ज्ञानेश कुमार, SIR और राहुल गांधी: आंदोलन कितना बड़ा, चुनौती कितनी गंभीर?


नरेन्द्र पाण्डेय : :

एक तरफ राहुल गांधी को ऐसा आंदोलन मिलता दिखाई दे रहा है, जो कांग्रेस की पारंपरिक सीमाओं से बाहर तक पहुंच सकता है। अलग-अलग सामाजिक समूहों की भागीदारी उन्हें व्यापक विपक्षी गोलबंदी का अवसर देती है।
दूसरी तरफ, यही विस्तार कांग्रेस के लिए संगठनात्मक सवाल भी खड़े करता है। जब आंदोलन में नए चेहरे आगे आते हैं, तो पार्टी को तय करना पड़ता है कि वह उन्हें कितना स्थान देगी और अपने पुराने कार्यकर्ताओं की भूमिका को कैसे सुरक्षित रखेगी।
लेकिन इन सबके बीच सबसे महत्वपूर्ण सवाल चुनाव आयोग की निष्पक्षता और मतदाता के भरोसे का है।

दिल्ली की सड़कों पर जो इन दिनों लड़ाई चल रही है, इसका असर सिर्फ चुनाव आयोग या बीजेपी की राजनीति तक सीमित नहीं है। यह लड़ाई राहुल गांधी के राजनीतिक भविष्य और कांग्रेस के संगठन की दिशा पर भी सवाल खड़े कर रही है।

मुद्दा है—वोट चोरी का आरोप, SIR और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग।

राहुल गांधी और विपक्षी दलों का आरोप है कि मतदाता सूची में गड़बड़ियों के जरिए चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित किया जा रहा है। वहीं, बीजेपी इन आरोपों को खारिज करते हुए कांग्रेस पर चुनावी हार की हताशा में संवैधानिक संस्थाओं को निशाना बनाने का आरोप लगाती है।

लेकिन आज हम इस विवाद को केवल राहुल गांधी बनाम बीजेपी के नजरिए से नहीं देखेंगे।

आज तीन बड़े सवाल हैं।

पहला—अगर चुनाव आयोग पर लगे आरोप सही हैं, तो उनकी जवाबदेही कैसे तय होगी?

दूसरा—क्या ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा इस विवाद का समाधान है, या इसके पीछे एक बड़ा राजनीतिक नैरेटिव काम कर रहा है?

और तीसरा—जिस आंदोलन को राहुल गांधी कांग्रेस की सीमाओं से बाहर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं, क्या वही आंदोलन भविष्य में कांग्रेस के अपने संगठन के लिए चुनौती बन सकता है?

क्योंकि , कांग्रेस लंबे समय से ऐसे जनआंदोलन की तलाश में रही है, जो उसे अपने पारंपरिक समर्थकों से आगे ले जाए। अब जब छात्रों, महिलाओं, वकीलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े लोगों की भागीदारी वाले प्रदर्शनों का दायरा बढ़ रहा है, तो सवाल उठ रहा है—क्या इस आंदोलन का नेतृत्व केवल कांग्रेस के हाथ में है?

एक एक करके समझते है --

पहला सवाल: वोट चोरी का आरोप और ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा

दिल्ली में विपक्ष की मांग स्पष्ट है—मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद छोड़ना चाहिए। लेकिन यहां एक बुनियादी सवाल है। क्या किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ आरोप लगना ही उसके इस्तीफे का आधार होना चाहिए? या पहले आरोपों की निष्पक्ष जांच और तथ्यों के आधार पर जवाबदेही तय होनी चाहिए?

NEET परीक्षा विवाद से इसकी तुलना की जा रही है। लेकिन दोनों मामलों में अंतर समझना जरूरी है।

NEET परीक्षा में पेपर लीक और अनियमितताओं को लेकर गंभीर सवाल उठे थे। छात्रों के भविष्य से जुड़े इस मुद्दे पर जांच और जवाबदेही की मांग हुई। तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की जिम्मेदारी को लेकर भी राजनीतिक बहस हुई।

लेकिन चुनाव आयोग का मामला अलग है। यहां SIR, से मतदाताओं के नाम हटाए जाने की शिकायतों और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल हैं।

इन आरोपों को केवल राजनीतिक बयान कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। लेकिन आरोपों को ही अंतिम सत्य मान लेना भी उचित नहीं है।

अगर गड़बड़ी हुई है, तो उसका पता लगना चाहिए। जिम्मेदार व्यक्ति या संस्था की जवाबदेही तय होनी चाहिए। और यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते, तो निष्कर्षों का सम्मान भी होना चाहिए। यही लोकतंत्र की कसौटी है।



दूसरा सवाल: क्या इस्तीफा ही समाधान है?

