नरेन्द्र पाण्डेय : बसन्त की आहट के साथ जब फाल्गुन मास आता है, खेतों में पीली सरसों लहराती है, हवा में मादकता घुलती है, तो प्रकृति ही नहीं, शरीर की आंतरिक लय भी बदलने लगती है। और भीतर कहीं एक नई ऊर्जा जागती है। लेकिन आयुर्वेद और नाड़ी विज्ञान हमें याद दिलाते हैं कि यह परिवर्तन केवल बाहरी नहीं, आंतरिक भी है।
फाल्गुन आते ही हवा का मिज़ाज बदल जाता है। न पूरी ठंड, न पूरी गर्मी। दिन में हल्की गरमाहट और रात में ठंडी हवा। अगर इस समय हम अपनी दिनचर्या और खाने की आदतें नहीं बदलते, तो सर्दी-जुकाम, एलर्जी, गला खराब होना, गैस और एसिडिटी जैसी समस्याएँ तेजी से बढ़ सकती हैं।
आयुर्वेद के अनुसार फाल्गुन में शरीर में पित्त का प्रभाव बढ़ने लगता है, जबकि कफ का शमन प्रारंभ होता है। अर्थात शरीर में गरमी बढ़ाने वाला तत्व सक्रिय होने लगता है और ठंड के दिनों में जो कफ जमा हुआ था, वह अब पिघलकर गले और छाती को प्रभावित कर सकता है। इसी वजह से इस मौसम में जुकाम और एलर्जी ज्यादा देखने को मिलती है। यही कारण है कि इस समय सर्दी-जुकाम, एलर्जी, त्वचा विकार और पाचन संबंधी समस्याएँ उभर सकती हैं। यदि आहार संतुलित न हो तो यह संक्रमणों को भी निमंत्रण दे सकता है।
नाड़ी विज्ञान के अनुसार भी ऋतु परिवर्तन के समय शरीर की नाड़ियों में प्रवाह बदलता है। इड़ा और पिंगला के संतुलन में सूक्ष्म परिवर्तन होते हैं। यदि हम भारी, गरिष्ठ और शुष्क भोजन लेते हैं तो यह संतुलन और अधिक बिगड़ सकता है। परिणामस्वरूप शरीर में जड़ता, थकान और अम्लता बढ़ सकती है। इसलिए इस समय हल्का, ताजा और आसानी से पचने वाला भोजन लेना जरूरी है।
फाल्गुन में चना ना खाएं
चना पौष्टिक है, इसमें प्रोटीन भरपूर होता है। लेकिन हर मौसम में हर चीज़ एक जैसी असर नहीं करती। हर ऋतु में हर आहार अनुकूल नहीं होता। चना भारी और शुष्क प्रकृति का होता है – यह वातवर्धक है। इसे पचाने में समय लगता है। ज्यादा खाने से गैस और पेट फूलने की समस्या हो सकती है। फाल्गुन में पाचन अग्नि स्थिर नहीं रहती, ऐसे में चना अपच का कारण बन सकता है। बढ़ते पित्त के साथ यह एसिडिटी और कुछ लोगों में जलन या त्वचा की परेशानी भी बढ़ सकती है। इसलिए आयुर्वेद इस मास में चने के सीमित या त्याग की सलाह देता है, विशेषकर उन लोगों को जिन्हें पहले से गैस, एसिडिटी या त्वचा संबंधी समस्या हो।
फाल्गुन के सुपरफूड: बेर और अंगूर
प्रकृति हर मौसम में वही फल देती है, जिसकी हमें जरूरत होती है। जहाँ कुछ आहार त्याग योग्य हैं, वहीं कुछ इस ऋतु के लिए वरदान समान हैं। बेर शरीर को हल्की ठंडक देता है, खून साफ रखने में मदद करता है, इम्यूनिटी बढ़ाता है और अंगूर पेट साफ रखने में सहायक, शरीर को तुरंत ऊर्जा देता है, एसिडिटी कम करने में मददगार है . ये दोनों फल-
बढ़ते पित्त को संतुलित करते हैं। शरीर को ठंडक देते हैं
त्वचा को स्वस्थ रखते हैं। रक्त को शुद्ध करते हैं
कब्ज और अम्लता में राहत देते हैं। पाचन सुधारते हैं
रोग-प्रतिरोधक क्षमता को सुदृढ़ करते हैं। मौसमी रोगों से रक्षा करते हैं
बिना दवा के शरीर को संतुलित करते हैं। प्राकृतिक औषधि की तरह कार्य करते हैं
बेर विशेष रूप से कफ और पित्त दोनों को संतुलित करता है, जबकि अंगूर शरीर में नमी और ऊर्जा का संचार करता है। ये दोनों फल ऋतु के अनुरूप प्रकृति का उपहार हैं।
ऋतु के अनुसार आहार = स्वस्थ शरीर
आयुर्वेद का मूल सिद्धांत है—“ऋतुचर्या”। अर्थात, मौसम के अनुसार आहार और व्यवहार। यदि हम प्रकृति के नियमों के साथ चलें, तो शरीर स्वयं संतुलित रहता है। फाल्गुन में हल्का, ताजा और सुपाच्य भोजन लेना चाहिए। मूंग दाल, हरी सब्जियाँ, सूप, छाछ और मौसमी फल इस समय लाभकारी होते हैं। सुबह जल्दी उठकर योग, प्राणायाम और हल्का व्यायाम कफ को संतुलित करता है और पित्त को नियंत्रित रखता है।
क्या करें, क्या न करें?
✔ सुबह थोड़ा जल्दी उठें
✔ हल्की एक्सरसाइज या योग करें
✔ गुनगुना पानी पिएं
✔ ताजा और घर का बना खाना खाएं
✔ बहुत ज्यादा तला-भुना और जंक फूड कम करें
✔ दिन में ज्यादा देर तक सोने से बचें
त्योहारों का मौमजा, सेहत का भी ध्यान
फाल्गुन यानी महाशिवरात्रि और होली का महीना। मिठाइयाँ, पकवान और रंगों का उत्साह। लेकिन ध्यान रखें—त्योहार का आनंद तभी है जब सेहत साथ दे। मीठा और तला-भुना सीमित मात्रा में लें। रंग खेलने से पहले त्वचा पर हल्का तेल लगाएं। ज्यादा ठंडी चीजें खाने से बचें। पानी पर्याप्त पिएं।
फाल्गुन हमें सिखाता है कि प्रकृति के साथ चलना ही असली समझदारी है। अगर हम समय पर अपनी आदतें बदल लें, तो छोटी बीमारियों से बच सकते हैं और बिना दवा के भी स्वस्थ रह सकते हैं।
मौसम बदल रहा है—अब आपकी थाली भी बदलिए। तभी फाल्गुन का उत्साह और वसंत की ताजगी सच में महसूस होगी। प्रकृति हर मौसम में हमें संकेत देती है—बस आवश्यकता है उन्हें सुनने और अपनाने की। फाल्गुन हमें यही संदेश देता है कि संतुलन ही स्वास्थ्य का सबसे बड़ा मंत्र है।