SCGNEWS/ लाईफ वर्सिटी : आजादी से स्वतंत्रता तक — तिरंगे ने आज फिर बहुत कुछ सिखाया
15 अगस्त…
एक तारीख नहीं है।
यह भारत की चेतना का वह दिन है, जब हमने सिर्फ अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति नहीं पाई थी, बल्कि अपने भविष्य को अपने हाथों से लिखने का अधिकार पाया था।
आज स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर अलग-अलग स्थानों पर जाने का अवसर मिला। हर जगह तिरंगा था, राष्ट्रगान था, देशभक्ति थी… लेकिन हर जगह से लौटते हुए लगा कि स्वतंत्रता का अर्थ केवल झंडा फहराना नहीं है। स्वतंत्रता का अर्थ है—अपने कर्तव्य को समझना।
सुबह 9 बजे रायपुर के शहीद वीर नारायण कॉम्प्लेक्स में डॉ. उदय भान सिंह चौहान जी के साथ ध्वजारोहण में शामिल हुआ।
यह स्थान मेरे लिए इसलिए भी विशेष है, क्योंकि यही वह जगह है जहां डॉ. चौहान जी ने छत्तीसगढ़ निर्माण के आंदोलन की शुरुआत की थी। वर्षों तक वे अपने साथियों के साथ यहां धरने पर बैठे रहे। संघर्ष चलता रहा… आवाज उठती रही… और अंततः वह दिन आया, जब छत्तीसगढ़ के निर्माण की घोषणा हुई।
आज हर साल 15 अगस्त को वे अपने साथियों के साथ यहां तिरंगा फहराकर उस संघर्ष को याद करते हैं।
आज उन्होंने छत्तीसगढ़ निर्माण आंदोलन से जुड़ी अनेक स्मृतियां साझा कीं। उन्होंने बताया कि आंदोलन कैसे धीरे-धीरे आगे बढ़ा, लोगों को जोड़ा गया और किस तरह एक अलग राज्य के सपने ने आकार लिया।
उनकी बातें सुनते हुए लगा कि आजादी हमें किसी ने उपहार में नहीं दी थी। इसके पीछे संघर्ष था, त्याग था और वर्षों की प्रतीक्षा थी।
यहीं अपने संबोधन में मैंने एक और सवाल उठाया।
आज सोशल मीडिया का दौर है। YouTube, Instagram, X, Facebook और न जाने कितने माध्यम हैं। हर मिनट हमारे सामने हजारों सूचनाएं आती हैं। लेकिन हर सूचना सत्य नहीं होती। कई बार यही सूचना हमें जोड़ने के बजाय बांटने लगती है।
आज तिरंगे को लेकर विवाद होता है। राष्ट्रगान को लेकर विवाद होता है। राष्ट्रगीत को लेकर विवाद होता है।
लेकिन क्या स्वतंत्रता का अर्थ यही है कि हम अपने ही राष्ट्रीय प्रतीकों को विवाद का विषय बना दें?
जन-गण-मन हमारा राष्ट्रगान है और वंदे मातरम् हमारा राष्ट्रगीत। दोनों का अपना सम्मान है, अपना इतिहास है और स्वतंत्रता आंदोलन में दोनों की अपनी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
वंदे मातरम् सिर्फ कुछ शब्द नहीं थे।
आजादी के आंदोलन में जब कोई नौजवान अपने प्राणों की बाजी लगाने निकलता था, जब अंग्रेजी हुकूमत के सामने खड़ा होता था, तब उसके भीतर जोश भरने वाले शब्दों में एक था—वंदे मातरम्।
आज भी जब हम कहते हैं—वंदे मातरम्—तो भीतर कहीं एक कंपन पैदा होता है। एक भाव जागता है कि यह धरती सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं है। यह हमारी मां है।
लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि हम राष्ट्रगान का महत्व कम कर दें।
राष्ट्रगान एक गरिमा है। एक अनुशासन है। एक सामूहिक राष्ट्रीय चेतना है।
इसलिए मेरा मानना है—विवाद नहीं, सम्मान चाहिए।
जहां राष्ट्रगान की गरिमा आवश्यक है, वहां राष्ट्रगान गाइए।
जहां देशभक्ति का जोश जगाना है, वहां वंदे मातरम् कहिए।
भारत की ताकत इसी में है कि वह विविधताओं को साथ लेकर चलता है।
इसके बाद समर्पण अस्पताल, मोवा में ध्वजारोहण का अवसर मिला। मेडिकल कॉलेज रायपुर के सर्जरी विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. मंजू सिंह जी के साथ तिरंगा फहराया।
अस्पताल में बोलते हुए मन में एक बात आई—
तिरंगा हमें कर्तव्यपरायणता का पाठ भी सिखाता है।
आज 15 अगस्त को हम तिरंगे के साथ अपनी तस्वीर खींचते हैं। Instagram और Facebook पर लगाते हैं और समझते हैं कि हमने देशभक्ति का कर्तव्य पूरा कर दिया।
लेकिन क्या देशभक्ति सिर्फ एक दिन की पोस्ट है?
