर शिव थे—कैलाशवासी योगी, जिनके लिए राजसी ठाठ-बाट, आभूषण और सांसारिक आकर्षण का कोई विशेष अर्थ नहीं था।
पार्वती ने शिव को पाने के लिए पहले उन्हें अपने सौंदर्य से आकर्षित करने का प्रयास किया होगा—लेकिन जब उन्हें समझ आया कि शिव की दृष्टि बाहरी रूप पर नहीं, आत्मा और साधना पर है, तब उनकी यात्रा बदल गई।
राजसी वस्त्र उतरने लगे… आभूषण पीछे छूट गए… सुख-सुविधाओं का त्याग हुआ… और शुरू हुई तपस्या। लेकिन ध्यान रखिए—यह केवल वस्त्र बदलने की कहानी नहीं है। यह उस क्षण की कहानी है, जब पार्वती ने बाहर का श्रृंगार उतारकर भीतर का श्रृंगार करना शुरू किया। और शायद यही हरितालिका तीज का सबसे गहरा संदेश है— जिसे हम पाना चाहते हैं, क्या हम उसके योग्य बनने के लिए स्वयं को बदलने को तैयार हैं?
यही प्रश्न हमें हरितालिका की उस कथा तक ले जाता है, जिसमें एक राजकुमारी अपने मन के वर को पाने के लिए न केवल संसार से, बल्कि अपने भीतर के अहंकार से भी संघर्ष करती है। ‘हरितालिका’—हरित अर्थात हरण करके ले जाना और आलिका अर्थात सखी। यानी वह सखी, जो पार्वती को उनकी इच्छा के विरुद्ध होने वाले विवाह से बचाकर वन ले गई। वहां पार्वती ने शिव को पाने के लिए तप किया और अंततः उनका संकल्प पूरा हुआ।
लेकिन इस कथा में छिपा सवाल आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है— विवाह आखिर किसका निर्णय है? समाज का, परिवार का... या उन दो लोगों का, जिन्हें जीवनभर साथ रहना है? यहीं से हरितालिका तीज की कथा आज के दाम्पत्य जीवन से जुड़ती है। पार्वती ने शिव को चुना था। लेकिन उन्होंने केवल एक पति नहीं चुना था; उन्होंने ऐसा जीवन चुना था, जिसमें उन्हें अपने व्यक्तित्व के साथ स्वीकार किया जाए।
तो क्या हरितालिका तीज केवल पति को पाने या उसकी लम्बी उम्र के लिये रखे जाने वाला व्रत है. मेरे विचार से नहीं क्योंकि इस कथा के भीतर एक स्त्री की इच्छा, उसका संकल्प, और जीवन साथी चुनने का साहस छिपा है. पार्वती ने शिव को उनके वैभव के कारण नहीं चुना था. क्योंकि शिव के पास राजमहल नहीं था. वे तो संसार सामान्य अपेक्षाओं से परे थे फिरभी पार्वती ने उन्हें अपना जीवन साथी बनाया.
शिव पार्वती का यही संबंध हमें एक महत्वपूर्ण सन्देश देता है. दोनों अलग है फिर भी साथ हैं शिव भी पार्वती को बदलने नहीं आए। दोनों अलग थे, लेकिन साथ थे।
शिव वैराग्य हैं, पार्वती शक्ति।
शिव ध्यान हैं, पार्वती सृजन।
फिर भी दोनों अधूरे नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। शायद यही आज के विवाह के लिए सबसे बड़ा संदेश है।
दाम्पत्य का अर्थ यह नहीं कि दो लोग एक जैसे हो जाएं। दाम्पत्य का अर्थ है—दो अलग व्यक्तित्व एक-दूसरे के अंतर को स्वीकार करते हुए साथ चलें।
आज रिश्तों में तनाव का एक बड़ा कारण है बढ़ती. पति चाहता है कि पत्नी उसकी तरह सोचे और पत्नी चाहती है कि पति उसकी भावनाओं को बिना कहे समझ जाए। पति चाहता है पत्नी उसके हिसाब से चले और पत्नी चाहती है पति उसके अनुसार धीरे-धीरे शिकायतें बढ़ती जाती हैं। और बातचीत कम होती है. एक ही घर में रहने वाले दो लोग कभी-कभी एक-दूसरे से यह पूछना भी भूल जाते हैं— “तुम सच में कैसे हो?” क्योंकि कई बार प्रेम खत्म नहीं होता, सिर्फ संवाद खत्म हो जाता है.
हरितालिका तीज इसलिए केवल पति की लंबी उम्र के लिए रखा जाने वाला व्रत नहीं हो सकती। इसे रिश्ते की लंबी उम्र के संकल्प के रूप में भी देखा जा सकता है। पत्नी पति की दीर्घायु की कामना करे, तो पति भी पत्नी के सम्मान और उसके सपनों की रक्षा का संकल्प ले।
व्रत केवल भोजन का न हो—अहंकार का भी हो। पूजा केवल शिव-पार्वती की न हो—अपने रिश्ते में विश्वास की भी हो। और साथ केवल जीवन बिताने का न हो—जीवन को बेहतर बनाने का हो।
आज जब पति-पत्नी दोनों अपने करियर, सपनों और जिम्मेदारियों के साथ आगे बढ़ रहे हैं, विवाह भी साझेदारी की मांग करता है। यहां किसी एक का वर्चस्व नहीं, दोनों की सहभागिता महत्वपूर्ण है। इसीलिए अर्धनारीश्वर की कल्पना इतनी गहरी है—शिव और शक्ति अलग होकर भी एक हैं। पूर्णता किसी एक के मिट जाने में नहीं, दोनों के साथ बने रहने में है। हरितालिका की कथा में पार्वती ने अपना शिव चुना था।
आज की तीज शायद हमसे एक और सवाल पूछती है—
क्या हमने भी अपने जीवनसाथी को सचमुच स्वीकार किया है, या अब भी उसे अपनी अपेक्षाओं के अनुसार बदलने में लगे हैं?
तो इस हरितालिका तीज पर पति की लम्बी उम्र के साथ रिश्तों की लम्बी उम्र का संकल्प भी रखें
व्रत के साथ विश्वास और पूना के साथ सम्मान हो. और साथ रहने के साथ - साथ निभाने की प्रतिबद्धता भो होनी चाहिए.
क्योंकि जब पति पत्नी एक दूसरे को बदलने के बजाय एक दूसरे की शक्ति बनते है तभी दाम्पत्य केवल विवाह नहीं रहता वाह शिव और शक्ति का संगम हो जाता है.