नरेन्द्र पाण्डेय ; किसी इंसान की जिंदगी में 26 साल की उम्र एक खास मुकाम होती है। यह वह उम्र है जब बचपन पीछे छूट चुका होता है, शिक्षा पूरी हो चुकी होती है और युवा अपने पैरों पर खड़े होकर अपनी पहचान बनाने के लिए तैयार होता है। वह अपने फैसले खुद लेना चाहता है, अपनी जिम्मेदारियां खुद उठाना चाहता है और दूसरों के सहारे नहीं, अपने दम पर आगे बढ़ना चाहता है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या हमारा छत्तीसगढ़ भी 26 साल की उम्र में इस मुकाम पर पहुंच पाया है?
उम्र तो पूरी जवानी की हो गई, लेकिन चाल अब भी किसी सहारे की तलाश में दिखाई देती है। राज्य के पास संसाधन हैं, खनिज संपदा है, जंगल हैं, पानी है, उपजाऊ जमीन है, मेहनती लोग हैं, शिक्षित और हुनरमंद युवा हैं। फिर भी विकास की तस्वीर देखते हुए लगता है कि छत्तीसगढ़ ने अपने पैरों पर खड़े होने की कला अभी तक ठीक से सीखी ही नहीं है।
विडंबना देखिए, जिस राज्य के पास देश की अर्थव्यवस्था को गति देने की क्षमता है, वह अपनी अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाने के लिए अब भी दूसरों की तरफ देखता नजर आता है।
इसका दोष किसे दें?
राज्य के गठन से लेकर अब तक सत्ता के शीर्ष पर कई चेहरे बदले। सरकारें बदलीं, राजनीतिक विचारधाराएं बदलीं, घोषणाओं के रंग बदले, योजनाओं के नाम बदले और विकास के दावों की भाषा भी बदली। हर सरकार ने छत्तीसगढ़ को संवारने का संकल्प लिया। किसी ने इसे विकसित राज्य बनाने का सपना दिखाया तो किसी ने विकसित छत्तीसगढ़ का रोडमैप प्रस्तुत किया।
लेकिन 26 साल बाद भी अगर प्रदेश का युवा रोजगार के लिए दूसरे राज्यों का रुख कर रहा है, किसान अपनी उपज के उचित मूल्य के लिए संघर्ष कर रहा है, स्थानीय उद्योग अपेक्षित गति नहीं पकड़ पा रहे हैं और प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता के बावजूद स्थानीय लोगों को उनका पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है, तो हमें विकास के दावों का हिसाब जरूर मांगना चाहिए।
आखिर 26 वर्षों में हमने बनाया क्या?
क्या हमने केवल सड़कें, भवन, सरकारी कार्यालय और योजनाओं के नाम बनाए हैं, या ऐसा मजबूत आर्थिक ढांचा भी तैयार किया है जो आने वाली पीढ़ियों को रोजगार और सम्मानजनक जीवन दे सके?
हमारा युवा किसी से कम नहीं है। वह पढ़ा-लिखा है, तकनीकी रूप से सक्षम है, हुनर रखता है और सपने देखने का साहस भी रखता है। लेकिन उसके सामने सबसे बड़ा सवाल है कि अवसर कहां हैं? उसे अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए रायपुर, बिलासपुर या जगदलपुर से निकलकर हैदराबाद, पुणे, बेंगलुरु और दिल्ली क्यों जाना पड़ता है?
क्या छत्तीसगढ़ केवल श्रम और संसाधन देने वाला राज्य बनकर रह जाएगा? क्या यहां का युवा दूसरे राज्यों की कंपनियों को अपनी प्रतिभा देगा और अपने ही प्रदेश में रोजगार के अवसरों का इंतजार करता रहेगा?
और राजनीति की विडंबना तो देखिए! चुनाव आते ही युवा सबसे बड़ा मुद्दा बन जाता है। उसके नाम पर घोषणाएं होती हैं, रोजगार के वादे होते हैं, कौशल विकास की बातें होती हैं। लेकिन चुनाव बीतते ही वही युवा कभी भर्ती प्रक्रिया की तारीख पूछता है, कभी परीक्षा परिणाम का इंतजार करता है और कभी अपनी डिग्री लेकर रोजगार मेलों में भटकता है।
कभी-कभी लगता है कि छत्तीसगढ़ का युवा नौकरी नहीं, बल्कि अपनी सरकार से मिलने का समय मांग रहा है!
यह भी समझना होगा कि आत्मनिर्भरता का मतलब केवल केंद्र से अधिक धन प्राप्त करना या दूसरे राज्यों से निवेश बुलाना नहीं है। आत्मनिर्भरता का अर्थ है अपने संसाधनों का बेहतर उपयोग, स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा, कृषि आधारित अर्थव्यवस्था का विस्तार, शिक्षा और कौशल को रोजगार से जोड़ना तथा ऐसी नीतियां बनाना जिनका लाभ प्रदेश के आम नागरिक तक पहुंचे।
केंद्र से सहयोग लेना गलत नहीं है, निवेश लाना भी जरूरी है, लेकिन अपनी पूरी विकास यात्रा दूसरों के भरोसे छोड़ देना किसी भी युवा राज्य के लिए गौरव की बात नहीं हो सकती।
छत्तीसगढ़ को अब राजनीतिक संरक्षण की नहीं, दूरदर्शी नेतृत्व की जरूरत है। उसे ऐसी राजनीति चाहिए जो अगली पीढ़ी के लिए अवसर तैयार करे, न कि अगला चुनाव जीतने के लिए केवल घोषणाओं की फेहरिस्त तैयार करे।
26 साल का युवा अगर अब भी अपने पैरों पर खड़े होने के लिए किसी का इंतजार कर रहा है, तो यह केवल उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उन तमाम व्यवस्थाओं की विफलता है जिन्होंने उसे इस मुकाम तक पहुंचाने का दावा किया था।
छब्बीस बरस का हो गया मेरा छत्तीसगढ़। अब इसे सहारे की नहीं, अपने पैरों पर खड़े होने की जरूरत है।
क्योंकि राज्य की असली जवानी उसके स्थापना दिवस के समारोह, रोशनी और मंचों पर होने वाले भाषणों से नहीं मापी जाएगी। उसकी जवानी तब दिखाई देगी, जब यहां का युवा रोजगार के लिए पलायन करने के बजाय अपने प्रदेश में अवसर पैदा करेगा, किसान अपने श्रम से समृद्ध होगा और छत्तीसगढ़ अपने संसाधनों के बल पर देश की अर्थव्यवस्था में अपनी स्वतंत्र पहचान बनाएगा।
वरना हर साल स्थापना दिवस पर हम उम्र का एक और साल बढ़ाते रहेंगे और विकास की कहानी में वही पुराना सवाल दोहराते रहेंगे—
आखिर मेरा छत्तीसगढ़ अपने पैरों पर कब खड़ा होगा?