नरेन्द्र पाण्डेय : न्यूयॉर्क का मैडिसन स्क्वायर गार्डन। दुनिया के सबसे चर्चित सार्वजनिक मंचों में से एक। और वहां खड़े राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत। कार्यक्रम का नाम—Universal Oneness Celebration। अर्थात—सार्वभौमिक एकता का उत्सव।
यह दृश्य केवल अमेरिका में बसे भारतीयों के लिए कोई सांस्कृतिक आयोजन नहीं था। यह उस विचार की अंतरराष्ट्रीय प्रस्तुति भी थी, जिसे संघ पिछले सौ वर्षों से भारत की सांस्कृतिक चेतना के रूप में स्थापित करने का प्रयास करता रहा है। लेकिन इसी मंच से एक बड़ा सवाल भारत लौटता है— अगर दुनिया एक है, मानवता एक है, विविध पूजा-पद्धतियां एक व्यापक मानवीय सत्य की ओर जाती हैं, तो फिर भारत में हिंदुत्व का अर्थ क्या है?
क्या हिंदुत्व केवल हिंदुओं की राजनीतिक शक्ति है? क्या हिंदुत्व का अर्थ मुसलमानों को संदेह की निगाह से देखना है? क्या भारत में किसी मुसलमान को यह साबित करना पड़ेगा कि वह इस देश का नागरिक है? या हिंदुत्व इससे कहीं बड़ा, कहीं उदार और कहीं अधिक आत्मविश्वासी विचार है? मेरी दृष्टि में इस बहस का उत्तर बहुत स्पष्ट है— मुसलमानों को भारत से निकालना हिंदुत्व नहीं है। और यह बात किसी राजनीतिक दल या विचारधारा के दबाव में नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की अपनी आत्मा के आधार पर कही जानी चाहिए।
भागवत ने अमेरिका में क्या कहा?
भागवत का न्यूयॉर्क कार्यक्रम ऐसे समय हुआ जब उनकी यात्रा को लेकर अमेरिका में भी तीखा राजनीतिक और वैचारिक विवाद खड़ा हुआ। न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी सहित कुछ संगठनों ने RSS की विचारधारा पर सवाल उठाए। दूसरी ओर, कार्यक्रम के समर्थकों ने इसे हिंदू सभ्यता, भारतीय संस्कृति और वैश्विक एकता के संदेश के रूप में प्रस्तुत किया। भागवत के संबोधन का मूल भाव एकता और मानवता पर था। यानी संदेश यह कि पूजा की पद्धतियां अलग हो सकती हैं, रास्ते अलग हो सकते हैं, लेकिन मनुष्य की मूल चेतना और मानवता का आधार एक है।
यह विचार भारत के लिए नया नहीं है। “एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति।” सत्य एक है, ज्ञानी उसे अलग-अलग नामों से कहते हैं। यही तो भारतीयता की खूबसूरती है। फिर सवाल यह है कि हम इस दर्शन को अपने राजनीतिक व्यवहार में क्यों नहीं उतार पाते? हिंदुत्व को मुसलमान विरोध की जरूरत क्यों पड़े?
