डॉ. नरेंद्र पाण्डेय : क्या भगवान गणेश विवाहित हैं? अगर यह सवाल आप दक्षिण भारत में पूछेंगे, तो संभव है जवाब मिले—गणपति ब्रह्मचारी हैं। यही सवाल उत्तर भारत में पूछिए, तो जवाब होगा—गणपति रिद्धि-सिद्धि के पति हैं।और बंगाल जाइए तो गणेश के पास आपको साड़ी में लिपटा केले का पौधा दिखाई देगा, जिसे लोकमान्यता में उनकी पत्नी ‘कोला बऊ’ कहा जाता है। तो फिर सही कौन है?
गणेश की पत्नी है या नहीं? शायद इस सवाल का सबसे सुंदर उत्तर यह है कि भारतीय परंपरा को समझने के लिए हमें हमेशा एक ही उत्तर की तलाश नहीं करनी चाहिए। क्योंकि यहां देवता एक हैं, लेकिन उन्हें देखने की दृष्टियां अनेक हैं। और शायद यही भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है।
गणेश चतुर्थी अब किसी एक क्षेत्र का त्योहार नहीं
भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को मनाई जाने वाली गणेश चतुर्थी आज महाराष्ट्र की सीमाओं से बहुत आगे निकल चुकी है। महाराष्ट्र के विशाल सार्वजनिक पंडालों से लेकर देश के छोटे-छोटे घरों तक गणपति उत्सव ने अपनी जगह बना ली है। लेकिन जैसे-जैसे गणपति की उपासना अलग-अलग क्षेत्रों में पहुंची, वैसे-वैसे उनके स्वरूप और उनसे जुड़ी मान्यताएं भी अलग-अलग रूपों में विकसित होती गईं। कहीं वे सिद्धिविनायक हैं। कहीं विघ्नहर्ता। कहीं बाल गणपति।कहीं महागणपति।कहीं गृहस्थ देवता। और कहीं ब्रह्मचारी। यह विरोधाभास नहीं है। यह परंपरा का विस्तार है।
दक्षिण भारत में ब्रह्मचारी गणपति
दक्षिण भारत की कई धार्मिक परंपराओं में गणपति को अविवाहित और ब्रह्मचारी माना जाता है। यहां उनका ब्रह्मचर्य केवल विवाह न करने का अर्थ नहीं रखता, बल्कि संयम, ज्ञान और आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक माना जाता है। इससे जुड़ी लोककथाओं में कहा जाता है कि गणेश अपनी माता पार्वती को आदर्श स्त्री मानते थे। उनका कहना था कि यदि उन्हें माता के समान कोई स्त्री मिलेगी तभी वे विवाह करेंगे। लेकिन ऐसी स्त्री उन्हें मिली ही नहीं।
एक दूसरी कथा इससे भी गहरी है। गणेश को यह बोध हुआ कि संसार की प्रत्येक स्त्री में आदिशक्ति और माता पार्वती का ही अंश है। फिर वे किसी स्त्री को अपनी पत्नी के रूप में कैसे देख सकते थे? इसी लोकपरंपरा का एक और विस्तार गणेश के भीतर मौजूद शक्ति के स्त्री रूप में प्रकट होने की कथा से जुड़ता है—विनायकी या गणेशिनी। तमिलनाडु के कन्याकुमारी जिले के सुचिंद्रम स्थित थानुमलयन स्वामी मंदिर में गणेश के इस दुर्लभ स्त्री स्वरूप की प्रतिमा का उल्लेख मिलता है। ध्यान देने वाली बात यह है कि ये कथाएं अलग-अलग लोक और धार्मिक परंपराओं से जुड़ी हैं। इन्हें एक सार्वभौमिक शास्त्रीय निष्कर्ष मानने के बजाय क्षेत्रीय आस्था की अभिव्यक्ति के रूप में देखना अधिक उचित है।
उत्तर भारत में गणपति—रिद्धि-सिद्धि के स्वामी
अब उत्तर भारत की ओर आइए। यहां गणपति की पहचान अक्सर ‘रिद्धि-सिद्धि दाता’ के रूप में होती है। कई चित्रों और प्रतिमाओं में उनके साथ दो स्त्री आकृतियां दिखाई देती हैं। पुराणिक परंपराओं में सिद्धि और बुद्धि के साथ गणेश के संबंध की कथाएं मिलती हैं। शिव पुराण से जुड़ी कथा में प्रजापति विश्वरूप की पुत्रियों सिद्धि और बुद्धि का विवाह गणेश से बताया जाता है। आगे चलकर लोकपरंपरा में यही भाव रिद्धि-सिद्धि और शुभ-लाभ के रूप में लोकप्रिय हुआ।
लेकिन यहां भी एक दिलचस्प बात है। क्या रिद्धि और सिद्धि केवल गणेश की पत्नियां हैं? या वे गणेश के गुणों का मानवीकरण भी हैं?
