नक्सलमुक्त भारत: जीत का ऐलान या अधूरी लड़ाई


SCGNEWS (नरेन्द्र पाण्डेय) : देश की संसद में जब गृहमंत्री अमित शाह यह कहते हैं कि “हम नक्सलमुक्त हो गए हैं”, तो यह सिर्फ एक बयान नहीं—एक युग के अंत का दावा लगता है। एक ऐसा संघर्ष, जिसने दशकों तक भारत के आंतरिक सुरक्षा ढांचे को चुनौती दी, उसे समाप्त घोषित करना किसी राजनीतिक उपलब्धि से कहीं अधिक, एक ऐतिहासिक घोषणा जैसा लगता है।

लेकिन सवाल अब भी जिंदा है—

क्या नक्सलवाद सच में खत्म हुआ है… या यह एक अधूरी कहानी का ऐलान है?

क्योंकि ज़मीनी सच्चाई कुछ और कहती है—

आज भी बस्तर के कई इलाकों में IED का खतरा है…

कुछ क्षेत्रों में आम लोगों का प्रवेश प्रतिबंधित है…

और “अर्बन नक्सल” की बहस एक नए मोर्चे की ओर इशारा करती है।

इसी के साथ शुरू हो गया है एक और युद्ध—श्रेय लेने का युद्ध।

केन्द्रीय गृह मंत्री का आरोप—अगर कांग्रेस साथ देती, तो 2024 में ही अंत हो जाता।

और जवाब में कांग्रेस याद दिलाती है—2021 में खुद अमित शाह ने भूपेश बघेल सरकार के प्रयासों की तारीफ की थी।

Naxalites used to come to BJP office for extortion: Bhupesh Baghel

सच क्या है?

सच यह है कि यह लड़ाई सिर्फ “बुलेट” से नहीं जीती गई…

यह “पॉलिसी और ट्रस्ट” की भी जीत है।

बस्तर में बदलाव अचानक नहीं आया—

सड़कें पहुँचीं, नेटवर्क पहुँचा…

स्कूल, अस्पताल, राशन…

और सबसे अहम—भरोसा पहुँचा।

राज्य के गृहमंत्री विजय शर्मा कहते है-  

ऑल इंडिया रेडियो पर गोंडी-हल्बी में कहानियां चलीं,

3000 से ज्यादा नक्सलियों ने मुख्यधारा में वापसी की,

4 लाख युवाओं ने “बस्तर ओलंपिक” में हिस्सा लिया।

जब गांव ने तय किया—अब बंदूक नहीं, विकास चाहिए…

तभी यह बदलाव संभव हुआ।

लेकिन कहानी यहीं पूरी नहीं होती—

कुछ नाम अब भी सूची में हैं…

कुछ कैडर सीमाओं के पार सक्रिय हैं…

और खतरे अब भी पूरी तरह खत्म नहीं हुए।

तो सवाल वही है—

क्या हमने सिर्फ बंदूक को हराया है…

या उस सोच को भी, जिसने बंदूक उठाई?

क्योंकि इतिहास कहता है—

जहां “गवर्नेंस” कमजोर पड़ता है…

वहीं “गन” फिर से ताकतवर हो जाती है।

और इसलिए—

यह अंत नहीं…

एक नए अध्याय की शुरुआत है।

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