वोट बचाओ या लोकतंत्र बचाओ? आरोपों के बीच असली सवाल जनता के वोट का!


नरेन्द्र पाण्डेय : लोकतंत्र में सबसे ताकतवर कौन होता है? सरकार, राजनीतिक दल, चुनाव आयोग या फिर जनता?

जवाब सीधा है—जनता। क्योंकि लोकतंत्र की पूरी व्यवस्था उसी के मताधिकार पर टिकी है। लेकिन जब इसी मताधिकार की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगें, तो मामला केवल सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक लड़ाई का नहीं रह जाता। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था पर जनता के भरोसे का सवाल बन जाता है।

देश की राजनीति में इन दिनों यही सवाल चर्चा के केंद्र में है। कांग्रेस ने 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ रैली का आह्वान किया है। छत्तीसगढ़ से भी कांग्रेस कार्यकर्ताओं के दिल्ली रवाना होने की खबर है। दूसरी ओर, भाजपा इस आंदोलन को कांग्रेस की राजनीतिक हताशा बताते हुए ‘लोकतंत्र बचाओ-अराजकता हटाओ’ अभियान के जरिए पलटवार कर रही है।

भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कांग्रेस के आरोपों पर सवाल उठाते हुए कहा कि मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया में जिला स्तर से लेकर राज्य और केंद्रीय स्तर तक आपत्तियां दर्ज कराने के अवसर उपलब्ध हैं। यदि कांग्रेस ने समय रहते इन प्रक्रियाओं का उपयोग नहीं किया, तो उसे अपने संगठन और बूथ लेवल एजेंटों की भूमिका पर भी सवाल उठाना चाहिए।

वहीं, कांग्रेस का आरोप है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के नाम पर बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम काटे गए हैं। पार्टी के प्रवक्ताओं ने मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों और चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठाते हुए इसे लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती बताया है। अब सवाल यह है कि इन दोनों पक्षों की बातों के बीच सच्चाई कहाँ है?


पहली बात, चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाना और चुनावी प्रक्रिया को बदनाम करना दो अलग-अलग बातें हैं। लोकतंत्र में किसी भी संस्था को सवालों से परे नहीं रखा जा सकता। लेकिन सवाल उठाने वाले राजनीतिक दलों की भी जिम्मेदारी है कि वे अपने आरोपों के समर्थन में प्रमाण प्रस्तुत करें। केवल मंच से आरोप लगाने या प्रेसवार्ता में उन्हें खारिज कर देने से सच्चाई सामने नहीं आती।

यदि कांग्रेस के पास मतदाता सूची में गड़बड़ी के प्रमाण हैं, तो उन्हें सार्वजनिक किया जाना चाहिए। संबंधित निर्वाचन अधिकारियों के समक्ष शिकायतें दर्ज कराई जानी चाहिए और कानूनी प्रक्रिया का सहारा लिया जाना चाहिए। दूसरी ओर, भाजपा और चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि वे उठाए गए सवालों का जवाब तथ्यों और पारदर्शी प्रक्रिया के माध्यम से दें।

दूसरी बात, मतदाता सूची केवल चुनाव लड़ने वाले राजनीतिक दलों का दस्तावेज नहीं है। यह प्रत्येक नागरिक के लोकतांत्रिक अधिकार से जुड़ी हुई है।

किसी पात्र मतदाता का नाम सूची से छूट जाना उसके मतदान के अधिकार के व्यावहारिक इस्तेमाल में बाधा बन सकता है। इसी तरह, अपात्र नामों को हटाना भी निष्पक्ष चुनावी व्यवस्था का हिस्सा है। इसलिए मतदाता सूची के पुनरीक्षण में दो बातें एक साथ सुनिश्चित करनी होंगी—अपात्र नामों की पहचान और पात्र मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा।

कांग्रेस ने अपनी विज्ञप्ति में बड़ी संख्या में नाम काटे जाने का दावा किया है। इन आंकड़ों और आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि कितने नाम हटाए गए, कितने नामों पर आपत्ति आई, कितने मतदाता अपात्र पाए गए और कितने पात्र नागरिकों के नाम पुनः जोड़े गए। केवल कुल संख्या बताने से पूरी तस्वीर सामने नहीं आती।

