नरेन्द्र पाण्डेय : एक पुरानी कहावत है—“नकटी चाहे कि सबकी नाक कटे।”
लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी व्यक्तिगत पसंद, व्यवसाय या जीवनशैली को समाज के लिए समाधान मान लेना इतना आसान है?
पूनम पांडे का ताजा बयान इसी सवाल को सामने खड़ा करता है। उन्होंने कहा कि भारत में प्रोस्टिट्यूशन यानी वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता मिलनी चाहिए, क्योंकि इससे अपराध कम हो सकते हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने अपने बोल्ड और एडल्ट वीडियो को भी एक तरह की “सोशल सर्विस” बताते हुए कहा कि तनाव और फ्रस्ट्रेशन से जूझ रहे पुरुषों को उनके वीडियो राहत दे सकते हैं।
अब जरा ठहरकर सोचिए...
क्या किसी व्यक्ति को तनाव है, इसलिए उसके लिए यौन सामग्री उपलब्ध करा देना सामाजिक सेवा कहलाएगा? और क्या वेश्यावृत्ति को कानूनी बनाने से महिलाओं के खिलाफ अपराध स्वतः कम हो जाएंगे?
इन दोनों सवालों का जवाब इतना सीधा नहीं है।
पूनम पांडे के बयान में एक महत्वपूर्ण बात जरूर है—समाज में मानसिक तनाव, अकेलापन, यौन कुंठा और रिश्तों का संकट वास्तविक समस्याएं हैं। खासकर पुरुषों के मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बातचीत आज भी कम होती है।
लेकिन समस्या तब पैदा होती है, जब इन जटिल सामाजिक और मानसिक समस्याओं का समाधान केवल यौन संतुष्टि में खोजा जाने लगे।
क्योंकि तनाव का कारण अगर अकेलापन है, तो समाधान संबंधों में होना चाहिए। अगर समस्या मानसिक स्वास्थ्य की है, तो समाधान काउंसलिंग और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं में होना चाहिए।
अगर समस्या यौन शिक्षा की कमी है, तो समाधान वैज्ञानिक और जिम्मेदार सेक्स एजुकेशन में होना चाहिए। और अगर समस्या अपराध है, तो उसके कारणों की पड़ताल करनी होगी—सिर्फ सेक्स वर्क को कानूनी बना देने से अपराध समाप्त हो जाएंगे, यह मान लेना भी अतिसरलीकरण होगा। हाँ, यहां एक दूसरा पक्ष भी है।
वेश्यावृत्ति को कानूनी या विनियमित करने की बहस दुनिया के कई देशों में हुई है।
इस बहस का वास्तविक केंद्र यह होना चाहिए कि सेक्स वर्क में शामिल लोगों को हिंसा, शोषण, मानव तस्करी और जबरदस्ती से कैसे बचाया जाए।
किसी भी महिला या पुरुष को यदि अपनी इच्छा से कोई काम करना है, तो उसके अधिकार, सुरक्षा और गरिमा पर चर्चा होनी चाहिए।
लेकिन सहमति और शोषण के बीच की रेखा बहुत महत्वपूर्ण है।
क्योंकि जहां गरीबी, मजबूरी, मानव तस्करी और दबाव शामिल हो, वहां इसे सिर्फ “व्यवसाय” कहकर छोड़ देना भी उचित नहीं होगा।
और अब आते हैं पूनम पांडे के दूसरे तर्क पर—
“मेरे वीडियो पुरुषों का तनाव कम करते हैं, इसलिए यह सोशल सर्विस है।”
यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। किसी कंटेंट को देखने से किसी व्यक्ति को मनोरंजन या क्षणिक राहत मिल सकती है। यह व्यक्तिगत अनुभव है। लेकिन किसी निजी मनोरंजन को “सामाजिक सेवा” घोषित कर देना एक अलग बात है। क्योंकि सामाजिक सेवा का उद्देश्य व्यक्ति की कमजोरी या आवश्यकता को केवल उपभोग में बदलना नहीं, बल्कि उसके जीवन को बेहतर बनाने की कोशिश करना होता है।
अगर कोई व्यक्ति अकेला है तो उसे इंसानी संबंध चाहिए। अगर वह तनाव में है तो उसे मानसिक सहारा चाहिए। अगर वह अवसाद में है तो उसे चिकित्सा और काउंसलिंग की जरूरत हो सकती है। और अगर वह यौन निराशा से जूझ रहा है तो उसे स्वस्थ रिश्तों, जिम्मेदार यौन शिक्षा और भावनात्मक समझ की जरूरत है।
हर समस्या का समाधान शरीर से शुरू होकर शरीर पर खत्म नहीं होता।
दरअसल, पूनम पांडे का बयान सिर्फ पूनम पांडे की कहानी नहीं है। यह हमारे समय का आईना है। एक तरफ समाज सार्वजनिक रूप से नैतिकता की बातें करता है और दूसरी तरफ वही समाज निजी तौर पर उसी कंटेंट का उपभोक्ता बन जाता है। यही वह दोहरा चरित्र है, जिसकी ओर पूनम पांडे ने अपने बयान में इशारा किया है। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है—
किसी चीज की मांग होना, उसे सामाजिक रूप से उचित सिद्ध नहीं करता।
शराब की मांग है, जुए की मांग है, हिंसक मनोरंजन की मांग है—लेकिन किसी चीज की लोकप्रियता अपने आप में उसके सामाजिक प्रभाव का प्रमाण नहीं है।
इसलिए बहस पूनम पांडे के व्यक्तित्व पर नहीं होनी चाहिए। बहस इस बात पर होनी चाहिए कि—
क्या एडल्ट कंटेंट वास्तव में मानसिक तनाव का समाधान है?
क्या सेक्स वर्क को कानूनी मान्यता देने से अपराध कम होंगे?
क्या हमारे समाज में पुरुषों के मानसिक और यौन स्वास्थ्य पर पर्याप्त बातचीत होती है?
और सबसे बड़ा सवाल—
क्या हम इंसान की हर बेचैनी का समाधान बाजार में तलाशने लगे हैं?
क्योंकि अगर ऐसा है तो समस्या पूनम पांडे नहीं हैं।
समस्या वह समाज है जो कैमरे के सामने नैतिकता का मुखौटा पहनता है और कैमरे के पीछे अपनी ही इच्छाओं का उपभोक्ता बन जाता है।
इसलिए पूनम पांडे के बयान को सिर्फ सनसनी बनाकर छोड़ देना आसान है।
लेकिन असली पत्रकारिता वहां शुरू होती है, जहां हम बयान से आगे जाकर पूछते हैं—
आखिर वह कौन-सी सामाजिक बेचैनी है, जिसके कारण ऐसे बयान बार-बार हमारे सामने आ रहे हैं?