लाईफ वर्सिटी विशेष ( डॉ नरेन्द्र पाण्डेय ) : नवरात्रि में कन्या पूजन क्यों किया जाता है ? कन्या को देवी मानकर उसके चरण क्यों धोये जाते है ? हम माँ दुर्गा और माँ काली की पूजा करते हैं। फिर एक छोटी-सी कन्या के चरण धोते हैं, उसे भोजन कराते हैं और उसका आशीर्वाद लेते हैं। आखिर क्यों? योगनी तंत्र में श्लोक है
सर्वविद्यास्वरूपा हि कुमारी नात्र संशयः।
एका हि पूजिता बाला सर्वं हि पूजितं भवेत्॥ [1]
अर्थात—कुमारी (कन्या) साक्षात सभी विद्याओं का स्वरूप है, इसमें कोई संदेह नहीं है। यदि केवल एक भी कन्या (बालिका) का पूजन और सत्कार किया जाए, तो वह ब्रह्मांड के समस्त देवी-देवताओं के पूजन के समान होता है। क्योंकि सनातन परंपरा केवल मूर्ति में शक्ति देखने की शिक्षा नहीं देती, बल्कि जीवन में शक्ति को पहचानने का संदेश भी देती है। कुमारी पूजन के पीछे महाकाली के कन्या रूप में प्रकट होने की एक अद्भुत कथा प्रचलित है।
कथा के अनुसार, एक बार माता पार्वती ने भगवान शिव से पूछा कि जगतजननी महाकाली को कन्या रूप में प्रकट होने की आवश्यकता क्यों पड़ी? भगवान शिव ने कोलासुर के वध की कथा सुनाई।
“शृणु देवि प्रवक्ष्यामि कोलासुरनिपातनम्।
महाकाली प्रसंगेन वृत्तान्तमिदमद्भुतम्॥”
कथा के अनुसार भगवान विष्णु की तपस्या से प्रसन्न होकर महाकाली ने उनके हृदय-कमल से कोलासुर नामक महादैत्य को उत्पन्न हुआ । समय के साथ कोलासुर अत्यंत शक्तिशाली हो गया। उसने देवताओं को पराजित कर तीनों लोकों में आतंक फैला दिया। जब देवता उसके अत्याचारों से परेशान हो गए, तब वे भगवान विष्णु और ब्रह्मा के साथ आदिशक्ति माँ काली की शरण में पहुँचे। उन्होंने प्रार्थना की— “हे माता! हमारी रक्षा कीजिए।”
“ततो विष्ण्वादयो देवा कालीं गत्वा सनातनीम्।
तुष्टुवुर्भक्तियोगेन रक्ष रक्षेति वन्दनम्॥”
देवताओं की प्रार्थना सुनकर माँ काली ने उन्हें आश्वासन दिया कि वे कोलासुर का अंत करेंगी। लेकिन इस बार उन्होंने भयंकर रूप धारण करने के बजाय एक छोटी-सी कन्या का स्वरूप अपनाया।
कन्या रूप में माता कोलासुर की नगरी पहुँचीं और उससे भोजन माँगा।
“ततः काली करालास्या द्विजकन्या स्वरूपतः।
गत्वा कोलापुरं देवी कोलासुरसमीपतः॥”
कोलासुर ने उस बालिका को साधारण और असहाय समझकर भोजन परोसा। कन्या भोजन करती गईं, लेकिन उनकी भूख शांत नहीं हुई। अब कोलासुर आश्चर्यचकित होने लगा। आखिर इस छोटी-सी कन्या की भूख का अंत क्यों नहीं हो रहा था? अंततः माता ने अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट किया। वह कोई साधारण बालिका नहीं, स्वयं महाकाली थीं। उन्होंने कोलासुर और उसकी सेना का संहार कर दिया। कथा का संदेश स्पष्ट है—शक्ति हमेशा विराट और भयंकर रूप में ही प्रकट नहीं होती। कभी वह एक मासूम कन्या के रूप में भी हमारे सामने होती है।
कोलासुर के वध के बाद देवताओं ने उसी कन्या रूप में प्रकट हुई देवी की पूजा की।
“पूजिता तु कुमारी सा कुसुमैर्नन्दनोद्भवैः।
सर्वलोके पूजिता च कुमारी सा दिने दिने॥”
अर्थात— देवताओं ने उस कुमारी रूप वाली देवी की पुष्पों से पूजा की और यहीं से कुमारी पूजन के शुरुआत को समझा जा सकता है।
यही भाव माँ दुर्गा की महिषासुरमर्दिनी कथा में भी दिखाई देता है। जब महिषासुर के अत्याचारों से देवता और तीनों लोक परेशान हो उठे, तब देवताओं की सामूहिक तेजस्विता से आदिशक्ति का प्राकट्य हुआ। देवी ने महिषासुर का वध कर संसार को उसके आतंक से मुक्त कराया। एक ओर महाकाली कन्या रूप में कोलासुर का अंत करती हैं, तो दूसरी ओर माँ दुर्गा महिषासुर का संहार करती हैं। दोनों कथाएँ हमें एक ही बात समझाती हैं—शक्ति को उसके बाहरी रूप से नहीं आँकना चाहिए।
