नरेन्द्र पाण्डेय : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘मन की बात’ केवल सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों का मंच नहीं है, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों में हो रहे छोटे-बड़े सामाजिक प्रयासों को राष्ट्रीय संवाद का हिस्सा बनाने का माध्यम भी बन चुकी है। रविवार को ‘मन की बात’ की 138वीं कड़ी में प्रधानमंत्री ने एक साथ कई ऐसे विषयों को सामने रखा, जिनका सीधा संबंध देश की सुरक्षा, समाज, संस्कृति, पर्यावरण, युवा शक्ति, स्थानीय अर्थव्यवस्था और पोषण से है।
इस बार के संबोधन की शुरुआत राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ से हुई। प्रधानमंत्री ने 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक के दस वर्ष पूरे होने का उल्लेख करते हुए आतंकवाद के खिलाफ भारत की नीति की चर्चा की। उन्होंने 2008 के दिल्ली सीरियल ब्लास्ट और मुंबई के 26/11 हमले को भी याद किया। प्रधानमंत्री के संबोधन का संदेश स्पष्ट था कि आतंकवाद के खिलाफ भारत की नीति अब कठोर प्रतिक्रिया और ‘जीरो टॉलरेंस’ के दृष्टिकोण पर केंद्रित है। उन्होंने बालाकोट एयर स्ट्राइक और ऑपरेशन सिंदूर का भी उल्लेख किया।
लेकिन ‘मन की बात’ केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं रही। प्रधानमंत्री ने देश की चल रही जनगणना को राष्ट्रीय दायित्व बताते हुए लोगों से इसमें सक्रिय भागीदारी की अपील की। उन्होंने विशेष रूप से डिजिटल स्व-गणना का उल्लेख किया और कहा कि प्रत्येक परिवार की सही जानकारी देश के भविष्य की सही तस्वीर तैयार करने में मदद करेगी। यानी सरकार के आंकड़ों की दुनिया में आम नागरिक की भागीदारी को भी उन्होंने महत्वपूर्ण बताया।
इतिहास केवल स्मृति नहीं, प्रेरणा भी है
प्रधानमंत्री ने विश्व हिंदू परिषद के पूर्व अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष स्वर्गीय अशोक सिंघल की जन्मशती का उल्लेख करते हुए उनके सामाजिक और सांस्कृतिक योगदान को याद किया। इसके बाद सोमनाथ और मोढेरा सूर्य मंदिर का प्रसंग सामने आया।
मोढेरा की कहानी के माध्यम से प्रधानमंत्री ने इतिहास, संस्कृति और आधुनिक तकनीक को एक साथ जोड़ने की कोशिश की। जिस मोढेरा सूर्य मंदिर पर एक हजार वर्ष पहले आक्रमण हुआ था, वही क्षेत्र आज सौर ऊर्जा के उपयोग के लिए भी जाना जाता है। प्रधानमंत्री ने इसे भारत की उस परंपरा से जोड़ा जिसमें अतीत की विरासत को भविष्य की तकनीक से जोड़ा जा सकता है।
यही ‘मन की बात’ की एक खास शैली भी है—इतिहास के किसी प्रसंग को केवल गौरव की स्मृति बनाकर छोड़ने के बजाय उससे वर्तमान के लिए कोई संदेश निकालना।
स्वच्छता: सरकार से ज्यादा समाज का अभियान
2 अक्टूबर यानी महात्मा गांधी जयंती के संदर्भ में प्रधानमंत्री ने स्वच्छता के विभिन्न जन-अभियानों का उल्लेख किया। मध्य प्रदेश में नदी की सफाई, आंध्र प्रदेश में बावड़ियों और कुओं की सफाई, मुंबई में समुद्र तटों की सफाई और दिल्ली में युवाओं द्वारा कचरा अलग-अलग रखने के लिए जागरूकता जैसे उदाहरणों का जिक्र करते हुए उन्होंने जनभागीदारी को महत्वपूर्ण बताया।
यहां संदेश केवल ‘सफाई रखिए’ का नहीं था। संदेश यह था कि किसी एक व्यक्ति की छोटी पहल भी धीरे-धीरे सामूहिक आंदोलन बन सकती है। गांधी जयंती को स्वच्छता से जोड़ते हुए प्रधानमंत्री ने इसे बापू को श्रद्धांजलि का एक माध्यम बताया।
पर्यावरण की कहानी में इंसान भी है
‘मन की बात’ में पर्यावरण का एक अलग मानवीय पक्ष भी सामने आया। असम के सोनाई रूपाई वन्यजीव अभयारण्य में हाथियों की वापसी, पिग्मी हॉग के संरक्षण और सुंदरबन में मैंग्रोव तैयार करने वाली महिलाओं के प्रयासों का उल्लेख किया गया।
सुंदरबन की महिलाओं की कहानी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इनमें कई महिलाएं ऐसी हैं, जिन्होंने बाघ के हमलों में अपने पति खोए और बाद में मैंग्रोव संरक्षण के माध्यम से आजीविका का रास्ता बनाया। यहां पर्यावरण संरक्षण केवल पेड़ लगाने की कहानी नहीं रह जाता, बल्कि वह जीवन, रोजगार और सुरक्षा से भी जुड़ जाता है।
नशे के खिलाफ युवाओं की भूमिका
प्रधानमंत्री ने ‘नशा मुक्त युवा अभियान’ का उल्लेख करते हुए युवाओं को इस अभियान का केंद्र बताया। अभियान को 100 सप्ताह तक चलाने की बात कही गई और स्कूल-कॉलेज, विश्वविद्यालय, NSS, MY Bharat तथा सामाजिक और आध्यात्मिक संस्थाओं की भागीदारी का जिक्र किया गया।
