Bodhghat Project : बस्तर की बहुचर्चित बोधघाट परियोजना एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज ने परियोजना से संभावित डूबान और विस्थापन पर सवाल उठाते हुए इसका विरोध किया है। वहीं उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा ने कहा है कि परियोजना का फैसला सिर्फ डूबान देखकर नहीं किया जा सकता। सिंचाई से होने वाले लाभ और प्रभावित होने वाली जमीन, दोनों का तुलनात्मक आकलन जरूरी है।
बैज बोले- सिंचाई चाहिए, लेकिन गांवों की कीमत पर नहीं
दीपक बैज ने दावा किया कि बोधघाट परियोजना से 20 हजार से अधिक ग्रामीण प्रभावित हो सकते हैं और 56 गांव डूबान क्षेत्र में आ सकते हैं। उन्होंने कहा कि बस्तर को सिंचाई के लिए पानी मिलना चाहिए, लेकिन ऐसी योजना पर विचार होना चाहिए जिससे लोगों को अपने गांव और जमीन से विस्थापित न होना पड़े। बैज ने इसके विकल्प के तौर पर इंद्रावती नदी पर प्रस्तावित मटनार बैराज और देउरगांव बैराज का उल्लेख किया। उनका तर्क है कि इन योजनाओं के जरिए सिंचाई जरूरतों को पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।
बैज के मुताबिक, मटनार और देउरगांव बैराज के प्रस्ताव कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में तैयार किए गए थे। उन्होंने कहा कि दोनों की डीपीआर बनाई गई थी और इन्हें बजट में भी शामिल किया गया था। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष का कहना है कि बड़े पैमाने पर डूबान और विस्थापन वाली परियोजना के बजाय इन विकल्पों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। उनके मुताबिक इससे बस्तर और आसपास के इलाकों की सिंचाई जरूरतों को पूरा करने का रास्ता निकल सकता है।
विजय शर्मा बोले- फायदे और नुकसान दोनों देखने होंगे
उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा ने बोधघाट परियोजना को केवल डूबान और विस्थापन के नजरिए से देखने पर सवाल उठाया। उनका कहना है कि किसी भी बड़ी बांध परियोजना के फायदे और नुकसान दोनों होते हैं। उन्होंने कहा कि यह देखना जरूरी है कि परियोजना में कितनी जमीन प्रभावित होगी और उसके बदले कितने बड़े क्षेत्र को सिंचाई का लाभ मिलेगा। यानी फैसला करते समय प्रभावित क्षेत्र और संभावित सिंचाई लाभ, दोनों को साथ रखकर आकलन करना होगा।
प्रभावित लोगों से संवाद पर भी जोर
विजय शर्मा ने कहा कि यदि किसी परियोजना में डूबान का क्षेत्र ज्यादा है और सिंचाई का लाभ सीमित है तो सवाल उठना स्वाभाविक है। दूसरी ओर, अगर डूबान अपेक्षाकृत कम हो और सिंचाई का लाभ बड़े क्षेत्र को मिले तो बस्तर के किसानों और व्यापक क्षेत्रीय हित को भी ध्यान में रखना होगा। उन्होंने डूबान क्षेत्र में आने वाले लोगों से संवाद की जरूरत बताई। उनका कहना है कि प्रभावित लोगों की बात सुनी जानी चाहिए और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ना चाहिए।
बोधघाट पर बहस का केंद्र क्या है?
बोधघाट परियोजना को लेकर मौजूदा राजनीतिक बहस मूल रूप से दो सवालों के इर्द-गिर्द है। पहला, परियोजना से संभावित डूबान और विस्थापन कितना होगा। दूसरा, इसके बदले बस्तर को कितना सिंचाई लाभ मिलेगा। कांग्रेस इस बहस में विस्थापन से बचने के लिए मटनार और देउरगांव बैराज जैसे विकल्पों की बात कर रही है। वहीं विजय शर्मा परियोजना के फायदे और नुकसान का तुलनात्मक आकलन करने पर जोर दे रहे हैं। फिलहाल दोनों पक्षों के रुख में अंतर साफ है। आगे की प्रक्रिया में प्रभावित ग्रामीणों की बात और परियोजना से जुड़े तकनीकी पहलुओं पर होने वाला आकलन महत्वपूर्ण रहेगा।