गौरेला-पेंड्रा-मरवाही।(मुकेश जायसवाल),सकोला : जिस स्कूल की बेटियां जिम्नास्टिक जैसे खेल में राष्ट्रीय स्तर पर विजेता बनकर क्षेत्र और स्कूल का नाम रोशन कर रही हैं, उसी कन्या शाला की हालत सरकारी व्यवस्था की संवेदनहीनता पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। हालत यह है कि स्कूल में पंखा लगवाने जैसी छोटी-सी जरूरत के लिए भी प्राचार्य को लोगों के सामने मदद मांगनी पड़ रही है।
सकोला कन्या शाला में कक्षा पहली से 12वीं तक छात्राएं अध्ययनरत हैं। स्कूल के प्राचार्य के अनुसार, पंखों की व्यवस्था के लिए स्थानीय लोगों से सहयोग लेना पड़ रहा है। बरसात में स्कूल के मैदान में पानी भर जाता है तो बच्चों के लिए मैदान को उपयोगी बनाने के लिए स्थानीय लोगों की मदद से मुरुम डलवानी पड़ती है। छात्राओं की निजता के लिए कन्या शौचालय के सामने पर्दे तक प्राचार्य को अपने स्तर पर लगवाने पड़े हैं।
अधिकारियों को बार-बार पत्र, फिर भी कोई सुनवाई नहीं
प्राचार्य के मुताबिक स्कूल की समस्याओं की जानकारी संबंधित विभागीय अधिकारियों को कई बार लिखित रूप में दी जा चुकी है, लेकिन इसके बावजूद स्कूल की मूलभूत जरूरतों को पूरा करने के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया।
सबसे गंभीर स्थिति स्कूल भवन की है। कमरों की कमी के कारण छात्राओं को बरामदे में बैठकर पढ़ाई करनी पड़ रही है। वहीं क्षतिग्रस्त कमरों में भी कक्षाएं संचालित होने की बात सामने आई है। ऐसे में छात्राओं की सुरक्षा को लेकर स्वाभाविक रूप से सवाल खड़े होते हैं।
मंत्रियों की सुरक्षा के लिए इंतजाम, बेटियों की सुरक्षा भगवान भरोसे?
स्कूल प्राचार्य का कहना है कि जब मंत्री या बड़े जनप्रतिनिधि स्कूल में आते हैं तो उनकी सुरक्षा के लिए पर्याप्त पुलिस और स्टाफ की व्यवस्था तत्काल कर दी जाती है। लेकिन जिन बेटियों के भविष्य की जिम्मेदारी इसी व्यवस्था पर है, उनकी सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं के लिए आखिर इतनी उदासीनता क्यों?
यह स्थिति महज स्कूल की अव्यवस्था नहीं, बल्कि बेटियों की शिक्षा और सुरक्षा को लेकर सरकारी प्राथमिकताओं पर बड़ा सवाल है। एक तरफ राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी तैयार करने वाले स्कूल की उपलब्धियों का गुणगान किया जाता है, दूसरी तरफ उसी स्कूल को पंखे, मुरुम, पर्दे और पर्याप्त कक्ष जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए लोगों से सहयोग लेना पड़ रहा है।
सवाल सीधे जिम्मेदार विभाग से
क्या राष्ट्रीय स्तर पर स्कूल का नाम रोशन करने वाली छात्राएं इतनी भी हकदार नहीं कि उन्हें सुरक्षित भवन, पर्याप्त कक्ष और जरूरी सुविधाएं मिल सकें?
क्या विभागीय अधिकारियों को लिखे गए पत्रों का जवाब केवल फाइलों में दबा रह जाएगा?
और आखिर कब तक सरकारी स्कूलों के प्राचार्य बच्चों की मूलभूत जरूरतें पूरी करने के लिए लोगों के सामने हाथ फैलाते रहेंगे?
अब देखना यह है कि बेटियों की इस बदहाली पर जिम्मेदार विभाग कब जागता है और कब तक स्कूल को आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं।
राजस्व अभिलेख के अनुसार सकोला स्थित खसरा नंबर 399/1 की 0.5470 हेक्टेयर भूमि शासकीय भूमि दर्ज है।