नरेन्द्र पाण्डेय : छत्तीसगढ़ 26 बरस का हो चूका हैं। वर्ष 2000 में जब यह राज्य अस्तित्व में आया था, तब उसके सामने संसाधनों की कमी थी, लेकिन संभावनाओं की कमी नहीं थी। खनिज संपदा, वन, बिजली, कृषि और अपेक्षाकृत छोटी आबादी—इन सबने राज्य को आर्थिक रूप से मजबूत बनने का अवसर दिया।
आज छत्तीसगढ़ का बजट लाखों करोड़ रुपये की अर्थव्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या राज्य की आर्थिक ताकत उसी अनुपात में बढ़ी है, जिस अनुपात में सरकार का खर्च और उसकी जिम्मेदारियां बढ़ी हैं?
नीति आयोग की 2025 की रिपोर्ट और हालिया बजट के आंकड़े इस सवाल को गंभीर बना देते हैं। राज्य गठन के शुरुआती वर्षों में छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी चुनौती थी—सीमित राजस्व संसाधनों में विकास का खर्च निकालना।
2001-02 में राज्य का राजस्व व्यय लगभग 4,914 करोड़ रुपये था। 2005-06 तक यह बढ़कर लगभग 8,603 करोड़ रुपये हो गया। इसी अवधि में राज्य का अपना राजस्व 5,475 करोड़ रुपये तक पहुंचा।
राज्य वित्त आयोग के आंकड़ों के अनुसार 2005-06 में राज्य के अपने राजस्व से राजस्व व्यय की लगभग 64.18 प्रतिशत पूर्ति हो रही थी। 2009-10 तक यह अनुपात बढ़कर 69.32 प्रतिशत हो गया। यानी शुरुआती दशक में राज्य की अपनी कमाई और खर्च के बीच संबंध मजबूत हुआ था।
ऋण के मामले में भी शुरुआती तस्वीर आज की तुलना में अलग थी। 2000-01 में छत्तीसगढ़ का Debt-to-GSDP ratio 22.01 प्रतिशत था। 2001-02 में यह 21.66 प्रतिशत रहा और 2002-03 में बढ़कर 25.46 प्रतिशत हुआ। फिर अगले दशक में इसमें उल्लेखनीय सुधार आया।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। असली मोड़ पिछले डेढ़ दशक में आया 16वें वित्त आयोग के आंकड़ों के आधार पर PRS ने बताया है कि छत्तीसगढ़ की outstanding liabilities 2011-12 में GSDP की 11.5 प्रतिशत थीं, जो 2023-24 में बढ़कर 24.7 प्रतिशत हो गईं। यानी राज्य की अर्थव्यवस्था बढ़ी, लेकिन उसके साथ देनदारियों का बोझ भी तेज हुआ।
2026-27 के बजट में outstanding liabilities का अनुमान 21.4 प्रतिशत है। यह 2025-26 के संशोधित अनुमान 21 प्रतिशत से थोड़ा अधिक है। यहीं आर्थिक अनुशासन का सवाल खड़ा होता है।
नीति आयोग के 2025 के विश्लेषण में 2022-23 के आंकड़ों के आधार पर छत्तीसगढ़ का कुल सार्वजनिक ऋण GSDP का 24 प्रतिशत बताया गया था। यह उस समय राज्यों के मध्य स्तर से कम था। लेकिन उसी रिपोर्ट में एक दूसरी तस्वीर भी सामने आती है।
राज्य की contingent liabilities यानी संभावित देनदारियां 2021-22 में GSDP की 4.8 प्रतिशत थीं। यह राज्यों के मध्य स्तर 1.6 प्रतिशत से काफी ज्यादा था। यानी दिखाई देने वाले सरकारी कर्ज के अलावा ऐसी वित्तीय जिम्मेदारियां भी मौजूद थीं, जो भविष्य में सरकार के ऊपर बोझ बन सकती हैं।
नीति आयोग ने छत्तीसगढ़ की Debt Sustainability का आकलन करते हुए यह भी संकेत दिया कि मौजूदा परिस्थितियां बनी रहीं तो भविष्य में Debt-to-GSDP ratio पर दबाव बढ़ सकता है। अब सवाल यह है कि क्या राज्य भविष्य के लिए पर्याप्त वित्तीय गुंजाइश बचा रहा है?
लोकतंत्र में गरीब, किसान, महिला और कमजोर वर्गों को सहायता देना कोई गलत नीति नहीं है। महतारी वंदन योजना के माध्यम से महिलाओं को आर्थिक सहायता देना सामाजिक सुरक्षा की नीति है। किसानों को सहायता देना भी कृषि अर्थव्यवस्था को सहारा देने का प्रयास है। समस्या तब पैदा होती है जब सरकारें यह भूलने लगती हैं कि हर योजना की अपनी एक दीर्घकालीन वित्तीय कीमत होती है।
2026-27 में महतारी वंदन योजना के लिए 8,200 करोड़ रुपये रखे गए हैं। कृषक उन्नति योजना के लिए 10,000 करोड़ रुपये, ऊर्जा सब्सिडी के लिए लगभग 6,700 करोड़ रुपये और खाद्यान्न सहायता के लिए लगभग 6,500 करोड़ रुपये का प्रावधान बताया गया है। इन योजनाओं को जोड़ दें तो राशि 30 हजार करोड़ रुपये से अधिक हो जाती है।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। हर कल्याणकारी योजना मुफ्त की रेवड़ी नहीं होती। गरीब को भोजन, महिला को सामाजिक सुरक्षा और किसान को संकट के समय सहायता देना कल्याणकारी राज्य की जिम्मेदारी हो सकती है। लेकिन आर्थिक अनुशासन का सवाल यह है कि—
क्या लाभार्थी की आर्थिक क्षमता बढ़ रही है?