दिलचस्प बात यह रही कि प्रधानमंत्री ने युवाओं से केवल नशे से दूर रहने की अपील नहीं की, बल्कि उन्हें अपनी भाषा और रचनात्मकता के माध्यम से नशामुक्ति का संदेश आगे बढ़ाने की बात कही। सोशल मीडिया, स्लोगन, एंथम और नुक्कड़ नाटक जैसे माध्यमों का उल्लेख इसी बदलती संचार शैली की ओर संकेत करता है।
गांवों में छिपी खेल प्रतिभा को तलाशने की कोशिश
प्रधानमंत्री ने खेल प्रतिभाओं की खोज की जरूरत पर भी जोर दिया। उन्होंने पंजाब के हॉकी खिलाड़ी और कोच राजिंदर सिंह के प्रयासों का उदाहरण देते हुए कहा कि खेल प्रतिभाओं को गांवों और कस्बों तक जाकर तलाशना जरूरी है।
भारत की खेल यात्रा में यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि प्रतिभा केवल बड़े शहरों में नहीं होती। देश के गांवों में भी ऐसे बच्चे हैं जिन्हें अवसर, प्रशिक्षण और उचित मार्गदर्शन की जरूरत है। ‘मन की बात’ में ऐसे उदाहरणों को सामने लाना इसी सामाजिक सोच को मजबूत करता है।
आंवले से आत्मनिर्भरता तक
उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ के आंवले का उदाहरण देकर प्रधानमंत्री ने ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’ की चर्चा की। आंवले से कैंडी, मुरब्बा, जूस, अचार और दूसरे उत्पाद तैयार करने वाले स्वयं सहायता समूहों का उल्लेख किया गया।
यहां कहानी केवल एक फल की नहीं है। कहानी है कि किसी जिले की पारंपरिक पहचान किस तरह स्थानीय रोजगार और छोटे उद्योगों का आधार बन सकती है। खासकर महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों की भूमिका इस बदलाव को सामाजिक और आर्थिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण बनाती है।
छत्तीसगढ़ का ‘हर घर मुनगा’ पहुंचा मन की बात तक
इस बार छत्तीसगढ़ के लिए ‘मन की बात’ का एक विशेष महत्व भी रहा। प्रधानमंत्री ने पोषण माह के संदर्भ में छत्तीसगढ़ के ‘हर घर मुनगा-घर-घर मुनगा’ अभियान का उल्लेख किया।
मुनगा यानी मोरिंगा को भोजन में शामिल करने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करने वाली यह पहल स्थानीय खाद्य परंपरा और पोषण को जोड़ती है। प्रधानमंत्री ने गुजरात, महाराष्ट्र और मिजोरम में चल रही पोषण संबंधी पहलों का भी उल्लेख किया।
इससे एक बात स्पष्ट होती है कि पोषण की लड़ाई केवल बड़े अस्पतालों और सरकारी योजनाओं तक सीमित नहीं है। स्थानीय भोजन, आंगनबाड़ी, परिवार और समुदाय भी इस लड़ाई के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।
गणेश से थाईलैंड तक भारत की सांस्कृतिक यात्रा
‘मन की बात’ में गणेश उत्सव के माध्यम से भारत की सांस्कृतिक पहुंच की भी चर्चा हुई। प्रधानमंत्री ने थाईलैंड के एक गणेश भक्त और चियांग माई में स्थापित गणेश संग्रहालय का उल्लेख किया, जहां हजारों गणेश प्रतिमाएं संग्रहित हैं।
यह प्रसंग बताता है कि भारतीय संस्कृति की यात्रा केवल भारत की भौगोलिक सीमाओं के भीतर नहीं है। भारतीय देवी-देवताओं, परंपराओं, कला और आध्यात्मिक प्रतीकों के प्रति दूसरे देशों में भी लोगों की रुचि और आस्था दिखाई देती है।
‘मन की बात’ का मूल संदेश क्या है?
138वीं कड़ी को अगर एक वाक्य में समझना हो तो कहा जा सकता है—बड़ा परिवर्तन केवल सरकार नहीं करती, समाज की भागीदारी से परिवर्तन स्थायी बनता है।
सर्जिकल स्ट्राइक से राष्ट्रीय सुरक्षा, जनगणना से नागरिक दायित्व, सोमनाथ और मोढेरा से विरासत, स्वच्छता से जनभागीदारी, पर्यावरण से प्रकृति संरक्षण, नशामुक्ति से युवा शक्ति, खेल से प्रतिभा खोज, आंवले से स्थानीय अर्थव्यवस्था और मुनगा से पोषण—प्रधानमंत्री ने अलग-अलग कहानियों को एक व्यापक राष्ट्रीय कथा से जोड़ने की कोशिश की।
‘मन की बात’ की सबसे बड़ी विशेषता शायद यही है कि इसमें देश की बड़ी तस्वीर के साथ किसी गांव, किसी महिला, किसी खिलाड़ी, किसी युवा या किसी स्थानीय पहल की छोटी कहानी भी जगह पाती है।
भारत जैसे विशाल और विविध देश में बदलाव की असली ताकत शायद इन्हीं छोटी-छोटी पहलों के जुड़ने में है। एक व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज और समाज से राष्ट्र—‘मन की बात’ में प्रधानमंत्री ने इसी क्रम को कई उदाहरणों के माध्यम से सामने रखा।
और शायद यही संदेश आज के भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण है—देश केवल नीतियों से नहीं बदलता, नागरिकों की भागीदारी से बदलता है।