रायगढ़ में गौवंशों की ‘अंतरिम व्यवस्था’ पर बड़ा सवाल!: ड़क से गायें उठाईं, पालीघाट रोड पर छोड़ा; निगम और ट्रैफिक के बयानों में उलझी जिम्मेदारी


रवि कुमार अग्रवाल...(रायगढ़)। शहर की सड़कों पर घूम रहे आवारा गौवंशों को हटाने के नाम पर पिछले दो दिनों से चल रही कार्रवाई अब कई गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। 21 और 22 अगस्त को नगर पालिक निगम रायगढ़ एवं ट्रैफिक विभाग की मौजूदगी में शहर की सड़कों से गायों और अन्य पशुओं को उठाकर इंदिरा विहार बैरियर के आगे पालीघाट रोड की ओर छोड़ने की बात सामने आई है।

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि सड़क से हटाए गए गौवंशों के सुरक्षित एवं स्थायी व्यवस्थापन की जिम्मेदारी आखिर किसकी थी? क्या उन्हें किसी गोशाला, गौठान या निर्धारित पशु आश्रय स्थल में नहीं रखा जा सकता था? और यदि ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी, तो बिना पूर्व व्यवस्था के पशुओं को शहर से बाहर सड़क क्षेत्र में छोड़ना किस नियम और किस आदेश के तहत किया गया?

मामले की पड़ताल में संबंधित कर्मचारियों और अधिकारियों से हुई बातचीत में कार्रवाई को लेकर अलग-अलग स्तर से अलग-अलग जवाब सामने आए हैं।

ट्रैफिक आरक्षक का बयान—“नगर निगम वाले गाय उठा रहे हैं, उनके साथ चले जाना”

ट्रैफिक विभाग के आरक्षक संतोष इक्का के अनुसार, शहर में घूम रही करीब पांच गायों को नगर निगम के 4-5 स्वीपरों द्वारा ट्रैक्टर में लादकर इंदिरा विहार बैरियर के पास सड़क पर छोड़ दिया गया।

संतोष इक्का ने बताया कि उन्हें ट्रैफिक थाना से मददगार आरक्षक बलवन राठिया ने फोन कर कहा था कि नगर निगम वाले गाय उठा रहे हैं, उनके साथ चले जाना। इसके बाद वे निगम की टीम के साथ गए।

वहीं मददगार आरक्षक बलवन राठिया का कहना है कि उन्हें अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक पुष्पेंद्र सिंह बघेल की ओर से नगर निगम के साथ जाकर पशुओं को कहीं छोड़वाने के लिए कहा गया था।

निगम के सहायक स्वास्थ्य अधिकारी बोले—“निगम सिर्फ गाड़ी और लेबर का सहयोग कर रहा था”

नगर पालिक निगम रायगढ़ के सहायक स्वास्थ्य अधिकारी रमेश तांती ने बताया कि पिछले दिन भी और 22 अगस्त को भी निगम के ट्रैक्टर से करीब पांच गायों को उठाकर इंदिरा विहार रोड स्थित पालीघाट मार्ग की ओर छोड़ा गया।

हालांकि उन्होंने कार्रवाई में निगम की भूमिका को सहयोग तक सीमित बताया। उनके अनुसार, पशुओं को कहां उठाना और कहां छोड़ना है, यह यातायात विभाग की निगरानी में हो रहा था तथा निगम की ओर से वाहन और लेबर का सहयोग दिया जा रहा था।

उन्होंने यह भी बताया कि ट्रैफिक विभाग की ओर से ASP पुष्पेंद्र सिंह बघेल ने वाहन की मांग की थी और निगम की टीम उनके साथ कार्य कर रही थी।

सुपरवाइजर का दावा—“मेरा काम सिर्फ फोटो खींचना था”

नगर निगम के सुपरवाइजर ज्ञानू उर्फ संजय कुमार मोदी के बयान से भी मामला और पेचीदा होता नजर आता है।

उनके अनुसार, पहले दिन कोतरारोड थाना क्षेत्र से गायों को उठाने का कार्य शुरू हुआ और टीम रामभाठा होते हुए पुलिस लाइन के पास रामपुर तक गई। दूसरे दिन भी दो-तीन गायें उठाई गईं।