जरा सोचिए, यदि ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दे देते हैं, तो क्या मतदाता सूची से जुड़े सभी सवाल खत्म हो जाएंगे? क्या कथित गड़बड़ियों की जांच अपने आप पूरी हो जाएगी? क्या भविष्य में चुनाव आयोग पर कोई सवाल नहीं उठेगा?

इस्तीफा किसी आरोप का न्यायिक प्रमाण नहीं होता। उसी तरह, किसी पद पर बने रहना भी अपने आप में निर्दोष होने का अंतिम प्रमाण नहीं है।

इसलिए बहस केवल एक व्यक्ति की कुर्सी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। बहस यह होनी चाहिए कि मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है, शिकायतों का निपटारा कैसे होता है और किसी गड़बड़ी की पुष्टि होने पर क्या कार्रवाई की जाती है।

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया भी संवैधानिक नियमों से बंधी है। उन्हें हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया के समान है। केवल सड़क पर प्रदर्शन या राजनीतिक दबाव से उन्हें पद से नहीं हटाया जा सकता।

जहां मामले अदालत में विचाराधीन हैं, वहां न्यायिक प्रक्रिया की भूमिका महत्वपूर्ण है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि विपक्ष सवाल पूछना बंद कर दे या सरकार हर आरोप को बिना जवाब दिए खारिज कर दे।

तीसरा सवाल: अब आते हैं इस आंदोलन के राजनीतिक पहलू पर। राहुल गांधी को आखिर मिला क्या?

2014 के बाद कांग्रेस ने कई मुद्दों पर आंदोलन किए। जमीन अधिग्रहण, नोटबंदी, नागरिकता संशोधन कानून, कृषि कानून, बेरोजगारी, महंगाई और जांच एजेंसियों के कथित दुरुपयोग जैसे विषयों पर पार्टी सड़कों पर उतरी।

लेकिन एक समस्या लगातार बनी रही। कांग्रेस के कई आंदोलन पार्टी के अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं तक सीमित दिखाई दिए। पार्टी व्यापक जनसमर्थन जुटाने की कोशिश करती रही, लेकिन हर बार उसे वैसा विस्तार नहीं मिला, जिसकी उसे उम्मीद थी।

2022-23 की भारत जोड़ो यात्रा ने इस तस्वीर में कुछ बदलाव जरूर किया। राहुल गांधी ने पार्टी की पारंपरिक सीमाओं से बाहर निकलकर नागरिकों, बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और अलग-अलग वर्गों के लोगों से संवाद करने की कोशिश की। अब चुनाव आयोग और SIR को लेकर चल रहे प्रदर्शनों में भी राहुल गांधी के सामने ऐसा अवसर दिखाई देता है।

इस आंदोलन में कांग्रेस के साथ-साथ वामपंथी छात्र संगठन, सामाजिक कार्यकर्ता, वकील और स्वतंत्र रूप से विरोध करने वाले युवा भी दिखाई दे रहे हैं। इसका राजनीतिक महत्व समझिए।

यदि कोई आंदोलन केवल कांग्रेस का होता, तो बीजेपी उसे आसानी से कांग्रेस बनाम बीजेपी की लड़ाई बताकर खारिज करने की कोशिश कर सकती थी। लेकिन जब उसमें अलग-अलग विचारधाराओं और संगठनों के लोग शामिल होते हैं, तो उसका सामाजिक दायरा बढ़ जाता है।

राहुल गांधी के लिए यह एक राजनीतिक अवसर है। वे चुनाव आयोग पर उठ रहे सवालों को व्यापक लोकतांत्रिक बहस में बदलना चाहते हैं।

लेकिन यहीं से कांग्रेस के सामने एक नई चुनौती भी शुरू होती है।



आंदोलन बड़ा हो रहा है, लेकिन नेतृत्व किसके हाथ में है?

किसी भी आंदोलन में भीड़ का बढ़ना महत्वपूर्ण होता है, लेकिन उससे भी बड़ा सवाल है—उस आंदोलन की दिशा कौन तय कर रहा है?

