SCGNEWS : पोर्नोग्राफी कोई नई चीज नहीं है। पहले भी अश्लील फिल्में और सामग्री बनती थीं और लोग उन्हें देखते थे। फर्क सिर्फ इतना था कि उनकी पहुंच सीमित थी। आज मोबाइल, OTT प्लेटफॉर्म, Instagram Reels और शॉर्ट वीडियो ने ऐसी सामग्री को हर हाथ तक पहुंचा दिया है। अब सवाल केवल अश्लीलता की मौजूदगी का नहीं, बल्कि उसके व्यापक प्रसार और सामाजिक प्रभाव का है।
OTT के दौर में 'बोल्ड कंटेंट' के नाम पर अर्धनग्न दृश्य, यौन संकेत और विवाहेतर संबंधों को मनोरंजन का हिस्सा बनाया गया। कई वेब सीरीज में पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों की मर्यादाओं को तोड़ने वाले संबंधों को सनसनी और ग्लैमर के साथ प्रस्तुत किया गया। ससुर-बहू, देवर-भाभी जैसे संवेदनशील रिश्तों से लेकर नौकर-मालकिन, ड्राइवर-मालकिन और घरेलू कामगारों से जुड़े यौन संबंधों तक को कहानी का 'मसाला' बनाया गया।
समस्या यह नहीं कि किसी फिल्म या कहानी में समाज की विकृतियों को दिखाया गया। समस्या तब है जब ऐसी विकृतियों को केवल व्यूज, क्लिक और कमाई के लिए आकर्षक मनोरंजन बनाकर परोसा जाए।
स्क्रीन की दुनिया और वास्तविक जिंदगी
मनुष्य जिस चीज को बार-बार देखता है, उसके प्रति उसकी धारणा प्रभावित हो सकती है। हर व्यक्ति पर इसका असर समान हो, यह जरूरी नहीं, लेकिन लगातार यौन सामग्री देखने से रिश्तों, शरीर, प्रेम और सेक्स को लेकर सोच प्रभावित होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
सबसे बड़ी चिंता किशोरों को लेकर है। आज एक बच्चा मनोरंजन के लिए सोशल मीडिया खोलता है और कुछ ही मिनटों में उसे अर्धनग्न या यौन संकेतों वाली सामग्री दिखाई देने लगती है। किशोरावस्था में जब व्यक्ति अपने शरीर और रिश्तों को समझ रहा होता है, तब इंटरनेट की काल्पनिक दुनिया उसके लिए वास्तविकता का विकल्प बन सकती है।
यहीं परिवार और स्कूल की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। बच्चों को केवल मोबाइल से दूर रखने के बजाय उन्हें यह समझाना होगा कि इंटरनेट पर दिखाई जाने वाली हर चीज वास्तविक जीवन का प्रतिबिंब नहीं है।
क्या विवाहेतर संबंध आधुनिकता हैं?
मनोरंजन की दुनिया में विवाहेतर संबंधों को कई बार रोमांच, स्वतंत्रता और आधुनिकता से जोड़कर दिखाया जाता है। इसके विपरीत स्थायी रिश्ते, संयम और पारिवारिक जिम्मेदारी को पुरानी सोच की तरह प्रस्तुत किया जाता है।
लेकिन आधुनिकता का अर्थ रिश्तों की मर्यादा खत्म करना नहीं है। आधुनिकता का अर्थ है—स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी, रिश्तों में सम्मान और हर व्यक्ति की सहमति का महत्व।
वास्तविक जिंदगी किसी वेब सीरीज की पटकथा नहीं है। स्क्रीन पर संबंध कुछ मिनटों में शुरू और खत्म हो सकते हैं, लेकिन वास्तविक जीवन में विश्वास टूटने के परिणाम परिवार और बच्चों तक पहुंच सकते हैं।
क्या अश्लील सामग्री अपराध का कारण है?
यह कहना उचित नहीं होगा कि OTT या Instagram की अश्लील सामग्री ही बलात्कार या यौन अपराधों की सीधी वजह है। ऐसे अपराधों के पीछे हिंसा, सत्ता, लैंगिक असमानता, नशा, सामाजिक वातावरण, आपराधिक मानसिकता और कानून के प्रभावी क्रियान्वयन जैसे अनेक कारण होते हैं।
लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि डिजिटल कंटेंट के प्रभाव पर चर्चा बंद कर दी जाए।
यदि किसी सामग्री में महिलाओं को बार-बार केवल यौन वस्तु के रूप में दिखाया जाता है, सहमति को नजरअंदाज किया जाता है या जबरदस्ती को मनोरंजन बनाया जाता है, तो उसके संभावित सामाजिक प्रभावों पर गंभीर अध्ययन और बहस जरूरी है।
अपराध का कारण और अपराध को सामान्य बनाने वाली मानसिकता—दो अलग बातें हैं।
जिम्मेदारी किसकी?
सरकार को OTT और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए स्पष्ट और प्रभावी नियम बनाने चाहिए। प्लेटफॉर्म को मजबूत age restrictions, parental controls और content warnings लागू करने चाहिए।
महिला आयोग और सामाजिक संस्थाओं को भी महिलाओं की गरिमा और यौन हिंसा के महिमामंडन जैसे विषयों पर सार्वजनिक बहस को आगे बढ़ाना चाहिए।
लेकिन जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं है। माता-पिता को यह देखना होगा कि बच्चे क्या देख रहे हैं। स्कूलों में उम्र के अनुरूप वैज्ञानिक और जिम्मेदार यौन शिक्षा होनी चाहिए। युवाओं को समझाना होगा कि पोर्नोग्राफी वास्तविक रिश्तों का मॉडल नहीं है।
अंततः सवाल यह नहीं कि हम स्क्रीन पर क्या देख रहे हैं।
सवाल यह है कि जो हम बार-बार देख रहे हैं, वह धीरे-धीरे हमारी सोच को क्या बना रहा है?
मनोरंजन जरूरी है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी जरूरी है। लेकिन इनके नाम पर मानवीय गरिमा, सहमति, रिश्तों का सम्मान और सामाजिक जिम्मेदारी को पीछे नहीं छोड़ा जा सकता।
क्योंकि स्क्रीन पर दिखाई गई कहानी खत्म हो जाती है, लेकिन उसकी छवि और विचार हमारे मन में लंबे समय तक रह सकते हैं।