राष्ट्रीय सम्मान और खेल की मर्यादा


नरेन्द्र पाण्डेय : एशिया कप 2025 का फाइनल अब इतिहास बन चुका है। दुबई के स्टेडियम में भारत ने पाकिस्तान को पाँच विकेट से हराकर खिताब अपने नाम किया। मैदान पर भारतीय खिलाड़ियों के शानदार प्रदर्शन ने हर क्रिकेट प्रेमी को रोमांचित किया, लेकिन मैदान के बाहर जो नजारा उभरा, वह खेल की शुद्धता और अंतरराष्ट्रीय शिष्टाचार के बीच गहरी खाई को उजागर करता है।

भारतीय खिलाड़ियों ने मोहसिन नकवी से ट्रॉफी लेने से साफ इनकार कर दिया। नकवी, पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के प्रमुख और एशियन क्रिकेट काउंसिल के अध्यक्ष, लंबे समय से भारत के खिलाफ तनावपूर्ण रुख अपनाए हुए हैं। इस स्थिति में भारत का कदम न केवल राष्ट्रीय भावना का परिचायक है, बल्कि खेल और कूटनीति के बीच सूक्ष्म संतुलन का प्रतीक भी है।

मंच पर नकवी के ट्रॉफी और मेडल लेकर चले जाने का दृश्य बेहद असहज और अप्रत्याशित था। BCCI सचिव देवजीत सैकिया ने इसे “बचकाना और अनपेक्षित” बताया। सही भी कहा—खेल की मर्यादा यही होती है कि विजेता टीम अपने सम्मान के साथ पुरस्कार ग्रहण करे और पुरस्कार देने वाला व्यक्ति भी शिष्टाचार का पालन करे। जब वही व्यक्ति, जो हमारे देश के खिलाफ वर्षों से तनाव और युद्ध की आभा बनाए रखता है, ट्रॉफी और मेडल लेकर चला जाता है, तो खेल की आत्मा ठेस खाती है।

भारत-पाकिस्तान संबंध हमेशा से खेल और राजनीति के जटिल मिश्रण का प्रतीक रहे हैं। 1947 के विभाजन से लेकर आज तक, क्रिकेट केवल खेल नहीं, बल्कि राजनीतिक, सामाजिक और भावनात्मक प्रतीक रहा है। पिछले 12–15 वर्षों में भारत ने पाकिस्तान के साथ कोई द्विपक्षीय सीरीज नहीं खेली। ऐसे में एशिया कप जैसे बहुराष्ट्रीय टूर्नामेंट में हिस्सा लेना केवल खेल का निर्णय नहीं, बल्कि सरकार की नीति का पालन करना और अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की प्रतिष्ठा बनाए रखना भी था।

यदि भारत ने भाग नहीं लिया होता, तो न केवल खेल में बल्कि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में उसकी हिस्सेदारी पर भी प्रश्न उठ सकते थे। यह निर्णय, यकीनन, केवल मैदान पर नहीं, बल्कि राजनीतिक और कूटनीतिक समझदारी के आधार पर लिया गया। टीम इंडिया ने अपने प्रदर्शन के जरिए यह साबित कर दिया कि नीति और खेल का सामंजस्य संभव है.

टूर्नामेंट के हर चरण में टीम इंडिया ने दबदबा बनाया। ग्रुप स्टेज से लेकर सुपर-4 और फाइनल तक, भारतीय खिलाड़ियों ने तकनीकी कौशल, मानसिक दृढ़ता और रणनीतिक संतुलन का प्रदर्शन किया। पाकिस्तान को तीन बार हराना केवल आंकड़ों का मामला नहीं, बल्कि मानसिक मजबूत टीम की निशानी है।

फाइनल मुकाबले में तिलक वर्मा का नाबाद 69 रन और प्लेयर ऑफ द मैच बनना इस टीम की मानसिक तैयारी और धैर्य का परिचायक है। बॉलिंग में भी भारतीय खिलाड़ियों ने संयम और रणनीति का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया। इस प्रदर्शन ने दर्शकों को रोमांचित किया और मैदान पर हर पल भारत की जीत की छाप छोड़ दी।


