हर साल रावण जलता है, उसका पुतला और ऊँचा होता है, लेकिन क्या समाज से बुराई भी कम होती है? दशहरे के मेले, बदलती सामाजिक परंपराएँ और राजनीति के प्रतीकात्मक भाषणों पर एक तीखा व्यंग्य। सवाल किसी एक नेता का नहीं, उस राजनीतिक संस्कृति का है जहाँ रावण दहन तो होता है, लेकिन जवाबदेही की परीक्षा बाकी रह जाती है।
देखिए और सोचिए—रावण जल रहा है या सिर्फ उसका पुतला?