नरेन्द्र पाण्डेय ;
क्या छत्तीसगढ़ बीजेपी में सब कुछ ठीक चल रहा है? अगर सब ठीक है, तो फिर प्रदेश प्रभारी स्मृति ईरानी को रायपुर में पार्टी के नेताओं, मंत्रियों और विधायकों के साथ मैराथन बैठकें करने की जरूरत क्यों पड़ी? और इन बैठकों में सख्त तेवरों की चर्चा क्यों हो रही है?
छत्तीसगढ़ की राजनीति को समझने के लिए इन बैठकों को सिर्फ एक सामान्य संगठनात्मक कार्यक्रम मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। क्योंकि जब किसी सत्ताधारी पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व अपने मंत्रियों, विधायकों और संगठन के पदाधिकारियों के साथ विस्तार से बैठक करता है, तो उसके राजनीतिक मायने भी होते हैं। रायपुर के कुशाभाऊ ठाकरे परिसर में स्मृति ईरानी की लगातार बैठकों ने प्रदेश बीजेपी की कार्यप्रणाली, सरकार के प्रदर्शन और संगठन की भविष्य की रणनीति को लेकर कई सवाल खड़े किए हैं।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल है—क्या यह केवल समीक्षा थी, या फिर पार्टी के भीतर जवाबदेही तय करने की शुरुआत?
आखिर मंत्रियों को सख्त हिदायत देने की जरूरत क्यों?

सत्ता में आने के बाद किसी भी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती होती है अपने चुनावी वादों को जमीन पर उतारना। जनता ने जिन उम्मीदों के साथ सरकार चुनी है, वह उन उम्मीदों का हिसाब भी मांगती है। चुनाव के समय जनता तक पहुंचना आसान होता है, लेकिन सरकार बनने के बाद जनता के बीच लगातार बने रहना, समस्याओं का समाधान करना और प्रशासनिक व्यवस्था को चुस्त रखना असली परीक्षा होती है। ऐसे में प्रदेश प्रभारी की बैठकों में मंत्रियों के कामकाज और कार्यशैली पर जोर दिए जाने की खबरें महत्वपूर्ण हो जाती हैं। और अगर केंद्रीय नेतृत्व को बार-बार कामकाज की समीक्षा करनी पड़ रही है, तो यह सवाल जरूर उठता है कि क्या सरकार की उपलब्धियां जनता तक उसी प्रभाव से पहुंच रही हैं, जिस प्रभाव से उन्हें प्रचारित किया जा रहा है?
प्रश्न तो सरकार और संगठन के बीच तालमेल का भी है . दरअसल बीजेपी की राजनीति में सरकार और संगठन दोनों की भूमिका महत्वपूर्ण है। सरकार प्रशासन चलाती है, जबकि संगठन जनता के बीच राजनीतिक संवाद बनाए रखता है। अगर सरकार अच्छा काम कर रही है, लेकिन संगठन जनता की नाराजगी या स्थानीय समस्याओं को नेतृत्व तक नहीं पहुंचा पा रहा, तो राजनीतिक नुकसान हो सकता है। इसी तरह, संगठन सक्रिय हो, लेकिन सरकारी योजनाओं का लाभ लोगों तक समय पर न पहुंचे, तो कार्यकर्ताओं के सामने भी जवाब देना मुश्किल हो जाता है। इसलिए स्मृति ईरानी की बैठकों को सरकार और संगठन के बीच तालमेल के नजरिये से देखना जरूरी है।
क्या स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं की शिकायतें नेतृत्व तक पहुंच रही हैं? क्या मंत्रियों और विधायकों की जनता के बीच नियमित मौजूदगी है? क्या सरकारी योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंच रहा है? और क्या पार्टी के भीतर से आने वाले फीडबैक को गंभीरता से लिया जा रहा है? इन सवालों के जवाब ही बताएंगे कि बीजेपी का संगठनात्मक ढांचा जमीन पर कितना मजबूत है।
तो फिर क्या बीजेपी अभी से 2028 की तैयारी में जुट गई है?
राजनीति में कोई भी बड़ी पार्टी केवल वर्तमान चुनावी जीत के भरोसे नहीं बैठती। वह अगले चुनाव की तैयारी भी करती है। छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव 2028 में होने हैं। यानी पार्टी के पास अपने कामकाज का आकलन करने, कमजोरियों को सुधारने और संगठन को मजबूत बनाने के लिए समय है। यही वह दौर है, जब नेतृत्व यह देख सकता है कि कौन-सा मंत्री अपने विभाग में कितना प्रभावी है, कौन-सा विधायक अपने क्षेत्र में कितना सक्रिय है और संगठन जनता के बीच कितना भरोसा बनाए हुए है।
स्मृति ईरानी की बैठकों को 2028 के चुनाव के संभावित राजनीतिक संकेत के रूप में देखा जा सकता है इसे संभावित राजनीतिक संकेत के रूप में देखा जा सकता है, मगर इसे मंत्रिमंडल में फेरबदल या किसी नेता के भविष्य पर फैसले का संकेत मानना जल्दबाजी होगी।
मगर इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। सख्ती का असर जमीन पर दिखाई देगा या केवल बैठकों तक सीमित रहेगा?
