साक्षी या संलग्न : आत्मा की उलझन


नरेन्द्र पाण्डेय : हम अपने-आप से एक सवाल पूछें—क्या हम देख रहे हैं, या फँसे हुए हैं?

सांख्य कहता है—यह ब्रह्मांड दो तत्वों से बना है: प्रकृति और पुरुष।
प्रकृति — जो बदलती है।
पुरुष — जो बस देखता है।
सवाल ये नहीं कि प्रकृति क्या कर रही है। सवाल यह है कि पुरुष कहाँ देखना छोड़ देता है और जुड़ जाना शुरू कर देता है।

प्रकृति की आदत है दोहराव की।
हर साल वसंत आता है, हर रात एक सवेरा लाती है।
हम भी वही हैं — वही मोह, वही क्रोध, वही चिंता, वही तृष्णा।
हम बदलते नहीं, हम घूमते हैं — एक ही वृत्त में, बार-बार।

अब रुकिए।
एक क्षण रुकिए और पूछिए: क्या आत्मा भी इस वृत्त का हिस्सा है?

उत्तर आसान नहीं है। लेकिन गहराई में उतरिए, तो उत्तर चीखता है — ‘नहीं!’

आत्मा इस नाटक की दर्शक है, पात्र नहीं।
वह है साक्षी — जो बस देखती है, टोकती नहीं, टकराती नहीं।

लेकिन दिक्कत यहीं से शुरू होती है।
जब यह आत्मा कहती है—"यह मेरा शरीर है",
जब यह मन के रोने पर कहती है—"मैं दुखी हूँ",
जब यह इंद्रियों की लोलुपता को "अपनी इच्छा" मान लेती है,
तो वह प्रकृति के जाल में फँस जाती है।

और तब शुरू होता है एक चक्र — न केवल पुनर्जन्म का,
बल्कि मनःस्थिति के प्रत्यावर्तन का

हमारा जीवन फिर एक थियेटर बन जाता है जहाँ हर दृश्य दोहराया जाता है:
वही मोहब्बत, वही जुदाई।
वही सपना, वही टूटन।
वही इच्छा, वही थकावट।
हम बदलते नहीं, बस रिपीट मोड पर जीते हैं।

यह वही जगह है जहाँ सांख्य दर्शन हमें झकझोरता है।
कहता है: "तू वह नहीं है जो दुःखी है।
तू वह है जो दुःख को देख रहा है।
तू दृश्य नहीं है, तू दृष्टा है।"

लेकिन दृष्टा होने के लिए साहस चाहिए।
अपना दुःख देखना आसान है, उससे असंग होना कठिन।
अपने सुख से विमुख होना, अपने गौरव से परे होना 
यह सब एक क्रांति है, जो भीतर घटती है।

यही है सांख्य की पुकार — ‘जागो!’
देखो, पर जुड़ो मत।
रहो, पर बहो मत।
जियो, पर जकड़ो मत।

आत्मा मुक्त है, लेकिन वह तब तक बँधी है जब तक वह स्वयं को पहचानती नहीं।
वह न अभिनेता है, न संवाद लेखक —
वह बस एक देखती हुई चेतना है, जो इस नाटक से ऊपर है।

और जब वह यह पहचान लेती है, तब न तो जन्म रहता है, न मरण —
बस एक साक्षी भाव रह जाता है, जो पूर्ण है, शांत है, और मुक्त है।

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