बार डांस, SDM का कैमरा और मंत्री की चुप्पी


गरियाबंद जिले के उरमाल से सामने आया वीडियो कोई स्थानीय घटना नहीं है।

यह वीडियो दरअसल छत्तीसगढ़ की संस्कृति, प्रशासन और राजनीतिक जवाबदेही—तीनों का एक साथ एक्स-रे है।

ऑपेरा के नाम पर बार बालाओं का अश्लील नृत्य,

सामने बैठा SDM मोबाइल में वीडियो बनाता हुआ,

और वर्दीधारी पुलिसकर्मी बार डांसरों को किस करते हुए—

यह दृश्य किसी बी-ग्रेड फिल्म का नहीं,

छत्तीसगढ़ के सरकारी तंत्र का आईना है।

क्या छत्तीसगढ़ में अश्लील नृत्य कभी संस्कृति रहा है?

इस सवाल का जवाब खोजने के लिए किसी आयोग की ज़रूरत नहीं।

छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक परंपरा ने—

नाचा को जन्म दिया

पंथी में अनुशासन सिखाया

राउत नाचा में वीरता दिखाई

जसगीत में भक्ति रची

यहाँ मनोरंजन कभी भी देह प्रदर्शन नहीं रहा।

यहाँ कला संस्कार से जुड़ी रही, न कि शराबी तालियों से।

फिर सवाल उठता है—

यह बार बालाओं का अश्लील नृत्य आया कहाँ से?


उत्तर साफ़ है—

यह छत्तीसगढ़ की मिट्टी की उपज नहीं,

यह बाहर से आयातित बाज़ारू वायरस है,

जो अब सरकारी संरक्षण में फैल रहा है।

ऑपेरा की अनुमति, अश्लीलता की छूट

उरमाल में युवा समिति ने छह दिवसीय ऑपेरा की अनुमति ली थी।

ऑपेरा यानी लोकनाट्य, सामाजिक कथा, सांस्कृतिक संवाद।

लेकिन मंच पर उतरा—

बार डांस।

और दर्शक बने—

प्रशासन के प्रतिनिधि।

यह सिर्फ़ अनुमति का दुरुपयोग नहीं,

यह सिस्टम की मिलीभगत है।

जब SDM खुद वीडियो बना रहे हों,

तो यह मान लेना चाहिए कि

अश्लीलता अवैध नहीं,

अनौपचारिक रूप से वैध कर दी गई थी।

अब सवाल संस्कृति मंत्री से

यहाँ कहानी सिर्फ़ SDM और पुलिस पर खत्म नहीं होती।

क्योंकि छत्तीसगढ़ सरकार में—


एक संस्कृति मंत्रालय भी है।
और एक संस्कृति मंत्री भी।

तो सवाल स्वाभाविक है—

क्या ऑपेरा के नाम पर बार डांस की अनुमति संस्कृति विभाग की जानकारी के बिना मिली?

क्या लोककला की रक्षा संस्कृति मंत्री की संवैधानिक जिम्मेदारी नहीं?

या संस्कृति मंत्रालय सिर्फ़ पोस्टर, उत्सव और फोटोसेशन तक सीमित रह गया है?

अगर मंच पर संस्कृति की हत्या हो रही है

और मंत्री मौन हैं,

तो यह मौन नीतिगत अपराध बन जाता है।

संस्कृति मंत्री की चुप्पी: लापरवाही या सहमति?

संस्कृति मंत्री सिर्फ़ समारोहों में भाषण देने के लिए नहीं होते।

वे इस बात के संरक्षक होते हैं कि—

संस्कृति के नाम पर क्या दिखाया जाएगा

क्या लोककलाओं की जगह बाज़ारूपन ले रहा है

और क्या छत्तीसगढ़ की अस्मिता को धीरे-धीरे खोखला किया जा रहा है

गरियाबंद की घटना बताती है कि

या तो संस्कृति विभाग अक्षम है,

या फिर उदासीन

और लोकतंत्र में—

उदासीनता भी अपराध मानी जाती है।

यह घटना चेतावनी है, अपवाद नहीं

आज गरियाबंद है,

कल किसी और ज़िले का नाम होगा।

और फिर कहा जाएगा—

“यह तो अब सामान्य हो गया है।”

नहीं।

अश्लीलता कभी सामान्य नहीं होती,

उसे सामान्य बनाया जाता है।

ठीक वैसे ही,

जैसे संस्कृति के नाम पर

संस्कृति को बेचा जा रहा है।

निष्कर्ष: कार्रवाई सिर्फ़ नीचे नहीं, ऊपर भी हो

SDM पर कार्रवाई हो— यह जरूरी है

पुलिसकर्मियों पर सख़्त कदम उठें— यह जरूरी है

लेकिन उतना ही जरूरी है

संस्कृति मंत्री सार्वजनिक रूप से बताएं—
क्या यही उनकी संस्कृति नीति है

?

अगर नहीं,

तो उनकी चुप्पी टूटनी चाहिए।

क्योंकि छत्तीसगढ़ की संस्कृति

किसी अफ़सर की जेब में पड़ा मोबाइल नहीं है,

जिसे जब चाहे रिकॉर्ड कर लिया जाए।

यह एक विरासत है—

और अगर इसकी रक्षा नहीं की गई,

तो इतिहास लिखेगा—

गरियाबंद की घटना

सिर्फ़ प्रशासन की नहीं,

संस्कृति मंत्रालय की भी विफलता थी।

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