रिपोर्टों में छात्र नेता नेहा बोरा और कॉकरोच जनता पार्टी से जुड़े कुछ चेहरों की चर्चा हुई है। इन नामों को इस बात के उदाहरण के रूप में पेश किया जा रहा है कि आंदोलन में ऐसे लोग भी सामने आ रहे हैं, जिनकी राजनीतिक पहचान कांग्रेस के पारंपरिक संगठन से नहीं बनी है।

राहुल गांधी ने अगर ऐसे लोगों को साझा मंच पर बोलने का अवसर दिया है, तो इसे व्यापक विपक्षी एकजुटता बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन कांग्रेस के भीतर इससे असहजता पैदा होना भी स्वाभाविक है।

क्यों?

क्योंकि कांग्रेस के पास अपना छात्र संगठन NSUI है। युवा कांग्रेस है। वर्षों से पार्टी के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता हैं। संगठन के भीतर नेतृत्व तक पहुंचने के लिए संघर्ष करने वाले लोग हैं।

ऐसे में सवाल उठ सकता है कि जब पार्टी के अपने युवा संगठन मौजूद हैं, तो आंदोलन के चर्चित चेहरों में बाहरी लोगों को इतनी जगह क्यों मिल रही है?

यह सवाल केवल किसी एक छात्र नेता को मंच देने का नहीं है। यह कांग्रेस की संगठनात्मक संस्कृति से जुड़ा सवाल है।

राहुल गांधी अक्सर पार्टी के स्थापित ढांचे से बाहर के लोगों से संवाद करते दिखाई देते हैं। यह उनकी राजनीतिक शैली की ताकत भी हो सकती है, क्योंकि इससे नए विचार और नए सामाजिक समूह जुड़ सकते हैं।

लेकिन पार्टी के भीतर काम करने वाले कार्यकर्ताओं की भी अपनी अपेक्षाएं होती हैं। वे चाहते हैं कि उनकी मेहनत और संगठन के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को भी उचित महत्व मिले।

यानी राहुल गांधी के सामने चुनौती केवल बीजेपी से लड़ने की नहीं, बल्कि आंदोलन के विस्तार और अपनी पार्टी के संगठन के बीच संतुलन बनाने की भी है।

एक दिलचस्प बात और है , इस आंदोलन के संदर्भ में राहुल गांधी ने भगवान शिव की बारात और तांडव का रूपक इस्तेमाल किया था।

इस रूपक को राजनीतिक अर्थ में समझें, तो शिव की बारात ऐसी कल्पना प्रस्तुत करती है जिसमें अलग-अलग तरह के लोग एक साथ दिखाई देते हैं। पारंपरिक सीमाओं से बाहर के चेहरे भी उस समूह का हिस्सा होते हैं।

राहुल गांधी शायद यह संदेश देना चाहते हैं कि आंदोलन किसी एक पार्टी या विचारधारा तक सीमित नहीं है। इसमें वे सभी लोग शामिल हो सकते हैं, जिन्हें चुनावी प्रक्रिया और लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता को लेकर चिंता है।

यह व्यापक गोलबंदी की रणनीति हो सकती है।

लेकिन सवाल फिर वही है—क्या ऐसा आंदोलन किसी एक पार्टी के नियंत्रण में रह सकता है? जब आंदोलन में अलग-अलग संगठन, स्वतंत्र कार्यकर्ता और अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं के लोग शामिल होते हैं, तो हर मुद्दे पर उनकी राय एक जैसी होना जरूरी नहीं है। किसी समय सबकी मांग एक हो सकती है, लेकिन आगे चलकर उनकी प्राथमिकताएं बदल सकती हैं।



इसलिए इन्तजार करें , कांग्रेस की असली परीक्षा आंदोलन के बाद होगी

क्योंकि किसी भी आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण समय केवल उसका चरम नहीं होता। उसकी असली परीक्षा तब होती है, जब प्रदर्शन धीमे पड़ते हैं और राजनीतिक परिणाम सामने आने लगते हैं।

आज यदि अलग-अलग वर्गों के लोग एक मंच पर आ रहे हैं, तो आगे सवाल होगा कि इस एकजुटता को टिकाऊ राजनीतिक सहयोग में कैसे बदला जाएगा।

क्या स्वतंत्र कार्यकर्ता कांग्रेस के साथ लंबे समय तक काम करेंगे? क्या छात्र संगठनों को वास्तविक भूमिका मिलेगी? क्या युवा कांग्रेस और NSUI को अपनी रणनीति और नेतृत्व में बदलाव करने का अवसर मिलेगा? और क्या कांग्रेस आंदोलन की व्यापकता को अपनी चुनावी और संगठनात्मक ताकत में बदल पाएगी?

