साय सरकार के बीच स्मृति ईरानी की एंट्री, BJP संगठन में क्या होने वाला है?


नरेन्द्र पाण्डेय : राजनीति में कभी-कभी नियुक्तियां सिर्फ नियुक्तियां नहीं होतीं… वे अपने भीतर कई संदेश लेकर आती हैं।

छत्तीसगढ़ में बीजेपी की सरकार है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में सरकार चल रही है और प्रदेश संगठन अपनी राजनीतिक भूमिका निभा रहा है। लेकिन इसी बीच दिल्ली से एक बड़ा संगठनात्मक फैसला आता है— छत्तीसगढ़ बीजेपी की नई प्रभारी बनाई जाती हैं स्मृति ईरानी। और उनके साथ सिद्धार्थ शंभू को सह-प्रभारी की जिम्मेदारी दी जाती है।

अब सवाल है— स्मृति ईरानी ही क्यों?

क्या यह बीजेपी का सामान्य संगठनात्मक फेरबदल है? या छत्तीसगढ़ को लेकर पार्टी की संगठनात्मक प्राथमिकताओं में कुछ बदलाव दिखाई देने वाला है? क्योंकि ध्यान से देखिए… बीजेपी ने सिर्फ छत्तीसगढ़ में ही चेहरे नहीं बदले हैं। कई नेताओं को एक से अधिक राज्यों की जिम्मेदारी दी गई है। लेकिन छत्तीसगढ़ का मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां पार्टी सत्ता में है। और जब कोई पार्टी सत्ता में होती है, तब संगठन की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। सरकार को प्रशासन चलाना होता है… लेकिन संगठन को कार्यकर्ताओं से संवाद करना होता है, जमीनी फीडबैक लेना होता है, सरकार की योजनाओं को जनता तक पहुंचाना होता है और स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियों को समझना होता है। यही वजह है कि इस नियुक्ति को सिर्फ एक नाम और एक पद के रूप में देखना पूरी तस्वीर नहीं होगी। तो आखिर बीजेपी ने छत्तीसगढ़ की जिम्मेदारी स्मृति ईरानी को क्यों दी? और उनके साथ सिद्धार्थ शंभू को सह-प्रभारी बनाने के पीछे संगठनात्मक दृष्टि से क्या संकेत दिखाई देते हैं?

इन्हीं सवालों को समझने की कोशिश करते हैं। 23 सितंबर को बीजेपी ने 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए नए प्रभारी और सह-प्रभारी नियुक्त किए। इस फेरबदल में राष्ट्रीय महासचिव स्मृति ईरानी को छत्तीसगढ़ और हरियाणा की जिम्मेदारी दी गई है, जबकि सिद्धार्थ शंभू को छत्तीसगढ़ का सह-प्रभारी बनाया गया है। यानी बीजेपी ने छत्तीसगढ़ के लिए एक राष्ट्रीय स्तर के प्रमुख चेहरे के साथ एक सह-प्रभारी की व्यवस्था की है।

यहां सावधानी जरूरी है। पार्टी ने नियुक्ति के पीछे कोई विस्तृत सार्वजनिक कारण नहीं बताया है। इसलिए किसी एक वजह को अंतिम कारण मानना उचित नहीं होगा। लेकिन संगठनात्मक नजरिए से देखें तो स्मृति ईरानी की नियुक्ति महत्वपूर्ण जरूर है। वह केंद्र में मंत्री रह चुकी हैं और वर्तमान में बीजेपी की राष्ट्रीय महासचिव हैं। ऐसे में उनकी भूमिका केवल प्रदेश में बैठकों तक सीमित नहीं होगी।

उन्हें प्रदेश संगठन, स्थानीय नेतृत्व और केंद्रीय नेतृत्व के बीच समन्वय की भूमिका भी निभानी होगी।

सत्ता में होना और संगठन को मजबूत बनाए रखना—दो अलग-अलग जिम्मेदारियां हैं। सरकार के पास प्रशासनिक तंत्र होता है संगठन के पास कार्यकर्ता और राजनीतिक नेटवर्क। इसलिए किसी प्रदेश प्रभारी के सामने कई स्तरों पर जिम्मेदारी होती है— कार्यकर्ताओं से संवाद, जिलों से फीडबैक, स्थानीय नेतृत्व के साथ समन्वय,

सरकार की योजनाओं का राजनीतिक-संगठनात्मक संचार, और प्रदेश की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों की जानकारी केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंचाना। छत्तीसगढ़ में यह काम इसलिए भी चुनौतीपूर्ण है क्योंकि राज्य राजनीतिक और सामाजिक रूप से काफी विविध है। बस्तर की अपनी परिस्थितियां हैं। सरगुजा की अपनी राजनीतिक प्राथमिकताएं हैं। मैदानी इलाकों की अपनी चुनौतियां हैं। और रायपुर-दुर्ग जैसे शहरी क्षेत्रों की राजनीति का स्वरूप अलग है। इसलिए दिल्ली में तैयार रणनीति को छत्तीसगढ़ की जमीन पर लागू करने के लिए स्थानीय संगठन की समझ और लगातार संवाद जरूरी होगा।

अब दूसरे नाम पर आइए— सिद्धार्थ शंभू। उन्हें छत्तीसगढ़ का सह-प्रभारी बनाया गया है। इसका मतलब यह है कि प्रदेश संगठन के काम में अब प्रभारी और सह-प्रभारी दोनों की भूमिका होगी। संगठनात्मक दृष्टि से यह व्यवस्था प्रदेश में नियमित संपर्क और समन्वय को मजबूत करने का माध्यम बन सकती है। लेकिन इसका वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि दोनों नेता प्रदेश में कितनी सक्रियता से काम करते हैं और स्थानीय नेतृत्व के साथ उनका संवाद कैसा रहता है। यानी नियुक्ति महत्वपूर्ण है…

लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण होगा— उस नियुक्ति का जमीन पर क्रियान्वयन।

अब इस पूरी सूची का एक और पहलू देखिए। बीजेपी ने कई नेताओं को एक से अधिक राज्यों की जिम्मेदारी दी है। स्मृति ईरानी के पास छत्तीसगढ़ के साथ हरियाणा है। राम माधव को तमिलनाडु और उत्तराखंड की जिम्मेदारी मिली है। सतीश पूनिया को जम्मू कश्मीर और पंजाब का प्रभार दिया गया है। सुनील बंसल को तेलंगाना और पश्चिम बंगाल की जिम्मेदारी मिली है। इससे यह संकेत मिलता है कि पार्टी अपने अनुभवी नेताओं को एक से अधिक राज्यों में संगठनात्मक जिम्मेदारी देकर उनके अनुभव और नेटवर्क का व्यापक इस्तेमाल कर रही है। इसलिए छत्तीसगढ़ में स्मृति ईरानी की नियुक्ति को भी इसी व्यापक संगठनात्मक फेरबदल के संदर्भ में देखना जरूरी है।

अब छत्तीसगढ़ की राजनीति में आगे क्या देखना होगा?…

किसी प्रभारी की नियुक्ति के बाद असली सवाल यह नहीं होता कि— कौन आया? असली सवाल होता है— अब संगठन में क्या बदलाव दिखाई देता है? क्या प्रदेश के नेताओं के साथ नियमित संवाद बढ़ता है? क्या जिलों और मंडलों तक संगठन की सक्रियता बढ़ती है? क्या कार्यकर्ताओं की समस्याएं और जमीनी फीडबैक ऊपर तक पहुंचते हैं? क्या सरकार और संगठन के बीच समन्वय और मजबूत होता है? और क्या स्थानीय मुद्दों को केंद्रीय राजनीतिक रणनीति के साथ बेहतर तरीके से जोड़ा जाता है? इन सवालों के जवाब आने वाले महीनों की गतिविधियों से मिलेंगे। क्योंकि केवल प्रभारी बदलने से संगठन की दिशा तय नहीं होती। संगठन की वास्तविक ताकत उसके बूथ, मंडल, जिला और कार्यकर्ता स्तर पर दिखाई देती है। छत्तीसगढ़ के संदर्भ में इस नियुक्ति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है। एक तरफ मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सरकार है। दूसरी तरफ प्रदेश बीजेपी का संगठन है। और अब केंद्रीय नेतृत्व की ओर से स्मृति ईरानी और सिद्धार्थ शंभू की नई जिम्मेदारी है।


इन तीनों स्तरों के बीच संवाद और समन्वय कितना प्रभावी रहता है—यह आने वाले समय में देखने वाली बात होगी। क्योंकि सरकार की उपलब्धियां तभी राजनीतिक रूप से प्रभावी होती हैं जब संगठन उन्हें जमीन तक पहुंचा सके। और संगठन की रणनीति तभी प्रभावी होती है जब उसे सरकार और स्थानीय नेतृत्व का सहयोग मिले। यानी आने वाले समय में सबसे महत्वपूर्ण शब्द होगा— समन्वय।

तो क्या यह कोई बड़ा राजनीतिक संकेत है?

यहां भी जल्दबाजी से बचना जरूरी है। सिर्फ प्रभारी और सह-प्रभारियों की नियुक्ति के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना कि बीजेपी ने कोई विशेष चुनावी रणनीति तय कर ली है, उचित नहीं होगा। लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि पार्टी ने अपने संगठनात्मक ढांचे में व्यापक बदलाव किया है और छत्तीसगढ़ भी उसका महत्वपूर्ण हिस्सा है। अब इस बदलाव की वास्तविक दिशा बैठकों, प्रदेश दौरों, कार्यकर्ताओं के साथ संवाद और संगठन की जमीनी गतिविधियों में दिखाई देगी।

यानी फिलहाल सवाल का जवाब नियुक्ति में नहीं… आने वाली गतिविधियों में छिपा है। तो …छत्तीसगढ़ बीजेपी में अब एक नई संगठनात्मक व्यवस्था सामने है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सरकार… प्रदेश अध्यक्ष किरण देव का संगठन… और केंद्रीय नेतृत्व की ओर से— स्मृति ईरानी और सिद्धार्थ शंभू की नई जिम्मेदारी। अब देखने वाली बात यह होगी कि इन तीनों स्तरों के बीच तालमेल किस तरह विकसित होता है। क्या संगठन को नई ऊर्जा मिलती है?

क्या कार्यकर्ताओं के साथ संवाद का नया दौर शुरू होता है?\ क्या सरकार और संगठन के बीच समन्वय और मजबूत होता है?

और क्या छत्तीसगढ़ बीजेपी अपनी स्थानीय राजनीतिक जरूरतों के हिसाब से संगठन को और प्रभावी बना पाती है? इन सवालों का जवाब अभी नहीं दिया जा सकता। लेकिन एक बात तय है— दिल्ली ने छत्तीसगढ़ संगठन में एक नया अध्याय जरूर खोल दिया है। और अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि— स्मृति ईरानी की नियुक्ति कागज से निकलकर छत्तीसगढ़ की जमीन पर किस रूप में दिखाई देती है।

 

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