पत्नी को साथ रहने के लिए मजबूर नहीं कर सकता पति, खारिज हुई याचिका


बिलासपुर, 21 सितंबर 2026। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की युगल पीठ ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि पत्नी को जबरन पति के साथ रहने के लिए विवश नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति पीपी साहू और न्यायमूर्ति सचिन सिंह राजपूत की पीठ ने पति की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें हिंदू विवाह अधिनियम के तहत पत्नी को उसके साथ रहने का निर्देश देने की मांग की गई थी।

हाईकोर्ट ने पारिवारिक न्यायालय के फैसले को बरकरार रखते हुए माना कि पत्नी के अलग रहने के लिए पर्याप्त और संतोषजनक कारण मौजूद हैं। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि पत्नी का बार-बार मायके जाना या कानूनी नोटिस भेजना मात्र इस बात का प्रमाण नहीं है कि पति के साथ वापस रहने से उसका इनकार अनुचित था।


2022 में हुई थी शादी

मामले के अनुसार जशपुर जिले के निवासी प्रवीण कुमार यादव का विवाह फरवरी 2022 में प्रियंका से हुआ था। अक्टूबर 2022 में प्रियंका अपनी बीमार मां को देखने मायके गई थी। इसके बाद उसने ससुराल लौटने से इनकार कर दिया।

पति के अनुसार उसने 31 अक्टूबर, 7 नवंबर और 11 नवंबर को मायके जाकर पत्नी को वापस लाने का प्रयास किया। इसके बाद 24 नवंबर को उसके माता-पिता भी प्रियंका को लेने गए, लेकिन वह ससुराल नहीं लौटी।

इसके बाद पति ने एसडीओ, पत्थलगांव के समक्ष आवेदन दिया, जिसे 31 मार्च 2023 को खारिज कर दिया गया। बाद में कानूनी नोटिस भेजने के साथ पति ने पारिवारिक न्यायालय में पत्नी को साथ रहने का निर्देश देने की मांग करते हुए याचिका दायर की।


पत्नी ने लगाए दहेज और प्रताड़ना के आरोप

पत्नी ने दूसरी ओर आरोप लगाया कि शादी के कुछ समय बाद ही ससुराल पक्ष ने मायके से मिली स्विफ्ट कार को कम कीमत की बताते हुए क्रेटा कार और पांच लाख रुपये नकद की मांग शुरू कर दी थी।

पत्नी ने पति और उसके परिजनों पर मारपीट और प्रताड़ना का भी आरोप लगाया। उसने न्यायालय को बताया कि कथित प्रताड़ना के कारण उसका गर्भपात हो गया था। इस संबंध में उसने सखी सेंटर, जशपुर में शिकायत और घरेलू हिंसा से संबंधित कार्रवाई शुरू किए जाने का भी उल्लेख किया।


पति पर दूसरी युवती से संबंध का भी आरोप

पत्नी ने पति के किसी अन्य युवती से संबंध होने का आरोप भी लगाया। इसके अलावा उसने बताया कि उसके शैक्षणिक प्रमाण पत्र, आधार कार्ड, जाति प्रमाण पत्र और बैंक पासबुक जैसे जरूरी दस्तावेज पति के पास हैं।

पारिवारिक न्यायालय ने इन दस्तावेजों को पत्नी को वापस करने का निर्देश भी दिया था।


हाईकोर्ट ने पारिवारिक न्यायालय का फैसला रखा बरकरार

हाईकोर्ट की पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलों और रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद कहा कि मामले को केवल पत्नी के अलग रहने के आधार पर नहीं देखा जा सकता। पत्नी की ओर से लगाए गए मारपीट, दहेज की मांग, गर्भपात और घरेलू हिंसा से जुड़े आरोपों को भी परिस्थितियों के समग्र परिप्रेक्ष्य में देखा जाना आवश्यक है।

इन परिस्थितियों को देखते हुए पीठ ने माना कि पत्नी के अलग रहने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद हैं। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने पारिवारिक न्यायालय के फैसले को बरकरार रखते हुए पति की अपील खारिज कर दी।

फैसले का व्यापक संदेश यही है कि वैवाहिक संबंध में साथ रहना केवल कानूनी आदेश के जरिए थोपे जाने वाला दायित्व नहीं हो सकता; अदालत परिस्थितियों और अलग रहने के कारणों की समग्रता को देखेगी।

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