कुमारी का अर्थ केवल छोटी उम्र या अविवाहित होना नहीं, बल्कि पवित्रता, स्वतंत्रता, निर्भयता और असीम संभावनाओं का भी प्रतीक है। यही कारण है कि कुमारी पूजन में बालिका के भीतर उस दिव्य शक्ति का दर्शन किया जाता है, जिसे हम माँ दुर्गा, माँ काली और अन्य देवी-स्वरूपों में पूजते हैं। यही कारण है कि नवरात्रि में कन्या पूजन के माध्यम से बालिका में देवी शक्ति का दर्शन किया जाता है। कुमारी पूजन में कन्या को भोजन कराना, उपहार देना और उसके चरणों में श्रद्धा व्यक्त करना हमारी सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा है। लेकिन क्या केवल इतना करना ही कुमारी पूजन है? शायद नहीं।
अब शुरुआत में पढ़े गए श्लोक को फिर याद कीजिए— “एका हि पूजिता बाला सर्वेषां पूजितं भवेत्।” अर्थात— एक कुमारी की पूजा में सभी देवी-स्वरूपों की पूजा का भाव माना गया है। क्यों? क्योंकि शक्ति एक है— उसके रूप अनेक हैं। दुर्गा, काली, लक्ष्मी, सरस्वती—इन सभी में जिस दिव्य शक्ति का दर्शन किया जाता है, उसी शक्ति का एक जीवंत प्रतीक कुमारी कन्या भी है।
श्लोक में बाला शब्द का अर्थ समझिये सनातन परंपरा में बाला को शक्ति, सृजन और सामर्थ्य के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है। आयुर्वेदिक परंपरा में भी ‘बाला’ शब्द का संबंध बलवर्धक भाव से जोड़ा गया है। यही कारण है कि कुमारी पूजन में खीर जैसे पोषक और सात्त्विक भोजन का विशेष महत्व माना जाता है। लेकिन क्या केवल पैर धोना ही कुमारी पूजन है?
एक छोटी-सी कन्या के भीतर भविष्य की अनगिनत संभावनाएँ छिपी होती हैं। हमारे सामने बैठी वह छोटी-सी बालिका ही आगे चलकर माँ बन सकती है। डॉक्टर, शिक्षिका, वैज्ञानिक, अधिकारी, उद्यमी या समाज को नई दिशा देने वाली व्यक्तित्व बन सकती है। इसलिए किसी कन्या को कमजोर समझना केवल उसके वर्तमान को छोटा समझना नहीं, बल्कि उसके भीतर छिपे भविष्य को भी छोटा समझना है।
भगवान शिव के कथन के रूप में एक और भाव मिलता है— “कुमारी पूज्यते यत्र स देशः क्षितिपावनः।” अर्थात—
जहाँ कुमारी की पूजा और सम्मान होता है, वह स्थान पवित्र माना जाता है। इसका व्यापक भाव यह है कि जिस समाज में कन्या का सम्मान होता है, वहाँ जीवन, सृजन और मानवीय गरिमा के प्रति सम्मान की भावना भी मजबूत होती है।
अब जरा सोचिए—यदि हम नवरात्रि में कन्या के सामने सिर झुकाते हैं, लेकिन नवरात्रि के बाद उसी कन्या के सम्मान, सुरक्षा और स्वतंत्रता के प्रति उदासीन हो जाते हैं, तो हमारी पूजा का वास्तविक अर्थ क्या रह जाता है? क्या हम पूरे वर्ष कन्याओं का सम्मान करते हैं? देवी की आराधना तभी सार्थक होगी, जब हमारे व्यवहार में भी सम्मान, संवेदना और समानता दिखाई देगी।
महाकाली की कथा हमें याद दिलाती है कि किसी को उसके बाहरी रूप, उम्र या परिस्थिति के आधार पर कमजोर नहीं समझना चाहिए। जिसके भीतर संसार को बदलने की शक्ति हो सकती है, उसे पहचानने के लिए केवल आँखें नहीं, संवेदनशील दृष्टि भी चाहिए। इसलिए अगली बार जब आपके घर कुमारी पूजन हो, तो कन्या के सामने केवल परंपरा निभाने के लिए सिर मत झुकाइए। इस भाव से झुकाइए कि जिस शक्ति को हम माँ दुर्गा और माँ महाकाली के रूप में पूजते हैं, उसका सम्मान हर कन्या की गरिमा, स्वतंत्रता और अधिकारों के सम्मान में भी दिखाई देना चाहिए। क्योंकि कन्या का सम्मान केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि हमारी मानवीय संवेदना की पहचान है।
क्योंकि शक्ति हमेशा सिंह पर सवार माँ दुर्गा या प्रचंड महाकाली के रूप में ही दिखाई दे, यह जरूरी नहीं। कभी वही शक्ति मासूम आँखों वाली एक छोटी-सी कन्या के रूप में भी हमारे सामने होती है।
कन्या का सम्मान, शक्ति का सम्मान है। नारी का सम्मान, हमारी संस्कृति के मूल भाव का सम्मान है। और यही है महामाया भगवती की आराधना तथा कुमारी पूजन का वास्तविक संदेश।
साभार : औघड़ पवनराम जी (पवनानंद नाथ ) ,
श्री श्री महाकाली दस महाविद्या शक्ति पीठ , आर्य नगर , दुर्ग (छग )