यहां हिंदुत्व और हिंदू वर्चस्व के बीच अंतर समझना जरूरी है। हिंदुत्व यदि भारत की सांस्कृतिक पहचान है तो उसमें भारत की पूरी सभ्यता का विस्तार होना चाहिए। लेकिन यदि हिंदुत्व का राजनीतिक अर्थ केवल यह बना दिया जाए कि कौन हिंदू है और कौन नहीं, कौन राष्ट्रवादी है और कौन नहीं, कौन इस देश में रहने योग्य है और कौन नहीं—तो यह हिंदुत्व की शक्ति को सीमित कर देता है। क्योंकि जिस विचार को अपने अस्तित्व के लिए किसी दूसरे समुदाय से लगातार दुश्मनी चाहिए, वह कितना भी शक्तिशाली दिखाई दे, भीतर से कमजोर होता है।
हिंदुत्व को मुसलमानों से डरने की जरूरत नहीं है।
हिंदुत्व इतना विशाल विचार है कि वह अपने भीतर असहमति को भी स्थान दे सकता है। इतिहास में भारत ने अनेक आस्थाओं को स्वीकार किया। बौद्ध आए, जैन परंपरा विकसित हुई, सिख परंपरा ने जन्म लिया, इस्लाम आया, ईसाई आए, पारसी आए। इन सबने भारत को केवल जनसंख्या नहीं दी—भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन में अपना योगदान दिया। इसलिए किसी भारतीय मुसलमान से यह कहना कि “तुम्हारा स्थान भारत में नहीं है”, दरअसल भारत की सभ्यता को छोटा करना है।
राष्ट्र धर्म से बड़ा है यह बात हिंदुत्व के समर्थकों और विरोधियों—दोनों को समझनी होगी। भारत एक धार्मिक राज्य की अवधारणा पर नहीं बना। भारत की आधुनिक राष्ट्र-व्यवस्था नागरिकता पर आधारित है। इस देश में नागरिक का अधिकार उसके धर्म से तय नहीं होता। वह हिंदू हो सकता है, मुस्लिम हो सकता है, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी या किसी भी आस्था का हो सकता है—लेकिन राष्ट्र के सामने उसकी पहली पहचान भारतीय नागरिक की है।
यही संविधान का मूल ढांचा है। और यही भारत की राजनीतिक आधुनिकता है। इसलिए यदि कोई हिंदू कहता है कि भारत में हिंदुओं को अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व करने का अधिकार है, तो यह स्वाभाविक है। लेकिन उसी क्षण उसे यह भी स्वीकार करना होगा कि भारत के मुसलमान को अपनी धार्मिक पहचान के साथ भारतीय होने का उतना ही अधिकार है। पहचान का सम्मान एकतरफा नहीं हो सकता।
असली सवाल मुसलमान नहीं, मानसिकता है
भारत में समस्या मुसलमान होने की नहीं है। समस्या तब है जब कोई व्यक्ति कानून को नहीं मानता। समस्या तब है जब कोई हिंसा करता है। समस्या तब है जब कोई आतंकवाद का समर्थन करता है। लेकिन यही कसौटी हिंदू पर भी लागू होनी चाहिए। यदि कोई हिंदू हिंसा करता है तो केवल इसलिए उसे राष्ट्रवादी कहकर बचाया नहीं जा सकता कि वह हिंदू है। और यदि कोई मुसलमान कानून का पालन करता है, देश के लिए काम करता है, सेना में सेवा देता है, विज्ञान, शिक्षा, उद्योग, कला और समाज निर्माण में योगदान देता है, तो केवल उसके धर्म के कारण उसे राष्ट्रविरोधी कहना भी उतना ही गलत है। देशभक्ति का कोई धार्मिक प्रमाणपत्र नहीं होता।
भागवत के सामने सबसे बड़ी चुनौती