बुद्धि—विवेक और ज्ञान।
सिद्धि—उपलब्धि और सफलता।
रिद्धि—समृद्धि।
यानी संदेश यह भी हो सकता है कि जहां बुद्धि और विवेक हैं, वहां सफलता और समृद्धि का रास्ता खुलता है। इसलिए गणेश का गृहस्थ रूप केवल पारिवारिक कथा नहीं, बल्कि जीवन के संतुलन का प्रतीक भी बन जाता है।
महाराष्ट्र में गणपति—भक्ति से लोकशक्ति तक
महाराष्ट्र में गणेश उपासना की अपनी विशिष्ट परंपरा है। अष्टविनायक से लेकर सार्वजनिक गणेशोत्सव तक गणपति यहां धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक जीवन का भी हिस्सा हैं। मोरगांव के मयूरेश्वर सहित अष्टविनायक परंपरा में गणपति के अलग-अलग स्वरूप दिखाई देते हैं। यही कारण है कि गणेश को केवल दो खानों में बांटना—विवाहित या अविवाहित—भारतीय परंपरा की जटिलता को बहुत छोटा कर देना होगा। क्योंकि मंदिर बदलते हैं, आख्यान बदलते हैं, संप्रदाय बदलते हैं और उनके साथ प्रतीकों के अर्थ भी बदलते हैं।
बंगाल में ‘कोला बऊ’—क्या गणेश की पत्नी?
अब बंगाल की दुर्गा पूजा देखिए। गणेश के पास साड़ी में लिपटा हुआ केले का पौधा दिखाई देता है। इसे कहा जाता है—कोला बऊ। लोकप्रिय धारणा में इसे गणेश की पत्नी कहा जाता है।
लेकिन धार्मिक परंपरा को थोड़ा गहराई से देखें तो कहानी अलग है। कोला बऊ वास्तव में नवपत्रिका पूजा का हिस्सा हैं, जिसमें नौ प्रकार की वनस्पतियों को एक साथ बांधकर देवी शक्ति के स्वरूप में पूजा की जाती है। दुर्गा पूजा के मंडप में इसे गणेश के पास स्थापित किए जाने से लोकमान्यता में यह गणेश की पत्नी के रूप में भी समझा जाने लगा। यह उदाहरण बताता है कि—
शास्त्र का प्रतीक और लोक की व्याख्या हमेशा एक जैसी नहीं होती। और भारतीय धार्मिक परंपरा में दोनों समानांतर चलते रहे हैं।
गणपति का रहस्यमय तांत्रिक स्वरूप
अब गणेश के एक बिल्कुल अलग रूप की ओर चलिए। तांत्रिक और शाक्त परंपराओं में गणपति केवल हाथ में मोदक लिए मंगलकर्ता देवता नहीं हैं। यहां उनके अनेक शक्ति-संयुक्त स्वरूप मिलते हैं।
उच्छिष्ट गणपति, महागणपति, ऊर्ध्व गणपति, पिंगल गणपति और लक्ष्मी गणपति जैसे रूपों का उल्लेख तांत्रिक परंपराओं में मिलता है। कुछ स्वरूपों में गणपति अपनी शक्ति के साथ दिखाई देते हैं। इसे सामान्य पति-पत्नी के संबंध के रूप में समझना ठीक नहीं होगा। तांत्रिक दर्शन में शक्ति सक्रिय ऊर्जा, सृजन और सामर्थ्य का प्रतीक है। अर्थात यहां गणपति और शक्ति का संबंध एक गहरे दार्शनिक अर्थ को व्यक्त करता है। यही वह बिंदु है जहां गणेश केवल एक देवता नहीं रहते, बल्कि अलग-अलग दार्शनिक परंपराओं में अलग-अलग आध्यात्मिक अवधारणाओं के प्रतीक बन जाते हैं।