फाइनल के बाद ट्रॉफी विवाद ने सभी का ध्यान खींचा। भारतीय खिलाड़ियों ने नकवी से ट्रॉफी लेने से साफ इंकार किया। यह केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय भावना का प्रतीक था। खेल के मैदान में आत्म-सम्मान और नीति का पालन करना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना रन और विकेट लेना।

BCCI का निर्णय—ICC मीटिंग में कड़ा विरोध दर्ज कराने का—एक स्पष्ट संदेश है। यह संदेश केवल खेल के सम्मान के लिए नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय गौरव, अंतरराष्ट्रीय शिष्टाचार और खेल की मर्यादा के लिए भी है। खेल और राजनीति को अलग रखना आसान नहीं होता, लेकिन आत्म-सम्मान और नीति के साथ कदम उठाना हर परिस्थिति में जरूरी है।


भारत के खिलाड़ियों ने मैदान पर जो दिखाया, वह केवल खेल का कौशल नहीं था। यह मानसिक तैयारी, अनुशासन और राष्ट्रीय भावना का मिश्रण था। मैदान में हर निर्णय, हर शॉट और हर रणनीति में यह स्पष्ट दिखाई दिया कि टीम न केवल जीत के लिए खेल रही थी, बल्कि देश की प्रतिष्ठा और नीति के पालन के लिए भी प्रतिबद्ध थी।

टूर्नामेंट में युवा खिलाड़ियों का आत्मविश्वास और अनुभवी खिलाड़ियों की मार्गदर्शन क्षमता ने टीम को संतुलित रखा। यह युवा ऊर्जा और अनुभव का सही मिश्रण था, जिसने भारत को जीत दिलाई।

भारत और पाकिस्तान के बीच खेल केवल प्रतिस्पर्धा का माध्यम नहीं, बल्कि कूटनीतिक संवाद का भी जरिया रहा है। इस विवाद ने यह स्पष्ट कर दिया कि खेल और राष्ट्रीय नीति के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण है। बहुराष्ट्रीय टूर्नामेंट में हिस्सा लेना भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा और नीति का हिस्सा है। टीम इंडिया ने इस जिम्मेदारी को समझते हुए मैदान पर अपनी पूरी क्षमता दिखाई।


असली जीत केवल ट्रॉफी नहीं है। असली जीत है—देश का आत्म-सम्मान, खेल की शुद्धता और टीम की निष्ठा। एशिया कप 2025 का फाइनल केवल एक खेल आयोजन नहीं रहा, बल्कि एक ऐसा क्षण बन गया, जिसने भारत के खेल और राष्ट्रीय दृष्टिकोण की वास्तविक शक्ति को उजागर किया।

यह घटना युवा खिलाड़ियों, नीति निर्माताओं और दर्शकों के लिए सीख है। यह सिखाती है कि खेल में केवल रन और विकेट का महत्व नहीं, बल्कि नीति, सम्मान और राष्ट्रीय भावना का भी उतना ही महत्व है। टीम इंडिया ने यह साबित कर दिया कि खेल में सफलता केवल तकनीकी कौशल से नहीं आती, बल्कि आत्म-सम्मान, मानसिक दृढ़ता और राष्ट्रीय नीति के पालन से भी आती है।

इस ट्रॉफी विवाद ने हमें याद दिलाया कि खेल का असली मूल्य केवल जीत-हार तक सीमित नहीं है। यह राष्ट्रीय गौरव, खेल की मर्यादा और नीति का सम्मान भी है। भारत की टीम ने यह संदेश मजबूती से दिया—जहाँ नीति, आत्म-सम्मान और खेल का मेल होता है, वहाँ असली जीत हमेशा भारत के साथ होती है।


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