क्या देशप्रेम सिर्फ 15 अगस्त और 26 जनवरी के स्टेटस का नाम है?
नहीं।
देश आपके काम से चलता है।
आप डॉक्टर हैं तो ईमानदारी से मरीज की सेवा कीजिए।
आप शिक्षक हैं तो एक पीढ़ी का भविष्य बनाइए।
आप व्यापारी हैं तो ईमानदारी से व्यापार कीजिए।
आप पत्रकार हैं तो सत्ता से सवाल पूछिए।
आप अधिकारी हैं तो भ्रष्टाचार से दूर रहिए।
आप राजनेता हैं तो आने वाली पीढ़ियों के लिए निर्णय लीजिए।
आप सैनिक हैं तो सीमा पर देश की रक्षा कीजिए।
यही देशभक्ति है।
अस्पताल में भी हर व्यक्ति का अपना कर्तव्य है। डॉक्टर की अलग जिम्मेदारी है, नर्स की अलग, पैरामेडिक्स की अलग, प्रशासन की अलग और ओटी स्टाफ की अलग।
सबका काम अलग है, लेकिन लक्ष्य एक है—मरीज का जीवन बचाना।
ठीक यही भारत है।
हम अलग-अलग हैं, लेकिन हमारा लक्ष्य एक होना चाहिए—भारत का निर्माण।
इसके बाद रायपुर के कौशल्या विहार, सेक्टर-13 स्थित सैन्य अकादमी पहुंचा, जहां बच्चों को नि:शुल्क प्रशिक्षण दिया जाता है।
वहां बच्चों और नागरिकों के सामने मैंने तीन शब्द रखे—
आजादी… स्वाधीनता… स्वतंत्रता।
सुनने में तीनों एक जैसे लगते हैं, लेकिन इनके अर्थों में गहराई है।
आजादी यानी बंधन से मुक्ति।
हम किसी दूसरे के अधीन नहीं रहना चाहते थे। इसलिए हमने आजादी की लड़ाई लड़ी।
लेकिन जब आजाद हो गए, तब सवाल आया—अब चलेंगे कैसे?
समाज अपने नियमों से चलता है। राष्ट्र अपने संविधान से चलता है। व्यवस्था अपने प्रोटोकॉल से चलती है।
यहीं से आती है—स्वाधीनता।
अब हम किसी दूसरे के अधीन नहीं थे। हम अपने नियमों के अधीन थे। हमारे अपने कानून होंगे, अपनी व्यवस्था होगी, अपना संविधान होगा।
और फिर अनेक राज्यों, भाषाओं, संस्कृतियों और समुदायों को एक सूत्र में बांधकर एक राष्ट्र के रूप में आगे बढ़ना था।
यहीं से आती है—स्वतंत्रता।
इसलिए आजादी, स्वाधीनता और स्वतंत्रता केवल शब्द नहीं हैं। ये भारत की यात्रा के तीन पड़ाव हैं।
लेकिन आज हमारी एक समस्या है।
हम आजाद तो होना चाहते हैं, लेकिन किसी भी नियम में बंधना नहीं चाहते।
हम कहते हैं—मुझे आजादी चाहिए।
लेकिन समाज में रहने के लिए कुछ मर्यादाएं आवश्यक हैं। राष्ट्र में रहने के लिए संविधान आवश्यक है। व्यवस्था में रहने के लिए कानून आवश्यक है।
बंधन हमेशा गुलामी नहीं होता। कुछ बंधन व्यवस्था को जन्म देते हैं।
और इसलिए मैंने वहां कहा—
चिकित्सक सेवा करे।
शिक्षक निर्माण करे।
चिंतक विचार करे।
पत्रकार निर्भीक होकर प्रश्न पूछे।
राजनेता भविष्य का निर्माण करे।
ब्यूरोक्रेसी ईमानदारी से काम करे।
पुलिस कानून की रक्षा करे।
और सैनिक सीमा पर देश की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तैयार रहे।
यही राष्ट्रभक्ति है।
यही स्वतंत्रता की असली कीमत है।
और फिर यात्रा पहुंची रायपुर के रोहिणीपुरम स्थित सृष्टि दिव्यांग स्कूल में।
यहां आकर स्वतंत्रता का अर्थ कुछ और गहरा हो गया।
हम कहते हैं—हम खुश हैं।
लेकिन हमारी खुशी कितनी देर टिकती है?
