सृष्टि, प्रेम और परिवार का वैदिक दर्शन


हम सामान्यतः यह कल्पना कर लेते हैं कि सृष्टि के आरम्भ में केवल ब्रह्म था—एकाकी, निरपेक्ष और निर्विकार। किंतु वैदिक दर्शन इस धारणा को स्वीकार नहीं करता। जहाँ अस्तित्व है, वहाँ उसकी अभिव्यक्ति भी है। जहाँ अग्नि है, वहाँ उसका अन्न भी है। जहाँ पुरुष है, वहाँ उसकी शक्ति भी है। इसलिए ब्रह्म कभी अकेला नहीं हो सकता।


वेद अग्नि और सोम को सृष्टि के दो मूल तत्त्व मानते हैं। अग्नि चेतना है, पुरुष है, प्रकाश है, प्राण है। सोम उसका पोषण है, उसकी शक्ति है, उसका रस है, उसकी माया है। अग्नि बिना सोम के जल नहीं सकती और सोम बिना अग्नि के अपना प्रयोजन सिद्ध नहीं कर सकता। यही कारण है कि विष्णु को केवल पालनकर्ता ही नहीं, सृष्टि के मूल प्रवर्तक के रूप में भी देखा गया है। प्रलय के अनंत जल में शयन करते विष्णु वस्तुतः उस चेतना का प्रतीक हैं, जिसके गर्भ में सम्पूर्ण सृष्टि बीज रूप में स्थित रहती है।


प्रलय में कुछ भी नष्ट नहीं होता। केवल नाम और रूप विलीन होते हैं। तत्त्व अपने कारण रूप में विद्यमान रहते हैं। अग्नि प्राण रूप में स्थित रहती है और सोम बीज रूप में। जब मातरिश्वा वायु उस बीज को गति देती है, तब सृष्टि का प्रथम स्पन्दन उत्पन्न होता है। इसी स्पन्दन को ब्रह्मा का प्राकट्य कहा गया है।


अंधकार केवल प्रकाश का अभाव नहीं है; वह संभावनाओं का क्षेत्र भी है। उसी अंधकार को पुराणों ने असुरों का प्रदेश कहा, उसी को योगशास्त्र ने अविद्या कहा और उसी को वेदान्त ने माया कहा। माया वस्तुतः आवरण है। वह सत्य को छिपाती भी है और उसी तक पहुँचने का मार्ग भी बनाती है। इसलिए माया शत्रु नहीं, ब्रह्म की शक्ति है।


मनुष्य के भीतर भी यही ब्रह्म और माया निरंतर कार्यरत हैं। प्राण ब्रह्म है और श्वास उसकी गति। कामना माया है और वही जीवन को दिशा देती है। यदि कामना न हो तो सृष्टि का प्रवाह रुक जाए। यदि केवल कामना ही हो और ज्ञान न हो तो मनुष्य अंधकार में भटकता रहे। ज्ञान का प्रकाश अविद्या को हटाता है, किंतु माया का अस्तित्व समाप्त नहीं करता। वह केवल उसके वास्तविक स्वरूप का बोध करा देता है।


इसीलिए भारतीय दर्शन द्वैत और अद्वैत को विरोधी नहीं मानता। ब्रह्म और माया अलग दिखाई देते हैं, पर वास्तव में अभिन्न हैं। जैसे अग्नि और उसकी ऊष्मा, सूर्य और उसका प्रकाश, जल और उसकी तरलता। इसी सत्य को अर्धनारीश्वर की मूर्ति में अभिव्यक्त किया गया है। आधा शिव और आधी शक्ति—यह कोई मूर्तिकला नहीं, बल्कि सम्पूर्ण अस्तित्व का वैज्ञानिक प्रतीक है।


पुरुष चेतना का प्रतिनिधि है और स्त्री शक्ति का। पुरुष बीज है तो स्त्री भूमि। वर्षा और पृथ्वी दोनों मिलकर ही अन्न उत्पन्न करते हैं। बीज अकेला वृक्ष नहीं बन सकता और भूमि अकेले फसल नहीं उगा सकती। यही सृष्टि का सनातन सिद्धान्त है।


विवाह केवल दो व्यक्तियों का सामाजिक अनुबंध नहीं है। यह ब्रह्म और माया के पुनर्मिलन का वैदिक संस्कार है। पुरुष अपने भीतर की चेतना लेकर आता है और स्त्री अपनी सृजनशक्ति। दोनों का मिलन केवल शरीरों का नहीं, संकल्पों का होना चाहिए। जहाँ केवल शरीर मिलते हैं वहाँ भोग जन्म लेता है; जहाँ आत्माएँ मिलती हैं वहाँ सृष्टि आगे बढ़ती है।


आज की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि आधुनिक शिक्षा ने शरीर को तो समझा, किंतु जीवात्मा को भुला दिया। विवाह उत्सव रह गया, संस्कार नहीं। प्रेम आकर्षण रह गया, तप नहीं। परिणाम यह हुआ कि संबंधों में आत्मा का स्थान शरीर ने ले लिया और सृजन का स्थान उपभोग ने।


स्त्री के भीतर प्रकृति ने एक अद्भुत संकल्प स्थापित किया है। वह केवल संतान को जन्म नहीं देती; वह ब्रह्मांश को अपने भीतर प्रतिष्ठित करती है। गर्भ उसके लिए केवल जैविक प्रक्रिया नहीं, बल्कि ब्रह्म और माया के अद्वैत का पुनः साकार होना है। इसलिए भारतीय संस्कृति ने गर्भ को मंदिर माना और गर्भसंस्कार को यज्ञ।


नई सृष्टि का निर्माण शुक्र और डिंब के मिलन से पहले ही प्रारम्भ हो जाता है। वह तब प्रारम्भ होता है जब दो चेतनाएँ एक ही संकल्प में प्रवेश करती हैं। जैविक मिलन तो उसका अंतिम दृश्य है; वास्तविक प्रक्रिया सूक्ष्म स्तर पर पहले ही आरम्भ हो चुकी होती है।


इसीलिए कहा गया है—ब्रह्म सृजन नहीं करता, ब्रह्म की शक्ति सृजन कराती है। माया ब्रह्म को संसार में स्थानांतरित करती है। वही जन्म का माध्यम है, वही पालन की शक्ति है और वही अंततः ब्रह्म में पुनः विलय का मार्ग भी।


सृष्टि का रहस्य इसी अनादि युगल में छिपा है। ब्रह्म बिना माया अधूरा है और माया बिना ब्रह्म दिशाहीन। दोनों मिलकर ही जीवन, प्रेम, परिवार, समाज और सम्पूर्ण ब्रह्मांड की रचना करते हैं। यही सनातन दर्शन का शाश्वत सत्य है।

नरेन्द्र (लाईफ वर्सिटी )

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