सियासत के शोर में दबते जनता के सवाल


नरेन्द्र पाण्डेय : आज की राजनीति में सबसे आसान काम है—एक-दूसरे पर आरोप लगाना।

मुश्किल काम है जनता के उस सवाल का जवाब देना, जो किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में नहीं, बल्कि गांव की चौपाल पर खड़ा है। पश्चिम बंगाल से लेकर मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र तक पिछले कुछ दिनों की घटनाएं इसी सवाल को सामने रखती हैं— क्या हमारी राजनीति जनता के मुद्दों से ज्यादा सत्ता और संगठन की लड़ाई में उलझती जा रही है?


पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस के नेता मोहम्मद अखरुज्जमान ने INDIA ब्लॉक में शामिल होने की इच्छा जताई है, लेकिन शर्त रखी है कि ममता बनर्जी को गठबंधन से बाहर किया जाए। उन्होंने ममता बनर्जी पर बीजेपी की 'बी-टीम' की तरह काम करने और विपक्षी एकता को नुकसान पहुंचाने जैसे आरोप लगाए हैं। लेकिन यहां असली सवाल सिर्फ यह नहीं है कि ममता किस गठबंधन में हैं। सवाल यह है कि विपक्षी एकता आखिर किस मुद्दे पर बनेगी? क्या गठबंधन सिर्फ चुनावी सीटों का जोड़ है?या फिर बेरोजगारी, महंगाई, स्वास्थ्य, शिक्षा और लोकतांत्रिक संस्थाओं जैसे मुद्दों पर साझा राजनीतिक दृष्टिकोण भी उसका आधार होना चाहिए?क्योंकि अगर विपक्ष एक-दूसरे को ही अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानने लगे, तो जनता के सामने विकल्प का सवाल और जटिल हो जाता है।


बालाघाट में राजनीति से बड़ा सवाल

मध्य प्रदेश के बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौत का मामला इससे भी गंभीर सवाल खड़ा करता है। राहुल गांधी ने प्रभावित परिवारों से मुलाकात की और कुपोषण, बीमारी तथा स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर सरकार पर सवाल उठाए। विभिन्न रिपोर्टों में बैगा आदिवासी बहुल इलाकों में बच्चों की मौतों का मामला सामने आया है। हालांकि मौतों की संख्या और कारणों को लेकर अलग-अलग दावे हैं और उपलब्ध रिपोर्टों में सभी मौतों के लिए किसी एक बीमारी को जिम्मेदार नहीं बताया गया है। यही वह जगह है जहां राजनीति को संवेदना से आगे बढ़कर जवाबदेही में बदलना चाहिए। कितने बच्चे बीमार हुए? कितनों को अस्पताल पहुंचाया गया? कितने मामलों में कुपोषण था? कितने मामलों में मलेरिया, एनीमिया या दूसरी बीमारियां थीं? गांव से स्वास्थ्य केंद्र की दूरी कितनी है? डॉक्टर, दवाइयां और जांच की सुविधा कितनी उपलब्ध है? और सबसे महत्वपूर्ण— क्या किसी बच्चे की मौत को सिर्फ एक राजनीतिक बयान बनाकर छोड़ दिया जाएगा? राहुल गांधी ने संसद में मुद्दा उठाने की बात कही है। यह अच्छी बात है कि मामला संसद तक पहुंचे। लेकिन संसद में सवाल उठने के बाद जवाब भी चाहिए और जवाब के बाद कार्रवाई भी।