गाणपत्य परंपरा—जब गणेश ही परम सत्ता बने
इतिहास में एक समय ऐसा भी आया जब गाणपत्य संप्रदाय ने गणपति को सर्वोच्च आराध्य के रूप में प्रतिष्ठित किया। यहां गणेश केवल शिव-पार्वती के पुत्र नहीं थे। वे स्वयं परम सत्ता थे। उनकी उपासना, मंत्र और स्वरूप को लेकर अलग-अलग धाराएं विकसित हुईं। यह इतिहास हमें बताता है कि भारतीय धार्मिक परंपरा कभी एक ही व्याख्या में स्थिर नहीं रही। उसने प्रश्न पूछे। प्रतीकों की नई व्याख्या की। नई उपासना पद्धतियां विकसित कीं। और पुराने देवताओं को नए दार्शनिक अर्थ दिए।
तो फिर ‘सही’ गणेश कौन हैं?
दक्षिण कहता है—ब्रह्मचारी गणपति। उत्तर भारत कहता है—रिद्धि-सिद्धि के पति। बंगाल में वे देवी परिवार का हिस्सा हैं। तांत्रिक परंपरा में वे शक्ति-संयुक्त महागणपति हैं। गाणपत्य परंपरा में वे स्वयं परम तत्व हैं। तो इनमें सही कौन है? शायद सवाल ही गलत है। क्योंकि भारतीय परंपरा में ईश्वर को एक ही खांचे में बंद करने की कोशिश नहीं की गई। एक ही गणेश किसी के लिए बालक हैं, किसी के लिए गुरु, किसी के लिए विघ्नहर्ता, किसी के लिए समृद्धि के दाता और किसी के लिए परम ब्रह्म।
गणेश चतुर्थी का असली संदेश
गणेश चतुर्थी इसलिए सिर्फ मूर्ति स्थापना और विसर्जन का त्योहार नहीं है। यह हमें भारतीय समाज की एक बहुत गहरी विशेषता भी दिखाता है— विविधता में एकता। हमारे यहां एक ही देवता के अलग-अलग रूप हो सकते हैं। अलग-अलग कथाएं हो सकती हैं। अलग-अलग पूजा पद्धतियां हो सकती हैं। लेकिन आस्था का केंद्र एक रह सकता है। शायद इसीलिए गणेश का नाम किसी भी शुभ कार्य से पहले लिया जाता है। क्योंकि गणेश केवल विघ्न हटाने वाले देवता नहीं हैं। वे हमें यह भी सिखाते हैं कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए सबसे पहले बुद्धि चाहिए, विवेक चाहिए और अलग-अलग रास्तों को स्वीकार करने की क्षमता चाहिए। और शायद गणेश की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है— वे एक हैं, लेकिन उनके अर्थ अनेक हैं।
यही अनेकता उन्हें कमजोर नहीं करती। बल्कि और व्यापक बनाती है। इसलिए इस गणेश चतुर्थी पर शायद हमें यह सवाल नहीं पूछना चाहिए कि— “गणेश की सही मान्यता कौन-सी है?” बल्कि यह पूछना चाहिए— “क्या हम गणेश की तरह अलग-अलग मान्यताओं, विचारों और परंपराओं को साथ लेकर चलना सीख सकते हैं?” क्योंकि गणेशोत्सव की असली शक्ति शायद मूर्ति में नहीं… उस विचार में है, जो अलग-अलग रास्तों को एक ही आस्था के भीतर जगह देता है ।