SCG News | भोपाल
हिंदी दिवस आते ही हिंदी के सम्मान, प्रचार और उसे बढ़ावा देने की बातें तेज हो जाती हैं। मंचों से हिंदी को राष्ट्र की ताकत बताया जाता है और सरकारी स्तर पर हिंदी को शिक्षा और प्रशासन से जोड़ने के संकल्प दोहराए जाते हैं।
लेकिन मध्य प्रदेश में हिंदी को उच्च शिक्षा की भाषा बनाने का प्रयोग एक अलग तस्वीर सामने रख रहा है।
सवाल सीधा है—
जिस हिंदी मेडिकल शिक्षा को चार साल पहले बड़ी पहल और भाषाई क्रांति बताया गया था, आज उसकी किताबें कहां हैं?
जवाब चौंकाने वाला है। बड़ी संख्या में हिंदी की मेडिकल किताबें छात्रों की मेज पर नहीं, बल्कि गोदामों में पड़ी हैं।
2022 में हुआ था बड़ा ऐलान
साल 2022 में मध्य प्रदेश देश का पहला राज्य बना था, जहां MBBS की पढ़ाई हिंदी में शुरू करने की पहल की गई।
अंग्रेजी की मेडिकल टेक्स्टबुक्स का हिंदी में अनुवाद कराया गया। विशेषज्ञों की मदद ली गई। किताबें तैयार हुईं और उनका विमोचन भी हुआ।
इसे हिंदी को मेडिकल और उच्च शिक्षा से जोड़ने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम बताया गया।
लेकिन किसी भी शैक्षणिक प्रयोग की सफलता सिर्फ किताब छापने या उसका विमोचन करने से तय नहीं होती।
असल सवाल यह है—
क्या छात्र उसे पढ़ना चाहते हैं?
और यहीं से इस प्रयोग की सबसे बड़ी चुनौती सामने आती है।
प्रकाशक ने लगाया करोड़ों का दांव, पैसा स्टॉक में फंसा
भोपाल के प्रकाशक मनीष जैन का परिवार 1962 से किताबों के कारोबार में है।
जब 2022 में सरकार की ओर से हिंदी में मेडिकल किताबें प्रकाशित करने का काम मिला, तो उन्हें लगा कि यह हिंदी तकनीकी शिक्षा के लिए एक नए बाजार की शुरुआत होगी।
उन्होंने करीब 12 से 13 करोड़ रुपये का निवेश किया और लगभग 5 हजार किताबें प्रकाशित कीं।
लेकिन चार साल बाद तस्वीर बदल चुकी है।
मनीष जैन के मुताबिक, करीब 9 करोड़ रुपये मूल्य की लगभग 2500 किताबें अब भी बिना बिके गोदाम में पड़ी हैं।
मेडिकल कॉलेजों से अपेक्षित मांग नहीं आई। नतीजा यह हुआ कि प्रकाशकों का पैसा बड़ी मात्रा में स्टॉक में फंस गया।
जिस बाजार के विस्तार की उम्मीद हिंदी मेडिकल शिक्षा के कारण की गई थी, वह उम्मीद पूरी नहीं हुई।
अब प्रकाशक दोबारा अंग्रेजी की मेडिकल पाठ्यपुस्तकों के कारोबार की ओर लौटने को मजबूर हैं।
यानी समस्या सिर्फ यह नहीं है कि हिंदी में किताबें उपलब्ध हैं या नहीं।
समस्या यह है कि उनका पाठक कौन है?
छात्र हिंदी के खिलाफ नहीं, अपने करियर के पक्ष में हैं
हिंदी माध्यम से मेडिकल या इंजीनियरिंग शिक्षा की चर्चा में अक्सर यह मान लिया जाता है कि छात्र अंग्रेजी छोड़कर हिंदी चुनेंगे तो यह हिंदी के प्रति सम्मान का प्रमाण होगा।
लेकिन छात्र का फैसला भावनाओं से ज्यादा उसके करियर से जुड़ा होता है।
एक MBBS छात्र के सामने सिर्फ पांच साल की पढ़ाई पूरी करने का सवाल नहीं होता।
उसे आगे—
- पोस्ट ग्रेजुएशन करना है,
- रिसर्च करनी है,
- मेडिकल जर्नल पढ़ने हैं,
- प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करनी है,
- नई मेडिकल तकनीक समझनी है,
- अंतरराष्ट्रीय शोध से जुड़ना है,
- और अंततः रोजगार की प्रतिस्पर्धा में उतरना है।
इन लगभग सभी क्षेत्रों में अंग्रेजी का प्रभाव अभी भी बेहद मजबूत है।
ऐसे में छात्र के सामने स्वाभाविक सवाल है—
आज मैं किस भाषा में पढ़ूं और कल मेरा करियर किस भाषा में आगे बढ़ेगा?