चुनाव आयोग पर सवाल—आरोप से आगे बढ़कर पारदर्शिता जरूरी

मुंबई में CJP के अभिजीत दीपके ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर आंदोलन का ऐलान किया है। संगठन ने मतदाता सूची और चुनाव प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं को लेकर सवाल उठाए हैं और आंदोलन को दूसरे शहरों तक ले जाने की बात कही है। यहां भी दो बातें अलग-अलग रखनी जरूरी हैं। एक है राजनीतिक आरोप। दूसरी है तथ्य और संस्थागत जांच। किसी भी चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठना लोकतंत्र में गंभीर विषय है। लेकिन लोकतंत्र की मजबूती सिर्फ आरोप लगाने से नहीं आती। उसके लिए जरूरी है— डेटा सार्वजनिक हो। प्रक्रिया पारदर्शी हो। आपत्तियों का जवाब मिले। और अगर किसी स्तर पर नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो जिम्मेदारी तय हो।


मुंबई पुलिस ने 2 अक्टूबर के प्रस्तावित प्रदर्शन के लिए अनुमति नहीं दी थी, जबकि CJP ने आंदोलन जारी रखने की बात कही।

लोकतंत्र में विरोध का अधिकार महत्वपूर्ण है। लेकिन विरोध के साथ कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यानी सवाल सिर्फ यह नहीं कि कौन प्रदर्शन कर रहा है? सवाल यह भी है कि उसकी शिकायत का संस्थागत समाधान क्या है?


और छत्तीसगढ़ में आयुष्मान योजना

यह मामला सीधे उस गरीब आदमी से जुड़ा है जिसके लिए आयुष्मान कार्ड सिर्फ एक कागज नहीं, बल्कि बीमारी के समय उम्मीद है।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण की जोखिम पहचान के बाद छत्तीसगढ़ में 17 अस्पतालों की जांच की गई। इनमें रायपुर के मेडिलाइफ और लोटस अस्पताल के खिलाफ 28 और 29 सितंबर को आयुष्मान योजना से डी-एम्पैनलमेंट की कार्रवाई की गई। सवाल केवल अस्पताल का नहीं है। सवाल उस मरीज का है— जो अपनी जेब से इलाज नहीं करा सकता। जो सरकारी योजना पर भरोसा करके अस्पताल जाता है। और जो यह मानकर जाता है कि सरकार ने उसके इलाज की जिम्मेदारी के लिए एक व्यवस्था बनाई है। अगर कहीं फर्जी क्लेम, गलत रिकॉर्ड, अतिरिक्त वसूली या नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो कार्रवाई जरूरी है। लेकिन कार्रवाई के साथ यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि ईमानदारी से काम कर रहे अस्पताल और वास्तविक मरीज अनावश्यक प्रशासनिक परेशानी का शिकार न हों।


आखिर राजनीति का असली पैमाना क्या है?

आज पश्चिम बंगाल में सवाल गठबंधन का है। मध्य प्रदेश में सवाल आदिवासी बच्चों का है। महाराष्ट्र में सवाल चुनावी प्रक्रिया और विरोध के अधिकार का है। और छत्तीसगढ़ में सवाल गरीब मरीज के स्वास्थ्य अधिकार का है। चार अलग-अलग घटनाएं। लेकिन इनके बीच एक साझा सूत्र है— जनता और संस्थाओं के बीच भरोसा।

राजनीतिक दलों का काम सिर्फ चुनाव जीतना नहीं है।विपक्ष का काम सिर्फ सरकार को घेरना भी नहीं है। सरकार का काम सिर्फ योजनाओं की घोषणा करना भी नहीं है। और संस्थाओं का काम सिर्फ नियम बनाना भी नहीं है। लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब—

सरकार जवाब देती है, विपक्ष सवाल पूछता है, संस्थाएं पारदर्शी रहती हैं, मीडिया तथ्यों की पड़ताल करता है, और

जनता को पूरी जानकारी मिलती है। आज जरूरत शायद इसी की है कि राजनीतिक शोर थोड़ा कम हो… और जनता की आवाज थोड़ी ज्यादा सुनाई दे। क्योंकि आखिर लोकतंत्र में सबसे बड़ा गठबंधन— किसी पार्टी का नहीं, जनता और व्यवस्था के बीच भरोसे का होता है।

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