क्योंकि राजनीति में बैठकों की कमी नहीं है। समीक्षा होती है, निर्देश दिए जाते हैं, लक्ष्य निर्धारित होते हैं और सुधार के वादे भी किए जाते हैं। लेकिन जनता को इन बैठकों के मिनट्स नहीं चाहिए। जनता को परिणाम चाहिए। अगर किसी मंत्री को अपने विभाग में सुधार करने का निर्देश दिया गया है, तो उसका असर योजनाओं के क्रियान्वयन में दिखाई देना चाहिए। अगर विधायकों से जनता के बीच सक्रिय रहने की अपेक्षा की गई है, तो उनकी मौजूदगी लोगों की समस्याओं के समाधान में दिखनी चाहिए। अगर संगठन को मजबूत बनाने की बात हुई है, तो कार्यकर्ताओं को यह महसूस होना चाहिए कि उनकी बात सुनी जा रही है। और अगर सरकार के कामकाज की समीक्षा हुई है, तो आम नागरिक को बेहतर प्रशासन का अनुभव होना चाहिए। यही वह कसौटी है, जिस पर स्मृति ईरानी की बैठकों की वास्तविक सफलता को परखा जाएगा। सवाल यह नहीं है कि बैठक में कितनी सख्ती दिखाई गई। सवाल यह है कि उस सख्ती के बाद कितनी जवाबदेही तय हुई और कितने परिणाम सामने आए।
यहां एक और राजनीतिक पहलू समझना जरूरी है। जब कोई केंद्रीय नेता प्रदेश के संगठन और सरकार की समीक्षा करता है, तो उसका संदेश केवल मंत्रियों तक सीमित नहीं रहता। वह विधायकों, संगठन के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं तक भी पहुंचता है। लेकिन जवाबदेही केवल नीचे के स्तर पर तय नहीं होनी चाहिए। यदि सरकार के सामने कोई समस्या है, तो उसके कारणों का भी आकलन होना चाहिए। प्रशासनिक बाधाएं क्या हैं? योजनाओं के क्रियान्वयन में कहां दिक्कत आ रही है? स्थानीय स्तर पर जनता की नाराजगी किन मुद्दों पर है? सख्ती तभी प्रभावी होती है, जब उसके साथ निष्पक्ष समीक्षा और परिणामों की निगरानी भी हो।
और बीजेपी के लिए असली चुनौती भी यही है -
स्मृति ईरानी की रायपुर में हुई बैठकों ने छत्तीसगढ़ बीजेपी की कार्यशैली और सरकार के प्रदर्शन को लेकर चर्चा जरूर बढ़ाई है। लेकिन इन बैठकों का वास्तविक राजनीतिक महत्व उनके तेवरों से नहीं, बल्कि उनके बाद होने वाले फैसलों और जमीन पर दिखाई देने वाले बदलावों से तय होगा। अगर इन बैठकों से मंत्रियों की कार्यशैली सुधरती है, संगठन मजबूत होता है और जनता की समस्याओं का समाधान तेजी से होता है, तो यह सरकार और पार्टी दोनों के लिए सकारात्मक संकेत होगा। लेकिन अगर सख्त निर्देशों के बावजूद व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं आता, तो फिर सवाल केवल मंत्रियों की कार्यशैली पर नहीं, बल्कि पूरी राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था पर उठेंगे। और अब सबसे बड़ा सवाल आपसे।
क्या स्मृति ईरानी की सख्ती छत्तीसगढ़ बीजेपी को और मजबूत बनाने की कवायद है, या यह इस बात का संकेत है कि पार्टी नेतृत्व अब सरकार और संगठन के प्रदर्शन को लेकर ज्यादा सतर्क हो गया है? और क्या भाजपा जनता की अपेक्षाओं को समय रहते समझकर अपने कामकाज में सुधार कर पाएगी, या फिर उसे अपनी असली परीक्षा का एहसास अगले विधानसभा चुनाव के करीब पहुंचकर होगा? क्योंकि राजनीति में नेताओं की बैठकों से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है उन बैठकों का जनता की जिंदगी पर पड़ने वाला असर।