व्यंग्य : लोकतंत्र बड़ा उदार जीव है। इसमें मंत्री भी पैदा होते हैं और घोंचू भी। फर्क बस इतना है कि मंत्री बनने के बाद घोंचू शब्द अचानक अपराध की श्रेणी में प्रवेश कर जाता है। वरना बचपन में यही घोंचू लड्डू खाता था, नाक बहाता था और प्यार से पुकारा जाता था। लोकतंत्र में शब्दों का भी जाति प्रमाणपत्र बनता है—किसके मुंह से निकला और किसके लिए निकला।
इन दिनों छत्तीसगढ़ की एक आदिवासी लड़की ने बस इतना ही किया कि शब्दकोश को सड़क पर ले आई। उसने कोई पत्थर नहीं उठाया, कोई कुर्सी नहीं तोड़ी, बस एक शब्द हवा में उछाल दिया—घोंचू। शब्द हवा में उड़ता रहा, लेकिन एफआईआर ज़मीन पर गिर गई। लोकतंत्र में गुरुत्वाकर्षण उल्टा चलता है—शब्द भारी होते हैं, काम हल्के।
मंत्री जी की प्रतिष्ठा इतनी नाज़ुक निकली कि एक घोंचू से धूमिल हो गई। सोचिए, अगर काम से चमकती तो? लेकिन काम की चमक दूर की चीज़ है, यहाँ तो भाषा का आईना ही तोड़ा जा रहा है। कामचोर कहना गाली नहीं, यह तो नौकरी का विवरण है। फिर भी शब्दों की तलाशी ली जा रही है—कहीं ‘भोला’ में भी धार तो नहीं, ‘मासूम’ में भी मंसूबा तो नहीं।
उस आदिवासी लड़की की गलती यही है कि उसने लोकतंत्र को भरोसा दिलाने की कोशिश की। बोली—ऐसे नेता पालोगे तो पार्टी डूबेगी। यह चेतावनी थी, देशद्रोह नहीं। दोस्ती की थपकी थी, तख़्तापलट नहीं। पर लोकतंत्र को आजकल थपकी से भी एलर्जी है; उसे सिर्फ़ ताली चाहिए—बिना सवाल की, बिना शब्दकोश की।
कुर्सी का पावर दिमाग़ में चढ़े—यह आरोप नहीं, अनुभव है। कुर्सी लोकतंत्र की सबसे महंगी नशा है। इसमें बैठते ही आदमी संविधान को तकिया बना लेता है और जनता को फ्यूज़ बल्ब। महीने में पाँच किलो अनाज से रोशनी जलाए रखी जाती है; सवाल करने की ज़रूरत नहीं।
उस आदिवासी लड़की ने घोंचू शब्द को सम्मान दिया। कचरे के डिब्बे से उठाकर बहस की मेज़ पर रखा। अब शब्द भी पूछ रहे हैं—क्या हम सिर्फ़ संसद के लिए हैं? क्या जनता के मुंह में हमारी कोई जगह नहीं? अगर घोंचू असंसदीय है, तो असंवेदनशील क्या है—शब्द या काम?
लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि यहाँ एक आदिवासी लड़की की आकांक्षा भी अपराध बन सकती है। लेकिन यही लोकतंत्र की मजबूरी भी है कि आकांक्षा को चुप कराया जाए, वरना शब्द चलने लगेंगे। और शब्द चल पड़े तो कुर्सियाँ हिलती हैं।
इसलिए घोंचू को पकड़ो, शब्दकोश को डाँटो, और काम को—कल देखेंगे।