आंकड़े भी प्रयोग की सीमित पहुंच बताते हैं
मध्य प्रदेश में हिंदी माध्यम से MBBS की शुरुआत के बाद छात्रों की परीक्षा में भागीदारी के आंकड़े भी इस प्रयोग की चुनौती को सामने रखते हैं।
2022: मध्य प्रदेश में हिंदी में मेडिकल शिक्षा की शुरुआत।
2024-25: हिंदी में MBBS कोर्स उपलब्ध होने के बावजूद एक भी छात्र ने हिंदी में परीक्षा नहीं दी।
2025-26: कुल मेडिकल छात्रों में लगभग 10 प्रतिशत छात्रों ने हिंदी में परीक्षा दी।
यानी चार साल बाद भी हिंदी माध्यम को अपनाने वाले छात्रों की संख्या सीमित है।
यह आंकड़ा अपने आप में एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करता है—
अगर छात्र को विकल्प दिया गया है, तो वह हिंदी को बड़े पैमाने पर क्यों नहीं चुन रहा?
कुलपति भी मानते हैं—हिंदी मेडिकल साहित्य अभी कमजोर
मध्यप्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय, जबलपुर के कुलपति प्रोफेसर डॉ. अशोक खंडेलवाल भी मानते हैं कि मेडिकल साहित्य के मामले में अंग्रेजी का आधार बेहद मजबूत है, जबकि हिंदी में अभी उस स्तर का साहित्य विकसित नहीं हो पाया है।
हालांकि उनका मानना है कि हिंदी मेडिकल साहित्य धीरे-धीरे विकसित हो रहा है और आने वाले समय में स्थिति बेहतर होगी।
उनका तर्क है कि मेडिकल साहित्य का विकास भी एक लंबी प्रक्रिया रही है। जिस तरह मेडिकल ज्ञान का विस्तार अलग-अलग भाषाओं में हुआ, उसी तरह हिंदी भी वर्तमान में एक संक्रमण के दौर से गुजर रही है।
यह तर्क महत्वपूर्ण है।
क्योंकि किसी भाषा को उच्च शिक्षा की भाषा बनाने के लिए केवल अनुवाद पर्याप्त नहीं है।
असली चुनौती किताब से आगे की है
मध्य प्रदेश का अनुभव बताता है कि हिंदी को उच्च शिक्षा की भाषा बनाने की चुनौती सिर्फ हिंदी में किताबें उपलब्ध कराने की नहीं है।
इसके लिए एक पूरा इकोसिस्टम तैयार करना होगा।
हिंदी में गुणवत्तापूर्ण पाठ्यपुस्तकें हों।
शिक्षक हिंदी में पढ़ाने के लिए सहज हों।
मेडिकल शब्दावली सरल और मानकीकृत हो।
हिंदी में रिसर्च पेपर और अकादमिक सामग्री उपलब्ध हो।
हिंदी में प्रतियोगी परीक्षाओं की पर्याप्त सामग्री हो।
और सबसे महत्वपूर्ण—
हिंदी माध्यम से पढ़ने वाले छात्र के लिए आगे रोजगार, पोस्ट ग्रेजुएशन और रिसर्च के रास्ते उतने ही खुले हों, जितने अंग्रेजी माध्यम के छात्र के लिए हैं।
जब तक यह नहीं होता, तब तक हिंदी माध्यम का छात्र अपने भविष्य को लेकर असुरक्षित महसूस कर सकता है।
हिंदी दिवस पर उत्सव नहीं, आत्ममंथन की जरूरत
हिंदी दिवस पर हिंदी के सम्मान की बात होनी ही चाहिए।
लेकिन मध्य प्रदेश का यह अनुभव हमें एक असहज सवाल पूछने के लिए भी मजबूर करता है।
क्या हिंदी को सिर्फ भाषणों, नारों और सरकारी घोषणाओं की भाषा बनाना है?
या फिर उसे वास्तव में—
रोजगार की भाषा,
मेडिकल शिक्षा की भाषा,
इंजीनियरिंग की भाषा,
रिसर्च की भाषा
और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में टिकने वाली भाषा बनाना है?
क्योंकि किताब छाप देना हिंदी को उच्च शिक्षा की भाषा नहीं बनाता।
जब तक छात्र उसे पढ़ना न चाहें, शिक्षक उसमें सहज न हों, उच्च शिक्षा का पर्याप्त साहित्य उपलब्ध न हो और हिंदी माध्यम से पढ़ने के बाद करियर के रास्ते स्पष्ट न हों—तब तक यह प्रयोग अधूरा रहेगा।
सबसे बड़ा सवाल
2022 में जिन हिंदी मेडिकल किताबों को हिंदी शिक्षा की नई शुरुआत का प्रतीक बताया गया था, अगर 2026 में उन्हीं किताबों का बड़ा हिस्सा गोदामों में पड़ा है, तो हिंदी दिवस पर सिर्फ जश्न मनाना पर्याप्त नहीं है।
जरूरत इस सवाल पर गंभीरता से विचार करने की है—
हिंदी में मेडिकल शिक्षा शुरू करने की जरूरत तो महसूस हुई, लेकिन क्या हमने यह समझने की कोशिश की कि छात्र उसे क्यों अपनाएगा?
क्योंकि भाषा को आदेश से विकल्प बनाया जा सकता है, लेकिन उसे पसंद बनाने के लिए गुणवत्ता, अवसर और भविष्य—तीनों देने पड़ते हैं।