नरेन्द्र पाण्डेय : जरा एक क्षण के लिए गणेश को देखिए लेकिन इस बार श्रद्धा से नहीं एक सवाल की तरह। सोचिये अगर किसी देवता की मूर्ति बनानी थी, तो उसे ऐसा क्यों बनाया गया ? आखिर हाथी का सिर क्यों? मनुष्य का शरीर क्यों? पेट इतना बड़ा क्यों? एक दांत पूरा और दूसरा टूटा हुआ क्यों? कान इतने बड़े क्यों? और सबसे बड़ा सवाल— इतने विराट गणेश की सवारी एक छोटा-सा चूहा क्यों? क्या यह केवल एक पौराणिक कल्पना है? या फिर हमारे पूर्वजों ने मानव जीवन और चेतना का कोई ऐसा रहस्य इन प्रतीकों में छिपा दिया है, जिसे हम हजारों वर्षों से पूज तो रहे हैं लेकिन समझ नहीं पाए?
जिस क्षण आप गणेश की देह को समझना शुरू करोगे, हो सकता है उसी क्षण आपको यह एहसास हो जाए कि— गणेश की यह मूर्ति बाहर बैठे किसी देवता की कहानी नहीं कह रही… यह आपके भीतर छिपे एक ऐसे रहस्य की ओर इशारा कर रही है, जिससे आप जन्म से लेकर मृत्यु तक भागते रहते हो।
शायद गणेश को समझने के लिए उनकी कथा सुनना पर्याप्त नहीं है। हमें उनकी देह को पढ़ना होगा। क्योंकि गणेश की यह देह सिर्फ शरीर नहीं है यह एक संदेश है। एक प्रतीक है। एक पूरा आध्यात्मिक दर्शन है। और जैसे-जैसे हम गणेश के एक-एक अंग के भीतर उतरेंगे, शायद हमें पता चलेगा कि जिस गणेश को हम अपने घर में स्थापित करते हैं… वह वास्तव में हमारे भीतर ही किसी ऐसी संभावना का प्रतीक है, जिसे हमने अभी तक जगाया नहीं है। सबसे पहले उस हाथी के सिर को देखिए। मनुष्य का सिर हटाकर हाथी का सिर क्यों?
कथा कहती है कि शिव ने क्रोध में गणेश का सिर काट दिया और बाद में उनके धड़ पर हाथी का सिर लगाया गया। लेकिन अध्यात्म कथा के पीछे छिपे संकेत को देखता है। सिर बदलना यानी चेतना बदलना। पुराना सिर किसका था? सीमित 'मैं' का। अहंकार का। जिद का। अपनी ही धारणाओं में बंद मन का।
और हाथी का सिर? विशालता का प्रतीक। धैर्य का प्रतीक। गंभीरता का प्रतीक। मानो गणेश कह रहे हों— जब तक आपकी सोच छोटी है, आपकी दुनिया भी छोटी है। चेतना को बड़ा करो दृष्टि अपने आप बड़ी हो जाएगी। अब उनकी आंखों को देखिए। आंखें छोटी लेकिन कान इतने बड़े! यह कैसी विचित्र बनावट है? शायद संदेश बिल्कुल स्पष्ट है— देखो कम समझो गहरा और सुनो अधिक। क्योंकि जीवन में हम सुनते कम हैं, उत्तर देने की तैयारी ज्यादा करते हैं। लेकिन ध्यान वहीं शुरू होता है जहां सुनने की क्षमता पैदा होती है। अपने भीतर की आवाज सुनना अपने अंतर्मन की हलचल सुनना और उस मौन को सुनना जिसमें अस्तित्व स्वयं बोलता है।