क्या वह भविष्य में सरकारी सहायता पर कम निर्भर होगा?
क्या योजना रोजगार और उत्पादन बढ़ा रही है?
क्या उस खर्च के बदले राज्य को कोई आर्थिक परिसंपत्ति या भविष्य का राजस्व मिल रहा है?
यदि इन सवालों का जवाब नहीं है, तो लगातार बढ़ता राजस्व व्यय भविष्य में समस्या बन सकता है।
राजकोषीय घाटा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बताता है कि सरकार की कुल आय और कुल खर्च के बीच कितना अंतर है। 2026-27 में छत्तीसगढ़ का राजकोषीय घाटा 28,900 करोड़ रुपये यानी GSDP का 4.1 प्रतिशत अनुमानित है। यह 3 प्रतिशत की सामान्य सीमा से ऊपर है।
हालांकि केंद्र से पूंजीगत व्यय के लिए मिलने वाले 8,500 करोड़ रुपये के 50 साल के ब्याज-मुक्त ऋण को उधारी सीमा की गणना से बाहर रखा जाना है। इसलिए तस्वीर को संदर्भ सहित देखना जरूरी है। लेकिन एक और तथ्य ज्यादा चिंताजनक है।
2026-27 में राज्य को लगभग 2,000 करोड़ रुपये का Revenue Deficit रहने का अनुमान है। इसका सरल अर्थ है—सरकार की नियमित आय अपने नियमित खर्च को पूरी तरह पूरा नहीं कर पा रही है। और जब वेतन, पेंशन, ब्याज, सब्सिडी और ट्रांसफर जैसी मदों पर खर्च बढ़ता है तो विकास के लिए उपलब्ध धन पर दबाव आता है।
PRS के अनुसार CAG के आंकड़ों के आधार पर मार्च 2024 तक छत्तीसगढ़ की off-budget borrowings लगभग 7,293 करोड़ रुपये थीं।2019-20 में इन पर ब्याज भुगतान 130 करोड़ रुपये था। 2020-21 में 212 करोड़, 2021-22 में 229 करोड़ और 2022-23 में 462 करोड़ रुपये। 2023-24 में ब्याज भुगतान बढ़कर 742 करोड़ रुपये हो गया।
यानी केवल कर्ज ही नहीं, कर्ज की सेवा यानी ब्याज का बोझ भी बढ़ा। यही वह क्षेत्र है जहां आर्थिक अनुशासन की सबसे गंभीर परीक्षा होती है।
छत्तीसगढ़ की कहानी को केवल भाजपा बनाम कांग्रेस या किसी एक सरकार के चश्मे से देखना गलत होगा। 2000 से आज तक अलग-अलग सरकारों ने अलग-अलग दौर में कर्ज लिया, विकास किया, सब्सिडी दी, सामाजिक योजनाएं चलाईं और अधोसंरचना बनाई।
शुरुआती दौर में राज्य ने अपनी आय बढ़ाने और ऋण को नियंत्रित रखने में उल्लेखनीय काम किया। बाद के वर्षों में अर्थव्यवस्था का आकार तेजी से बढ़ा, लेकिन उसके साथ सरकारी दायित्व भी बढ़े। आज चुनौती यह है कि छत्तीसगढ़ को “कल्याणकारी राज्य” और “वित्तीय रूप से जिम्मेदार राज्य” के बीच संतुलन बनाना होगा। महतारी वंदन बंद कर देना समाधान नहीं है। किसान सहायता खत्म कर देना समाधान नहीं है। सब्सिडी खत्म कर देना भी समाधान नहीं है।
समाधान है—लक्षित सहायता, बेहतर राजस्व संग्रह, अनुत्पादक खर्च में कटौती, ऑफ-बजट उधारी पर नियंत्रण और पूंजीगत निवेश में बढ़ोतरी। क्योंकि किसी सरकार के लिए पांच साल तक जनता को पैसा देना आसान है। मुश्किल काम है ऐसा आर्थिक ढांचा बनाना जिसमें पांच साल बाद जनता को पैसा देने की जरूरत ही कम पड़े। यही अंतर है लोकप्रिय राजनीति और टिकाऊ अर्थव्यवस्था के बीच।
छत्तीसगढ़ के सामने आज सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या हम आने वाली पीढ़ी के लिए विकास की संपत्ति बना रहे हैं या वर्तमान की लोकप्रियता की कीमत भविष्य के बजट से चुका रहे हैं? 26 साल बाद छत्तीसगढ़ को इस सवाल का जवाब आंकड़ों में देना होगा, नारों में नहीं।