नरेन्द्र पाण्डेय : भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यह मानी जाती है कि यहां संविधान सर्वोपरि है और सभी राज्यों के लिए एक समान संवैधानिक व्यवस्था लागू होती है। लेकिन समय-समय पर कुछ घटनाएं यह सवाल खड़ा कर देती हैं कि क्या वास्तव में संवैधानिक पदों पर बैठे लोग एक जैसी कसौटी अपनाते हैं, या फिर राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार नियमों की व्याख्या बदल जाती है।
तमिलनाडु की राजनीति में हाल ही में अभिनेता से नेता बने विजय और उनकी पार्टी TVK को लेकर जो घटनाक्रम सामने आया, उसने इसी बहस को फिर जीवित कर दिया है। खबरों के अनुसार राज्यपाल ने विजय को दूसरी बार यह कहते हुए लौटाया कि पहले 118 विधायकों का समर्थन पत्र लेकर आइए। सवाल यह है कि जब सरकार गठन के लिए इतनी कठोर संवैधानिक शर्तें तमिलनाडु में लागू की जा रही हैं, तो फिर महाराष्ट्र में वही संवैधानिक मर्यादा क्यों दिखाई नहीं दी?
देश अभी भी उस राजनीतिक घटनाक्रम को भूला नहीं है जब महाराष्ट्र में रातोंरात सत्ता परिवर्तन हुआ और तड़के लगभग 12 बजे के बाद मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी गई। उस समय न तो लंबी संवैधानिक बहस दिखाई दी, न ही समर्थन पत्रों की सार्वजनिक पड़ताल। जिस तेजी से पूरी प्रक्रिया हुई, उसने लोकतंत्र की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न खड़े किए थे।
अब यदि तमिलनाडु में राज्यपाल यह कहते हैं कि पहले 118 विधायकों की सूची प्रस्तुत की जाए, तभी आगे बात होगी, तो यह मांग अपने आप में गलत नहीं कही जा सकती। बहुमत सिद्ध करना लोकतंत्र की मूल शर्त है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग पैमाने अपनाए जाते हैं।
क्या संविधान राज्यों के हिसाब से बदल जाता है?
क्या किसी राज्य में राजनीतिक सुविधा के आधार पर रातोंरात सरकार बनाई जा सकती है और दूसरे राज्य में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के समर्थन के बावजूद बार-बार तकनीकी आधार पर रोका जा सकता है?
लोकतंत्र केवल संख्या का खेल नहीं, बल्कि विश्वास का भी विषय है। राज्यपाल का पद राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि का नहीं, बल्कि संविधान के संरक्षक का माना जाता है। इसलिए अपेक्षा की जाती है कि हर राज्य में एक समान संवैधानिक परंपरा और निष्पक्षता दिखाई दे।
आज देश का आम नागरिक इन घटनाओं को बहुत ध्यान से देख रहा है। उसे यह समझ आता है कि सत्ता बदल सकती है, सरकारें बन और गिर सकती हैं, लेकिन लोकतंत्र की विश्वसनीयता तब कमजोर होती है जब संवैधानिक संस्थाओं पर पक्षपात के आरोप लगने लगते हैं।
तमिलनाडु और महाराष्ट्र की घटनाओं की तुलना इसलिए हो रही है क्योंकि जनता अब सवाल पूछ रही है —
अगर महाराष्ट्र में आधी रात को शपथ संभव थी, तो तमिलनाडु में बार-बार 118 विधायकों की सूची की शर्त क्यों?
और यदि तमिलनाडु में इतनी कठोर संवैधानिक प्रक्रिया जरूरी है, तो महाराष्ट्र में वही कसौटी क्यों नहीं अपनाई गई?
लोकतंत्र में सबसे बड़ा खतरा विपक्ष नहीं होता, बल्कि दोहरे मापदंड होते हैं। संविधान की ताकत उसकी समानता में है। जिस दिन जनता को यह लगने लगे कि नियम व्यक्ति और परिस्थिति देखकर बदले जा रहे हैं, उसी दिन लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भरोसा कमजोर होने लगता है।