यही वह जगह है जहां भागवत के न्यूयॉर्क भाषण की वास्तविक परीक्षा होती है। अमेरिका में “oneness” की बात करना आसान है। लेकिन भारत के गांव में, शहर में, मोहल्ले में, चुनाव में और सोशल मीडिया की बहस में उस “oneness” को बचाए रखना कठिन है। यदि संघ दुनिया को यह संदेश देना चाहता है कि भारतीय सभ्यता मानवता को जोड़ने वाली सभ्यता है, तो उसे भारत के भीतर भी उसी भाषा को मजबूत करना होगा। क्योंकि दुनिया भारत को केवल हमारे भाषणों से नहीं, हमारे व्यवहार से समझेगी। और यहां आलोचकों का प्रश्न भी पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।
अमेरिका में भागवत के कार्यक्रम का विरोध हुआ। कई संगठनों ने RSS की विचारधारा को लेकर आपत्तियां उठाईं। दूसरी तरफ बड़ी संख्या में हिंदू-अमेरिकी संगठनों ने कार्यक्रम का समर्थन किया। यानी भारतीय प्रवासी समाज के भीतर भी हिंदुत्व को लेकर एक समान दृष्टिकोण नहीं है। इस बहस को केवल “हिंदू बनाम हिंदू विरोधी” बनाकर खत्म कर देना आसान रास्ता है। लेकिन इससे सवाल खत्म नहीं होंगे।
हिंदुत्व की अग्निपरीक्षा
हिंदुत्व की असली परीक्षा यह नहीं है कि वह कितनी बड़ी भीड़ जुटा सकता है। न ही यह कि उसके विरोध में कितने लोग खड़े होते हैं। हिंदुत्व की असली परीक्षा यह है कि वह अपने से अलग व्यक्ति के साथ कितना न्याय करता है। जिस हिंदुत्व को अपने अस्तित्व के लिए मुसलमान को निकालने की जरूरत पड़े, वह हिंदुत्व नहीं—राजनीतिक भय है। और जिस धर्मनिरपेक्षता को हिंदू की सांस्कृतिक पहचान से ही समस्या हो, वह भी स्वस्थ लोकतंत्र नहीं है। भारत को इन दोनों अतियों से बचना होगा।
भारत को ऐसा हिंदुत्व चाहिए जो अपने मंदिर पर गर्व करे, लेकिन दूसरे के मस्जिद पर पत्थर न फेंके। ऐसा राष्ट्रवाद चाहिए जो तिरंगे को सबसे ऊपर रखे, लेकिन किसी नागरिक की धार्मिक पहचान को उसके राष्ट्रप्रेम की कसौटी न बनाए। ऐसी भारतीयता चाहिए जो कह सके—
मैं हिंदू हूं, इसलिए मुझे अपनी परंपरा पर गर्व है। और तुम मुसलमान हो, इसलिए तुम्हें अपने विश्वास के साथ भारतीय रहने का उतना ही अधिकार है।
यही आत्मविश्वास है। यही सभ्यता है। और शायद यही वह संदेश है जिसे न्यूयॉर्क से भारत तक सबसे गंभीरता से पहुंचाने की जरूरत है। सवाल भागवत से भी, हिंदुत्व के आलोचकों से भी
भागवत से सवाल है—
यदि “एक मानवता” आपकी दृष्टि का हिस्सा है, तो क्या भारत का मुसलमान भी उसी मानवता का हिस्सा है? यदि भारत एक सभ्यतागत राष्ट्र है, तो क्या उसकी सभ्यता में मुसलमान भारतीयों की स्मृतियां, योगदान और वर्तमान भी शामिल हैं? और हिंदुत्व के आलोचकों से भी सवाल है— क्या भारत की बहुसंख्यक हिंदू आबादी को अपनी संस्कृति, परंपरा और सभ्यता पर गर्व करने का अधिकार नहीं होना चाहिए? यदि उत्तर दोनों प्रश्नों का “हां” है, तो रास्ता साफ है। न हिंदू श्रेष्ठ नागरिक है, न मुसलमान कमतर नागरिक। दोनों भारतीय हैं। और भारतीयता किसी एक धर्म की संपत्ति नहीं है।
हिंदुत्व की ताकत किसी को बाहर करने में नहीं, बल्कि इतनी बड़ी सांस्कृतिक छतरी बनाने में है जिसके नीचे अलग-अलग आस्थाओं के लोग स्वयं को भारत का हिस्सा महसूस करें। क्योंकि—
राष्ट्र धर्म से बड़ा है। सभ्यता राजनीति से बड़ी है। और भारत किसी एक समुदाय से नहीं—भारत सबका साझा वर्तमान और साझा भविष्य है।