नरेन्द्र पाण्डेय , लाईफ वर्सिटी : बारिश का मौसम है। धरती में नमी है। खेतों में जीवन लौट रहा है। इसी समय सांप अपने प्राकृतिक आवासों से बाहर दिखाई देने लगते हैं। किसान के लिए सांप कभी भय का कारण रहा, तो कभी खेतों के पारिस्थितिक संतुलन का महत्वपूर्ण हिस्सा। यहीं से हमारी परंपरा ने एक अद्भुत संदेश दिया— जिससे डरते हो, उसे केवल मारो मत... उसे समझो।
सांप खाद्य श्रृंखला का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और कई प्रजातियां चूहों जैसे कृंतकों की संख्या नियंत्रित करने में भूमिका निभाती हैं। खेतों में चूहों की अधिकता फसल के लिए नुकसानदेह हो सकती है।
इसलिए नागपंचमी को आधुनिक भाषा में देखें तो यह मानव और वन्यजीवन के सह-अस्तित्व का संदेश भी देती है।
आज जब शहर फैल रहे हैं, जंगल सिकुड़ रहे हैं और वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास प्रभावित हो रहा है, तब नागपंचमी हमें एक महत्वपूर्ण सवाल पूछती है— क्या प्रकृति केवल वही है जिसका उपयोग मनुष्य कर सकता है? भारतीय दृष्टि कहती है—नहीं।नदी पूजनीय है। पर्वत पूजनीय है। वृक्ष पूजनीय है। पशु-पक्षी पूजनीय हैं। क्योंकि जिस प्रकृति को हम पूजते हैं, उसे नष्ट करने से पहले शायद हम दो बार सोचेंगे।
भारतीय पुराणों में नागों का संबंध अनेक देवताओं और कथाओं से मिलता है। भगवान शिव के गले में नाग हैं। भगवान विष्णु शेषनाग पर विराजमान हैं। समुद्र मंथन की कथा में वासुकी नाग का महत्वपूर्ण स्थान है। इन कथाओं को केवल घटनाओं के रूप में पढ़ने के बजाय इनके प्रतीकात्मक अर्थ को भी समझा जा सकता है। शेषनाग को अनंतता से जोड़ा जाता है। वासुकी शक्ति और सामूहिक प्रयास की कथा से जुड़ते हैं। और शिव के गले का नाग भय और विष पर नियंत्रण का प्रतीक बन जाता है।
यानी नाग केवल एक जीव नहीं रह जाता—वह भारतीय चिंतन में ऊर्जा, शक्ति, समय, भय और परिवर्तन का प्रतीक बन जाता है।
योग परंपरा में कुंडलिनी को सर्पाकार ऊर्जा के रूप में समझाया गया है। यहां नाग एक अद्भुत प्रतीक बन जाता है।सर्प कुंडली मारकर बैठा है—जैसे मनुष्य के भीतर ऊर्जा सुप्त है। और जब वही ऊर्जा ऊपर उठती है, तो योग परंपरा इसे चेतना के जागरण से जोड़ती है। इसका आधुनिक अर्थ क्या हो सकता है?आज हमारा शरीर जाग रहा है, लेकिन हमारा मन लगातार उत्तेजना में है।
मोबाइल नोटिफिकेशन, सोशल मीडिया, लगातार स्क्रीन, काम का दबाव, प्रतिस्पर्धा और सूचना की बाढ़ ने हमारे मन को आराम देना लगभग बंद कर दिया है। हम बाहर से connected हैं, लेकिन भीतर से disconnected होते जा रहे हैं। नागपंचमी ऐसे समय में हमें भीतर लौटने का अवसर देती है।
अपने डर को देखो।
अपने क्रोध को देखो।
अपनी इच्छाओं को देखो।
अपने भीतर की ऊर्जा को पहचानो।
यही आध्यात्मिकता की शुरुआत है।
सर्प के साथ सबसे मजबूत शब्द जुड़ा है—विष। लेकिन आज हमारे जीवन में भी कई तरह के विष हैं। क्रोध का विष। ईर्ष्या का विष। अहंकार का विष। नकारात्मक सोच का विष। और आज के डिजिटल युग में—घृणा और ट्रोलिंग का विष।
सोशल मीडिया पर एक टिप्पणी किसी व्यक्ति के मन में घंटों नहीं, कई दिनों तक विष घोल सकती है। इसलिए नागपंचमी का आधुनिक संदेश यह भी हो सकता है— विष बाहर नहीं, पहले भीतर पहचानिए।
भगवान शिव के गले में नाग और नीलकंठ का दर्शन इसी संदर्भ में बेहद शक्तिशाली प्रतीक बन जाता है। जीवन में विष आएगा। प्रश्न यह नहीं कि विष आएगा या नहीं। प्रश्न यह है— क्या हम उसे अपने भीतर फैलने देंगे?
यहां एक जरूरी बात भी समझनी होगी। परंपरा का सम्मान करते हुए हमें अंधविश्वास से बचना चाहिए।सांपों की पूजा का अर्थ यह नहीं कि उन्हें पकड़कर परेशान किया जाए, उनके साथ प्रदर्शन किया जाए या उन्हें दूध पिलाया जाए। अधिकांश सांप दूध पीने वाले जीव नहीं हैं और उन्हें पकड़ना उनके लिए तथा मनुष्यों दोनों के लिए जोखिमपूर्ण हो सकता है। आज की नागपंचमी का सबसे सुंदर रूप यह हो सकता है कि— सांप को पकड़कर पूजा करने के बजाय उसके प्राकृतिक आवास को बचाया जाए। किसी सांप को देखकर उसे मारने के बजाय प्रशिक्षित रेस्क्यू टीम या वन विभाग की सहायता ली जाए। यही तो परंपरा और आधुनिकता का वास्तविक समन्वय है। भावना पुरानी रह सकती है, लेकिन व्यवहार वैज्ञानिक होना चाहिए।
धरती पर हर जीव का अपना स्थान है। हमारे भीतर हर भावना का अपना अर्थ है। और हमारी चेतना में परिवर्तन की अपार संभावना है। नाग को केवल बाहर मत खोजिए... उस प्रतीक को अपने भीतर भी पहचानिए। क्योंकि असली नागपंचमी शायद उस दिन होगी, जब हम प्रकृति के साथ भी संतुलन बना लें और अपने भीतर की ऊर्जा के साथ भी।