राष्ट्रभक्ति या टीआरपी का खेल


 09 मई 2025 :"देखिए, जब देश को सही जानकारी और शांति की जरूरत होती है, तब मीडिया 'ब्रेकिंग न्यूज' के नाम पर एक भावनात्मक तमाशा बना देता है। ऑपरेशन सिंदूर जैसे सैन्य अभियानों को जब टीवी पर इस तरह से दिखाया जाता है, जैसे कोई रियलिटी शो हो, तो इसका क्या असर पड़ता है? मीडिया को यह समझना चाहिए कि सेना के ऑपरेशन की रिपोर्टिंग में संयम की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, लेकिन क्या हो रहा है? 'हमने मारा', 'हमने बदला लिया' – यह सब कुछ टीआरपी के खेल का हिस्सा बन गया है। क्या कोई चैनल यह सवाल पूछता है कि इसका अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति पर क्या असर होगा? नहीं। सब बस एक ही सवाल पूछते हैं: 'आप पाकिस्तान के साथ हैं या भारत के साथ?'

क्या यही पत्रकारिता है? जब आतंकवादियों ने पहलगाम में हमला किया, और हमारे जवान शहीद हो गए, तो यह खबर क्यों बुलेटिन में आखिरी पंक्ति पर आई? क्योंकि वह सत्ता के नेरेटिव को तोड़ता था! मीडिया अब देश के लिए नहीं, बल्कि अपनी टीआरपी और कॉर्पोरेट गठजोड़ के लिए काम कर रहा है। क्या यही लोकतंत्र है? मीडिया को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।"

आज के भारतीय मीडिया पर यदि गौर करें, तो यह स्थिति एक विसंगति जैसी प्रतीत होती है, जहाँ पत्रकारिता के मूल उद्देश्य से दूर होकर, मीडिया संस्थान केवल टीआरपी और सत्ता के हितों के लिए काम कर रहे हैं। भारतीय टीवी चैनल्स का यह बदलता चेहरा एक युद्ध-थीम वाले रियलिटी शो जैसा लगने लगता है। इस शोर-शराबे में जहां संवाद की जगह केवल शोर है, वहीं विश्लेषण और तथ्यात्मक जानकारी के स्थान पर आरोप-प्रत्यारोप और उत्तेजना का ज्वार उठता है। जब देश को सही जानकारी और शांत दिमाग की सबसे ज्यादा आवश्यकता होती है, तब मीडिया इसे एक भावनात्मक तमाशा बना देता है, जो न सिर्फ राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालता है, बल्कि कूटनीतिक स्तर पर भी भारत को कमजोर करता है।

ऑपरेशन सिंदूर’ जैसे सैन्य अभियानों की रिपोर्टिंग में संयम की आवश्यकता होती है, क्योंकि इन ऑपरेशनों से जुड़ी जानकारी का सार्वजनिक होना न केवल ऑपरेशनल सिक्योरिटी के लिए खतरे का कारण बन सकता है, बल्कि इससे कूटनीतिक स्थिति पर भी असर पड़ता है। मगर भारतीय मीडिया के कुछ चैनल्स ने इस मुद्दे को टीआरपी के खेल में तब्दील कर दिया। 'वार रूम' से लाइव स्टूडियो में जब चैनल्स "हमले की एक्सक्लूसिव फुटेज" दिखाते हैं, तो वे न केवल सैन्य ऑपरेशन की गोपनीयता को खतरे में डालते हैं, बल्कि इसके माध्यम से शत्रु राष्ट्र को भी महत्वपूर्ण जानकारी दे देते हैं।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद मीडिया में एक विशेष तरह का उत्साह था, और चैनल्स इसे "नई सर्जिकल स्ट्राइक", "बॉर्डर के पार सिंदूर की रक्षा" जैसे स्लोगनों में बदलकर पेश कर रहे थे। लेकिन क्या मीडिया ने इस ऑपरेशन के पीछे के रणनीतिक मकसद और राजनीतिक समयबद्धता पर विचार किया? क्या यह सवाल उठाया गया कि ऑपरेशन से भारत की कूटनीतिक स्थिति पर क्या असर पड़ेगा? इसका उत्तर नकारात्मक था। मीडिया ने इस ऑपरेशन को केवल एक राष्ट्रप्रेम के उत्साह में डुबोकर पेश किया, और TRP के इस खेल में सत्ता ने केवल इसका फायदा उठाया।