आज स्वतंत्रता दिवस है, इसलिए हम खुश हैं।
कल काम पर जाएंगे।
फिर वही तनाव।
फिर वही भागदौड़।
फिर वही चिंता।
फिर वही शिकायतें।
हमारी खुशी परिस्थितियों पर निर्भर है।
लेकिन भारतीय दर्शन में एक शब्द है—आनंद।
खुशी और आनंद में अंतर है।
खुशी किसी कारण से आती है और कारण समाप्त होते ही चली जाती है।
लेकिन आनंद भीतर से आता है।
और सृष्टि के इन बच्चों के बीच बैठकर मुझे लगा कि शायद आनंद की सबसे सरल परिभाषा यही बच्चे हमें सिखा रहे हैं।
इनको दुनिया की राजनीति की चिंता नहीं।
कौन जीता, कौन हारा—इसकी चिंता नहीं।
किसने क्या कहा—इसकी चिंता नहीं।
किसके पास कितना पैसा है—इसकी चिंता नहीं।
इनकी दुनिया छोटी है, लेकिन मुस्कुराहट बड़ी है।
मिला तो खुश।
नहीं मिला तो भी खुश।
खेलने को मिला तो खुश।
कुछ नहीं मिला तो अपनी दुनिया में खुश।
शायद इसलिए इन्हें दिव्यांग कहा जाता है—उनके भीतर एक ऐसी दिव्यता है, जिसे हम तथाकथित सामान्य लोग अपनी भागदौड़ में खो चुके हैं।
और जो लोग इन बच्चों को संभालते हैं, उन्हें मैं वास्तविक अर्थों में हीरो मानता हूं।
क्योंकि किसी कमजोर को संभालना आसान नहीं होता।
किसी को मुस्कुराना सिखाना आसान नहीं होता।
किसी दूसरे के जीवन को अपना समय देना आसान नहीं होता।
सृष्टि के संचालक वास्तव में धुरंधर हैं।
आज पूरे दिन की यात्रा में चार तस्वीरें मन में बस गईं।
एक जगह—छत्तीसगढ़ निर्माण के संघर्ष की स्मृतियां थीं।
दूसरी जगह—अस्पताल था, जहां कर्तव्य और सेवा का तिरंगा था।
तीसरी जगह—सैन्य अकादमी थी, जहां देश के भविष्य के सैनिक और जिम्मेदार नागरिक तैयार हो रहे थे।
और चौथी जगह—दिव्यांग बच्चों की दुनिया थी, जहां स्वतंत्रता का अर्थ किसी किताब में नहीं, बल्कि मुस्कुराते चेहरों में दिखाई दे रहा था।
शायद आज तिरंगा हमसे यही कह रहा था—
मैं केवल एक झंडा नहीं हूं।
मैं उस किसान की मेहनत हूं, जो खेत में अन्न उगाता है।
मैं उस डॉक्टर की सेवा हूं, जो किसी की जान बचाता है।
मैं उस शिक्षक का ज्ञान हूं, जो भविष्य बनाता है।
मैं उस पत्रकार का सवाल हूं, जो सत्ता को आईना दिखाता है।
मैं उस सैनिक का साहस हूं, जो सीमा पर खड़ा है।
मैं उस नागरिक की ईमानदारी हूं, जो अपने हिस्से का काम पूरी निष्ठा से करता है।
मैं भगवा हूं—त्याग का प्रतीक।
मैं श्वेत हूं—शांति का प्रतीक।
मैं हरा हूं—समृद्धि और जीवन का प्रतीक।
और मेरे बीच का अशोक चक्र कहता है—रुकना मत, चलते रहो।
क्योंकि राष्ट्र भी तभी आगे बढ़ता है, जब उसके नागरिक चलते रहते हैं।
आज स्वतंत्रता दिवस पर हमें सिर्फ यह नहीं पूछना चाहिए कि देश ने हमें क्या दिया।
हमें यह पूछना चाहिए—
हमने देश को क्या दिया?
हमने अपने काम में कितनी ईमानदारी दी?
अपने समाज को कितना समय दिया?
अपने आसपास के व्यक्ति के जीवन में कितनी रोशनी दी?
और भारत को बेहतर बनाने के लिए हमने अपने हिस्से का कितना योगदान दिया?
आजादी हमें मिली थी।
स्वाधीनता हमने स्वीकार की।
और स्वतंत्रता की रक्षा हमें हर दिन करनी है।
इसलिए 15 अगस्त केवल एक उत्सव नहीं है।
यह आत्ममंथन का दिन है।
यह याद करने का दिन है कि जिन लोगों ने देश के लिए संघर्ष किया, उनके सपनों का भारत हम बना पा रहे हैं या नहीं।
तिरंगा आज भी आसमान में लहरा रहा है।
वह हमसे कह रहा है—
मुझे केवल फहराओ मत…
मुझे अपने जीवन में उतारो।
अपने काम में ईमानदारी लाओ।
अपने व्यवहार में संवेदना लाओ।
अपने विचारों में स्वतंत्रता लाओ।
अपने कर्मों में राष्ट्रभक्ति लाओ।
तभी 15 अगस्त सच में स्वतंत्रता दिवस बनेगा।
और तब पूरे गर्व से कह पाएंगे—
मैं किसी एक पंथ का नहीं हूं।
मैं किसी एक जाति का नहीं हूं।
मैं किसी एक क्षेत्र का नहीं हूं।
मैं भारतवर्ष का हूं।
उस भारत का…
जहां त्याग है,
जहां शांति है,
जहां समृद्धि है,
जहां विविधता में एकता है।
जहां तिरंगा केवल आसमान में नहीं,
हर भारतीय के चरित्र में लहराता है।
वंदे मातरम्।
वंदे मातरम्।
भारत माता की जय।