यदि किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया है, तो उसके पास उसे पुनः जुड़वाने का प्रभावी और समयबद्ध रास्ता होना चाहिए। लोकतंत्र में मतदाता को अपनी पात्रता साबित करने के लिए अनावश्यक परेशानियों का सामना नहीं करना चाहिए।

तीसरी बात, इस पूरे विवाद में चुनाव आयोग की विश्वसनीयता सबसे महत्वपूर्ण है। चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है। उसकी निष्पक्षता पर जनता का विश्वास बना रहना चाहिए। यह विश्वास केवल संस्था की प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि उसके कामकाज में पारदर्शिता, शिकायतों के निष्पक्ष निपटारे और सभी राजनीतिक दलों के प्रति समान व्यवहार से मजबूत होता है।

यदि विपक्ष के आरोप निराधार हैं, तो तथ्यों के आधार पर उनका जवाब सामने आना चाहिए। और यदि कहीं प्रक्रिया में वास्तविक खामियां हैं, तो उन्हें स्वीकार कर सुधारना चाहिए। किसी संस्था की मजबूती इस बात में नहीं है कि उसके खिलाफ कोई सवाल न उठे, बल्कि इस बात में है कि वह सवालों का जवाब कितनी विश्वसनीयता से देती है।

चौथी बात, राजनीतिक दलों को भी आत्ममंथन करना होगा। भाजपा कांग्रेस पर चुनावी प्रक्रिया को लेकर भ्रम फैलाने का आरोप लगा रही है, जबकि कांग्रेस भाजपा पर मतदाता सूची में गड़बड़ी के जरिए चुनावी लाभ लेने का आरोप लगा रही है। दोनों पक्ष एक-दूसरे की मंशा पर सवाल उठा रहे हैं।

लेकिन जनता को मंशा पर आरोपों से ज्यादा प्रक्रिया के प्रमाण चाहिए। चुनावी हार को हर बार धांधली बताना भी उचित नहीं है और मतदाता सूची से जुड़े हर सवाल को राजनीतिक षड्यंत्र कहकर खारिज कर देना भी लोकतांत्रिक जवाबदेही का विकल्प नहीं हो सकता।

लोकतंत्र में चुनाव जीतना महत्वपूर्ण है, लेकिन चुनाव की निष्पक्षता पर जनता का भरोसा उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। क्योंकि सरकारें बदल सकती हैं, राजनीतिक दलों की स्थिति बदल सकती है, लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति विश्वास कमजोर हो जाए तो उसकी भरपाई आसान नहीं होती। छत्तीसगढ़ से कांग्रेस कार्यकर्ताओं का दिल्ली जाना और भाजपा का प्रदेश में अपनी बात रखना इसी राजनीतिक संघर्ष के दो पक्ष हैं। यह देखना भी जरूरी है कि इस संघर्ष में आम मतदाता के वास्तविक सवाल कितनी जगह पा रहे हैं।

आखिरकार, जनता यह नहीं जानना चाहती कि किस दल ने किसे कितना बड़ा राजनीतिक जवाब दिया। वह जानना चाहती है कि उसका नाम मतदाता सूची में सुरक्षित है या नहीं, शिकायत होने पर उसकी सुनवाई होगी या नहीं और उसका वोट बिना किसी भेदभाव के लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बनेगा या नहीं।

इसलिए आज सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या राजनीतिक दल वोट की लड़ाई को अपनी सत्ता और प्रतिष्ठा की लड़ाई बनाए रखेंगे, या मतदाता के अधिकार को सबसे ऊपर रखेंगे?

लोकतंत्र की असली जीत किसी एक पार्टी की रैली, प्रेसवार्ता या राजनीतिक बयान में नहीं है। उसकी जीत तब है, जब हर पात्र नागरिक को मतदान का अवसर मिले, हर शिकायत की निष्पक्ष जांच हो और चुनावी प्रक्रिया पर जनता का भरोसा कायम रहे।

क्योंकि लोकतंत्र में वोट केवल एक बटन दबाने का नाम नहीं है। यह नागरिक की आवाज, उसकी भागीदारी और देश के भविष्य को तय करने का अधिकार है। इस अधिकार की रक्षा राजनीतिक नारों से नहीं, बल्कि निष्पक्ष व्यवस्था, पारदर्शिता और जवाबदेही से होगी।

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