संजय मोदी ने बताया कि उन्हें निगम के सफाई दरोगा लल्ले तिवारी ने टीम के साथ रहकर यह देखने और फोटो खींचने के लिए कहा था कि कहां-कहां से गायें पकड़ी गईं। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें रमेश तांती ने ट्रैफिक वालों से संपर्क कर उनके साथ रहने को कहा था।

सुपरवाइजर के मुताबिक, “गायों को तो नगर निगम ही उठा रही है, नगर निगम की ही कार्रवाई होगी।”

लेकिन इसी बयान के साथ सवाल उठता है कि यदि कार्रवाई नगर निगम की थी, तो ट्रैफिक विभाग के कर्मचारियों की भूमिका क्या थी और पशुओं को छोड़ने का अंतिम निर्णय किस स्तर पर लिया गया?

सफाई दरोगा ने कहा—“लिखित आदेश किसी को नहीं मिला”

नगर निगम के सफाई दरोगा लल्ले तिवारी ने भी पुष्टि की कि 21 और 22 अगस्त को शहर में गायों एवं पशुओं को उठाकर अन्यत्र स्थान पर छोड़ा जा रहा था और इस दौरान ट्रैफिक पुलिस के कर्मचारी भी मौजूद थे।


उन्होंने बताया कि सुपरवाइजर संजय मोदी नगर निगम के कर्मचारी हैं और संभवतः अधिकारियों के निर्देश पर ड्यूटी कर रहे थे। लेकिन उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात कही—उन्हें या संबंधित कर्मचारियों को इस संबंध में कोई लिखित आदेश प्राप्त नहीं हुआ था।


लल्ले तिवारी के अनुसार, आदेश ऊपर के अधिकारियों की ओर से आया होगा और इस संबंध में विस्तृत जानकारी निगम आयुक्त या सहायक स्वास्थ्य अधिकारी से लेना बेहतर होगा।


ASP पुष्पेंद्र सिंह बघेल का पक्ष—“यह अस्थायी व्यवस्था है”


पूरे मामले में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक पुष्पेंद्र सिंह बघेल ने ट्रैफिक विभाग का पक्ष रखते हुए कहा कि शहर की सड़कों पर घूम रहे छोटे-बड़े और बच्चे समेत सभी गौवंशों को हटाने की कार्रवाई इसलिए की जा रही है क्योंकि इनके कारण सड़क दुर्घटनाओं की स्थिति बन रही है।

उनके अनुसार, इंदिरा विहार मार्ग से पालीघाट रोड, ओडिशा बॉर्डर की ओर पशुओं को इसलिए छोड़ा जा रहा है ताकि तात्कालिक रूप से उन्हें सड़क से हटाया जा सके और दुर्घटनाओं को कम किया जा सके।


ASP बघेल ने इसे “टेम्परेरी व्यवस्था” बताते हुए कहा कि दीर्घकालीन व्यवस्था क्या होगी, यह नगर निगम को बताना है।


उनका कहना था कि ट्रैफिक विभाग ने नगर निगम से अनुरोध किया था कि सड़क पर घूम रहे जानवरों को तत्काल एवं अंतरिम रूप से कहीं व्यवस्थापित कराया जाए। उनके अनुसार, ट्रैफिक विभाग का मुख्य उद्देश्य यह है कि गायें सड़क पर न रहें और दुर्घटनाएं कम हों।


लेकिन जब यह सवाल किया गया कि आखिर पशुओं को कहां छोड़ा जाना है, तो उनका जवाब था कि यह तय करना नगर निगम का विषय है; ट्रैफिक विभाग यह नहीं बताएगा कि गायों को कहां स्थापित करना है।


ASP के अनुसार निगम को यह बात मौखिक रूप से कही गई थी, लिखित आदेश नहीं दिया गया था।


अब सबसे बड़ा सवाल—‘व्यवस्था’ किसकी?


इस पूरे मामले में दोनों विभागों के बयानों को साथ रखकर देखें तो एक दिलचस्प स्थिति सामने आती है।


ट्रैफिक विभाग का कहना है—हमने निगम से पशुओं को सड़क से हटाकर अंतरिम व्यवस्था करने का अनुरोध किया।


निगम की ओर से कहा जा रहा है—हम वाहन और लेबर उपलब्ध करा रहे थे, पशुओं को कहां ले जाना और कहां छोड़ना है, यह ट्रैफिक की निगरानी में हो रहा था।


वहीं निगम के कर्मचारी कहते हैं कि उन्हें कोई लिखित आदेश नहीं मिला था।


तो फिर सवाल यह है कि—


आखिर पालीघाट रोड पर गौवंशों को छोड़ने का निर्णय किसने लिया?