अब आइए उनकी सूंड पर। यह भी अद्भुत है। वही सूंड जो विशाल वृक्ष को उखाड़ सकती है और एक छोटी-सी वस्तु को भी उठा सकती है। शक्ति और कोमलता—एक साथ। यही तो साधना है। इतने शक्तिशाली बनो कि संसार की कठिनाइयों का सामना कर सको लेकिन इतने संवेदनशील भी रहो कि किसी के आंसू तुम्हारे भीतर उतर सकें। फिर देखिए— गणेश का बड़ा पेट। लोग इसे देखकर मुस्कुराते हैं। लेकिन क्या कभी सोचा है कि इस पेट को इतना बड़ा क्यों दिखाया गया? क्योंकि जीवन केवल भोजन से नहीं भरता… जीवन हमें अनुभवों से भरता है। कभी प्रशंसा मिलती है,
कभी अपमान। कभी सफलता, कभी असफलता। कभी प्रेम, कभी वियोग। गणेश का बड़ा पेट मानो कहता है— जीवन में जो आए, उसे पचाना सीखो। सुख को भी और दुख को भी। क्योंकि आध्यात्मिक व्यक्ति वह नहीं जिसके जीवन में समस्याएं नहीं आतीं। आध्यात्मिक व्यक्ति वह है जो समस्याओं को अपने भीतर विष बनने नहीं देता।
अब देखिए— एक दांत पूरा है और दूसरा टूटा हुआ। यह अधूरापन क्यों? एकदंत - एक ओर यह त्याग की कथा कहता है, तो दूसरी ओर एक बहुत गहरी बात— द्वैत से अद्वैत की यात्रा। सुख और दुख। अच्छा और बुरा। अपना और पराया। राग और द्वेष। जब तक मन इन दो ध्रुवों में बंटा है, तब तक भीतर संघर्ष चलता रहेगा। लेकिन जब साधक साक्षी बनना सीखता है, तो धीरे-धीरे द्वंद्व के पार जाने लगता है।
और अब उस सबसे छोटे अंग पर आइए— मूषक। इतना विराट शरीर… और वाहन इतना छोटा! यही शायद गणेश के स्वरूप का सबसे बड़ा रहस्य है। मूषक हमारे मन की तरह है। छोटा दिखाई देता है, लेकिन भीतर-ही-भीतर बहुत कुछ कुतरता रहता है। इच्छाएं… वासना… भय… लालच… अहंकार…
जब मन आपको चलाता है, तो आप उसके गुलाम हो। लेकिन जब गणेश उसी मूषक पर सवार होते हैं, तो प्रतीक बदल जाता है— मन अब आपका स्वामी नहीं… आप मन के स्वामी हो। और शायद यहीं से गणेश की पूरी साधना शुरू होती है। क्योंकि गणेश बाहर बैठा कोई देवता मात्र नहीं हैं। गणेश वह चेतना हैं जो हमारे भीतर जाग सकती है।
इसलिए गणेश चतुर्थी पर जब हम उनकी मूर्ति घर लाते हैं, तो सवाल यह नहीं होना चाहिए कि हमने कितनी सुंदर मूर्ति स्थापित की। सवाल यह होना चाहिए— क्या हमने अपने भीतर भी कुछ स्थापित किया? क्या अपनी सोच को विशाल किया? क्या सुनना सीखा? क्या अपने मन को साधा? क्या सुख-दुख को पचाना सीखा? क्या अपने अहंकार का कुछ हिस्सा तोड़ा? और जब विसर्जन का समय आए… तो क्या केवल मिट्टी की मूर्ति जल में जाएगी? या उसके साथ हमारे भीतर का थोड़ा-सा अहंकार भी विसर्जित होगा?
क्योंकि गणेश चतुर्थी की सबसे बड़ी साधना मूर्ति को घर लाना नहीं है। मूर्ति के भीतर छिपे संदेश को अपने जीवन में उतारना है। जिस दिन यह समझ आ गया… उस दिन गणेश की मूर्ति सिर्फ पूजा की वस्तु नहीं रहेगी। वह आपका दर्पण बन जाएगी। और आप जब गणेश को देखोगे, तो शायद पहली बार किसी देवता को नहीं… अपने भीतर जागने की प्रतीक्षा कर रही अपनी ही चेतना को देखोगे।