22 अप्रैल 2025 को जब आतंकवादियों ने पहलगाम में सेना की गाड़ी को निशाना बनाया और छह जवान शहीद हो गए, तो यह खबर मीडिया बुलेटिन में बहुत पीछे चली गई। इस घटना को यह कारण नहीं था कि इसमें कोई बड़ा चेहरा मारा गया, बल्कि यह मुख्य रूप से इसलिए था क्योंकि यह घटना ऑपरेशन सिंदूर के ठीक बाद हुई थी और यह सत्ता के उस नेरेटिव को तोड़ सकती थी, जिसमें कहा जा रहा था कि "अब पाकिस्तान डर गया है"।

मीडिया ने इस घटना को नजरअंदाज कर दिया, और नतीजा यह हुआ कि शहीदों के घरों में मातम था, जबकि टीवी स्क्रीन पर 'द ग्रेट इंडियन डिबेट' का तमाशा चल रहा था। यह दिखाता है कि मीडिया का ध्यान अब सिर्फ एक ही बात पर था – सत्ता के प्रचार के साथ खुद को जोड़ना, और जनता को राष्ट्रप्रेम की भावना से उकसाना। इस तरह के अनदेखे हमलों पर ध्यान नहीं देना, मीडिया की नकारात्मक भूमिका को उजागर करता है।

मीडिया की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह खबरों को सनसनीखेज तरीके से प्रस्तुत करता है, जिससे टीआरपी में तो बढ़ोतरी होती है, लेकिन इसके दुष्परिणाम भी होते हैं। ऑपरेशन सिंदूर जैसे सैन्य अभियानों पर जब मीडिया उन्मादी तरीके से रिपोर्ट करता है, तो यह न केवल जनता में भय और घबराहट फैलाता है, बल्कि कूटनीतिक स्तर पर भी तनाव पैदा करता है।

मीडिया ने अफवाहों और आधिकारिक पुष्टि से पहले रिपोर्ट्स प्रसारित की, जिससे गलत जानकारी फैलने का खतरा पैदा हुआ। उदाहरण के लिए, पाकिस्तान द्वारा यह दावा किया गया कि उसने भारतीय विमानों को मार गिराया, लेकिन भारतीय मीडिया ने इसे एक बड़े राष्ट्रीय संकट के रूप में प्रस्तुत किया, जब तक इसकी पुष्टि नहीं हो गई थी। इस तरह की रिपोर्टिंग से सवाल उठता है कि क्या मीडिया इस तरह के संवेदनशील मामलों में अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है?

एक समय था जब भारत के पत्रकारिता क्षेत्र में सम्मान और प्रतिबद्धता का वजूद था, लेकिन अब उसे बदला गया है डिजिटल एक्टिविज़्म के नाम पर। जो पत्रकारिता कभी तथ्यों, प्रमाणों और निष्पक्षता पर आधारित थी, वह अब "सरकार गिराओ", "समाज तोड़ो", और "सनसनी बेचो" के एजेंडों में समाहित हो गई है। यही हाल है उन पत्रकारों का जो हर दिन अपने चैनल पर "खुलासा" करने का दावा करते हैं, लेकिन तथ्य ढूंढने से कहीं अधिक उनके वीडियोज में बयानों और विचारों का खुलासा होता है।

पुण्य प्रसून बाजपेयी और रविश कुमार जैसे पत्रकार, जो कभी पारंपरिक मीडिया में अपनी पहचान बना चुके थे, अब यूट्यूब के मंच पर स्वयं को "खुलासा गुरु" और "सत्ता विरोधी राम" के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। बाजपेयी साहब हर वीडियो में "खुलासा" करते हैं, लेकिन उन तथ्यों का न कोई सिर मिलता है, न पैर। वहीं रविश कुमार के वीडियो एक महाकाव्य की तरह होते हैं, जहाँ सत्ता राक्षस के रूप में प्रस्तुत होती है और वह स्वयं तथ्य के राम। लेकिन सवाल यह है – क्या यही पत्रकारिता है? क्या यह एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और सच्ची जानकारी का प्रचार है या यह राष्ट्रविरोधी विमर्श का व्यापार?