क्या नगर निगम के पास पशुओं के लिए कोई निर्धारित गोशाला, गौठान या आश्रय स्थल नहीं है?


यदि व्यवस्था उपलब्ध है तो सड़क पर गौवंशों को छोड़ने की जरूरत क्यों पड़ी?


यदि व्यवस्था उपलब्ध नहीं है तो क्या नगर निगम और ट्रैफिक विभाग को संयुक्त कार्रवाई शुरू करने से पहले वैकल्पिक व्यवस्था नहीं करनी चाहिए थी?

और सबसे महत्वपूर्ण—क्या केवल मौखिक निर्देश के आधार पर शहर के पशुओं को पकड़कर दूसरे सड़क क्षेत्र में छोड़ देना उचित व्यवस्थापन माना जा सकता है?


तस्वीरें भी उठा रहीं हैं कई सवाल


मामले से संबंधित तस्वीरों में गौवंशों को लोहे की जालीदार ट्रैक्टर-ट्रॉली में ले जाते हुए देखा जा सकता है। तस्वीरों में निगम के वाहन, ट्रैक्टर और मौके पर मौजूद लोगों की गतिविधियां भी दिखाई देती हैं।


एक तस्वीर में वाहन के पीछे का हिस्सा खोलकर गौवंशों को उतारने की स्थिति नजर आती है, जबकि अन्य तस्वीरों में पशुओं को वाहन में ले जाते हुए देखा जा सकता है।


इन तस्वीरों और अधिकारियों-कर्मचारियों के बयानों के बाद अब यह मामला सिर्फ “सड़क से गाय हटाने” की कार्रवाई तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि गौवंशों के सुरक्षित व्यवस्थापन, विभागीय जिम्मेदारी और आदेश की प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े कर रहा है।


सड़क सुरक्षा जरूरी, लेकिन क्या समाधान भी जरूरी नहीं?


इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि सड़कों पर घूमते पशुओं के कारण दुर्घटनाओं का खतरा रहता है और यातायात विभाग का उन्हें सड़क से हटाने का प्रयास सड़क सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकता है।


लेकिन सवाल यह है कि सड़क से हटाने के बाद उनका सुरक्षित ठिकाना कौन सुनिश्चित करेगा?


यदि एक सड़क से पशु हटाकर उन्हें किसी दूसरे सड़क क्षेत्र में छोड़ दिया जाता है, तो क्या इससे समस्या का स्थायी समाधान होता है या केवल स्थान बदल जाता है?

रायगढ़ शहर की जनता अब नगर निगम और ट्रैफिक विभाग से यही जानना चाहती है कि 21 और 22 अगस्त को कितने पशु पकड़े गए, उन्हें कहां-कहां से उठाया गया, किस अधिकारी के निर्देश पर कार्रवाई हुई, उन्हें पालीघाट रोड पर किसके आदेश से छोड़ा गया और आगे उनके लिए क्या स्थायी व्यवस्था की जाएगी।


क्योंकि “टेम्परेरी व्यवस्था” के नाम पर गौवंशों को सड़क से हटाना तो संभव है, लेकिन उनकी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना क्या उचित है?


अब देखना यह है कि नगर पालिक निगम रायगढ़ इस पूरे मामले में अपनी स्पष्ट जिम्मेदारी तय करता है या फिर जिम्मेदारी निगम और ट्रैफिक विभाग के बीच इसी तरह घूमती रहेगी।


SCG News की पड़ताल में सामने आए बयानों के आधार पर संबंधित विभागों का पक्ष प्रमुखता से प्रकाशित किया जा रहा है। यदि किसी विभाग या अधिकारी को इस कार्रवाई, पशुओं के व्यवस्थापन अथवा आदेश की प्रक्रिया के संबंध में अतिरिक्त तथ्य/दस्तावेज प्रस्तुत करने हैं, तो उन्हें भी खबर में स्थान दिया जाएगा।

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