SCG News : बिहार की राजनीतिक ज़मीन गर्म है, और इस बार आग किसी बाहरी हमले से नहीं, बल्कि भीतर से उठी है। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के भीतर ‘घर का भेदी’ अब दल पर ही भारी पड़ गया है। पार्टी प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने रविवार को एक अप्रत्याशित और निर्णायक कदम उठाते हुए अपने बड़े बेटे तेज प्रताप यादव को न सिर्फ पार्टी से छह साल के लिए निष्कासित किया, बल्कि उनसे पारिवारिक नाता भी तोड़ लिया।
लालू
यादव ने जो किया, वह
महज़ एक बाप का कठोर फैसला नहीं था; यह एक बूढ़े शेर का उस छाव को दंड देना था जो अपनी ही किल्लतों
को जंगल की लाज पर भारी कर बैठा था।
तेज प्रताप यादव की ओर से एक महिला के
साथ कथित रिश्ते की तस्वीर पोस्ट होना—और फिर उसका सफाया—इस पूरे ड्रामे का ट्रिगर
था। पोस्ट में लिखा था कि वह 12 वर्षों
से उस महिला के साथ रिश्ते में हैं। तेज प्रताप ने सफाई दी कि उनका अकाउंट हैक हो
गया था, मगर 'हैक' शब्द अब सियासत में सच्चाई नहीं,
संकट से बचने का औजार बन गया है।
राजद
के एक वरिष्ठ नेता ने कहा —
“तेज
प्रताप ने बार-बार पार्टी को शर्मिंदा किया। यह आखिरी वार था।”
यह वही नेता हैं जो 1997 से लालू के साथ हैं और जिनके अनुसार,
तेज प्रताप का राजनीतिक जीवन ‘घावों का
पुलिंदा’ रहा है।
तेज प्रताप का खुद को भगवान कृष्ण या
शिव के रूप में सजा लेना — चाहे वह रथ पर बैठकर जनता से मिलने जाना हो या बाँसुरी
लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस करना — यह सब उस गंभीर राजनीति की जमीन पर जोकर के पाँव
जैसा लगता रहा। ऐसे नाटकीय अंदाज़ ने राजद समर्थकों को भी असहज किया है।
राबड़ी
देवी ने मां बनकर बेटे को ढाल देने की कोशिश की, लेकिन लालू बार-बार चेताते रहे —
“यह
राजनीति है, नौटंकी नहीं।”
2018 में दरोगा प्रसाद राय
की पोती ऐश्वर्या राय से तेज प्रताप का विवाह एक राजनीतिक संधि जैसा था। लेकिन यह
गठबंधन कुछ महीनों में ही दरक गया। ऐश्वर्या ने आरोप लगाया कि उन्हें घर से निकाला
गया, मारपीट की गई और तेज
प्रताप “नशेड़ी हैं, जिन्हें
राधा बनकर घूमने की आदत है।”
तेज
प्रताप ने बदले में आरोप लगाया कि ऐश्वर्या ने “बड़ी रकम की मांग के लिए उन्हें और
उनके परिवार को बदनाम किया।” मामला अदालत में है, लेकिन जनता की अदालत में यह रिश्ते की
साख खत्म हो चुकी है।
तेज प्रताप के निष्कासन को लालू ने
नैतिक फैसले की तरह पेश किया है, लेकिन
जदयू और भाजपा इसे ‘साफ-सफाई के बहाने वंशवाद की रणनीति’ कह रही है।
जदयू नेता नीरज कुमार ने तंज कसा:
“जब
ऐश्वर्या राय को घर से निकाला गया था, तब कहाँ थी लालू यादव की ‘संस्कृति’? आज वह अपने बेटे की तस्वीरों से आहत हैं,
लेकिन तब उनकी बहू की पीड़ा से क्यों
नहीं?”
तेज प्रताप की बगावत के साथ लालू उस
पुराने जख्म को भी झेल रहे हैं जो उनके साले सुभाष यादव और साधु यादव के आरोपों से
बार-बार रिसता है।
सुभाष यादव ने आरोप लगाया था कि 1990–2005
के मुख्यमंत्री काल में “मुख्यमंत्री
आवास अपहरण और वसूली की योजना का अड्डा बन चुका था।”
जवाब में साधु यादव बोले —
“इन
आरोपों का खलनायक खुद सुभाष ही है।”
बिहार
की राजनीति में लालू के साले, भांजे
और समधी सभी किसी न किसी मोड़ पर या तो विपक्ष के हथियार बनते हैं या खुद हथियार
चला बैठते हैं।
सूत्रों की मानें तो राजद अब तेज प्रताप
की हसनपुर सीट पर लालू की बेटी रोहिनी आचार्य को टिकट देने की तैयारी में है।
किडनी डोनेशन से चर्चा में आईं रोहिनी 2024 में सारण से चुनाव हार चुकी हैं,
लेकिन परिवार की साख को ढाल देने का काम
अब उनसे लिया जा सकता है।
यह
चाल चुनावी समीकरण को थोड़ा सँवार सकती है, लेकिन विपक्ष फिर से यह राग छेड़ेगा — "राजद नहीं, यह लालू परिवार प्रा. लि. है!"