22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले ने न केवल निर्दोष लोगों की जान ली, बल्कि भारत के डिजिटल आत्मविश्वास को भी चोटिल किया। आतंकवादियों ने गोलियाँ चलाईं, लेकिन डिजिटल मीडिया पर उनकी गूंज सुनाई दी – भड़काऊ शीर्षक, अधूरी सच्चाइयाँ और विचारधारा-प्रेरित स्क्रिप्ट्स में। यही वह समय था जब सरकार को वही करना पड़ा, जो राष्ट्र की संप्रभुता की रक्षा के लिए किया जाना चाहिए था – कार्रवाई। यह कार्रवाई किसी विचार की हत्या नहीं थी, बल्कि उन विचारों की हत्या थी जो समाज को खंडित कर रहे थे और उस एजेंडे को बढ़ावा दे रहे थे जो राष्ट्रविरोधी था। इसी संदर्भ में "The Wire" और "4PM News" जैसे डिजिटल मंचों पर हुई कार्रवाई को अगर कोई विचाराधीन समझता है, तो यह उसका घातक भ्रम है। इन मंचों ने हर राष्ट्रीय संकट को "सरकारी साजिश" साबित करने का प्रयास किया, बिना किसी ठोस प्रमाण के, केवल भ्रम और अफवाहों के माध्यम से। जब पत्रकारिता इन सबका हिस्सा बन जाए, तब यह पत्रकारिता नहीं, बल्कि सूचना के आतंकवाद का रूप ले लेती है। क्या ऐसी पत्रकारिता है, जो बिना तथ्य के किसी आतंकी घटना के बाद सरकार को कटघरे में खड़ा कर दे और पाकिस्तान के पक्ष में आवाज उठाए?

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता है – विचारों की, दृष्टिकोणों की और असहमति की। लेकिन जब मीडिया एक ही आवाज को बढ़ावा देता है, तो यह लोकतंत्र का उल्लंघन है। मीडिया अब केवल दर्शक संख्या के बारे में सोचता है और यह तय करता है कि दर्शकों को क्या दिखाना चाहिए, और यह निर्णय सिर्फ कॉर्पोरेट और सत्ता के गठजोड़ द्वारा किया जाता है।

भारत-पाकिस्तान के बढ़ते तनाव के दौरान मीडिया की अतिशयोक्तिपूर्ण रिपोर्टिंग पर सरकार के निर्देश और मीडिया द्वारा माफी मांगने की घटनाएं यह दर्शाती हैं कि मीडिया की रिपोर्टिंग में संतुलन बनाए रखना न केवल पत्रकारिता की जिम्मेदारी है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा और कूटनीतिक संबंधों को प्रभावित करने वाले फैसलों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

आज के मीडिया का यह रूप लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है। जब मीडिया अपनी भूमिका को समझे बिना केवल टीआरपी और सत्ता के फायदे के लिए काम करता है, तो वह समाज के वास्तविक हितों को नजरअंदाज कर देता है। मीडिया को चाहिए कि वह अपनी जिम्मेदारी समझे, विशेषकर ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर रिपोर्ट करते समय, ताकि किसी भी प्रकार का विवाद या गलतफहमी उत्पन्न न हो। मीडिया का मुख्य उद्देश्य जनहित होना चाहिए, न कि सत्ता और कॉर्पोरेट के हितों की पूर्ति।

सरकार द्वारा उठाए गए कदमों को यदि 'सेंसरशिप' कहा जाए तो यह एक भ्रामक विचार है। यह कोई सेंसरशिप नहीं थी, यह एक राष्ट्र की रक्षा थी। IT एक्ट 2000 की धारा 69A के तहत उठाए गए कदम सिर्फ तकनीकी कार्रवाई नहीं थे, बल्कि यह राष्ट्रीय नैतिकता का उद्घोष था कि अब पत्रकारिता के नाम पर देश को तोड़ने की अनुमति नहीं दी जाएगी। जब कोई पत्रकार अपनी स्क्रिप्ट को एजेंडे के अनुसार तैयार करता है, जब वह हर वीडियो में 'सनसनी' का पर्दा डालता है, तो वह न केवल सच्चाई से धोखा करता है, बल्कि उस लोकतंत्र को भी खतरे में डालता है, जिसे पत्रकारिता की शक्ति से संरक्षण मिलना चाहिए। अब यह सवाल उठता है – क्या पत्रकारिता का मतलब केवल सरकार की आलोचना करना है? क्या यह पत्रकारिता का उद्देश्य है कि सच्चाई को बेचकर दर्शकों की संख्या बढ़ाई जाए? क्या पत्रकारिता का काम राष्ट्रविरोध का प्रचार करना है? अगर हम इन सवालों का सही ढंग से उत्तर नहीं देंगे तो हम लोकतंत्र को उस दिशा में ले जाएंगे जहाँ नागरिकों को सिर्फ भ्रम, नफरत और विभाजन का शिकार बनाया जाएगा। हमें यह तय करना होगा – क्या हम उस यूट्यूब रिवोल्यूशन का हिस्सा बनेंगे जो हमारी अस्मिता को निगल रहा है, या हम एक ऐसा मीडिया बनाएंगे जो देश की एकता और अखंडता के प्रति निष्ठावान हो।

 

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Category News