इन सवालों के जवाब अभी स्पष्ट नहीं हैं।

लेकिन एक बात साफ है—सड़क पर लोगों की मौजूदगी और चुनाव में वोट हासिल करना दो अलग-अलग चीजें हैं। किसी आंदोलन में व्यापक भागीदारी अपने आप में चुनावी सफलता की गारंटी नहीं होती।

कांग्रेस को यह भी समझना होगा कि हर विरोध प्रदर्शन का राजनीतिक लाभ स्वतः पार्टी को नहीं मिलता। लोग किसी मुद्दे के समर्थन में सड़कों पर आ सकते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वे कांग्रेस की हर नीति या नेतृत्व को भी स्वीकार करते हैं।



बीजेपी के लिए भी यह केवल राजनीतिक बयानबाजी का मामला नहीं

चुनाव आयोग की विश्वसनीयता लोकतंत्र के लिए बुनियादी महत्व रखती है। यदि मतदाता सूची से जुड़े सवाल उठ रहे हैं, तो आयोग को प्रक्रिया स्पष्ट करनी चाहिए। जहां शिकायतें हैं, उनका तथ्यात्मक समाधान सामने आना चाहिए। मतदाताओं को यह भरोसा मिलना चाहिए कि उनके नाम हटाने या जोड़ने की प्रक्रिया नियमों के अनुसार हो रही है।

सरकार को भी वैध सवालों का जवाब देना चाहिए। विपक्ष को अपने आरोपों के समर्थन में ठोस प्रमाण रखने चाहिए। और चुनाव आयोग को राजनीतिक पक्षधरता के आरोपों से ऊपर उठकर अपनी निष्पक्षता का भरोसा कायम रखना चाहिए।

यदि हर सवाल को राजनीतिक साजिश बताकर खारिज किया जाएगा, तो संदेह बढ़ सकता है। और यदि हर चुनावी हार को वोट चोरी का परिणाम बताने का चलन बन जाएगा, तो चुनावी प्रक्रिया पर अनावश्यक अविश्वास भी बढ़ सकता है। दोनों ही स्थितियां लोकतंत्र के लिए अच्छी नहीं हैं।

तो इस पूरे घटनाक्रम को कैसे समझें?

एक तरफ राहुल गांधी को ऐसा आंदोलन मिलता दिखाई दे रहा है, जो कांग्रेस की पारंपरिक सीमाओं से बाहर तक पहुंच सकता है। अलग-अलग सामाजिक समूहों की भागीदारी उन्हें व्यापक विपक्षी गोलबंदी का अवसर देती है।

दूसरी तरफ, यही विस्तार कांग्रेस के लिए संगठनात्मक सवाल भी खड़े करता है। जब आंदोलन में नए चेहरे आगे आते हैं, तो पार्टी को तय करना पड़ता है कि वह उन्हें कितना स्थान देगी और अपने पुराने कार्यकर्ताओं की भूमिका को कैसे सुरक्षित रखेगी।

लेकिन इन सबके बीच सबसे महत्वपूर्ण सवाल चुनाव आयोग की निष्पक्षता और मतदाता के भरोसे का है।

ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें या पद पर बने रहें, राहुल गांधी का आंदोलन आगे बढ़े या उसकी गति धीमी हो—इन राजनीतिक घटनाक्रमों से अलग भी एक जरूरी काम है। मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और जनता के सामने तथ्यों के आधार पर जवाब आने चाहिए।

क्योंकि लोकतंत्र केवल सत्ता बदलने की व्यवस्था नहीं है। लोकतंत्र वह भरोसा है, जिसके आधार पर एक आम नागरिक मतदान केंद्र तक जाता है और मानता है कि उसकी आवाज का सम्मान होगा।

और अंत में, राहुल गांधी और कांग्रेस के सामने भी एक सवाल रहेगा—

क्या वे इस आंदोलन को केवल बीजेपी के खिलाफ राजनीतिक हथियार बनाएंगे, या इसे लोकतांत्रिक जवाबदेही की ऐसी मुहिम में बदल पाएंगे, जो कांग्रेस के संगठन को भी नई ऊर्जा दे?

इस सवाल का जवाब आने वाले दिनों में आंदोलन की दिशा भी तय करेगा और कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति भी।

 

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