नरेन्द्र पाण्डेय : एक वायरल वीडियो ने सिर्फ एक घटना नहीं दिखाई, उसने समाज और सिस्टम के सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
जमुई की सड़क पर 19 सितंबर की शाम दो नाबालिग छात्र-छात्राएं थे। सामने कुछ युवक थे। फिर एक घेरा बना… रास्ता बंद हुआ… लड़की मदद की गुहार लगाती रही और लड़के के साथ भी कथित तौर पर मारपीट हुई। कुछ मिनटों की यह घटना अब सोशल मीडिया पर है। पुलिस तक पहुंची। FIR हुई। SIT बनी। तीन आरोपियों की गिरफ्तारी की जानकारी सामने आई है। बाकी की भूमिका की जांच जारी है।
लेकिन इस पूरी घटना का सबसे बड़ा सवाल शायद यह नहीं है कि कितने लोग गिरफ्तार हुए? सवाल इससे पहले का है— अगर उस घटना का वीडियो नहीं बनता, अगर वह वीडियो वायरल नहीं होता, तो क्या पुलिस तक यह मामला इतनी जल्दी पहुंचता?
जब कानून से पहले कैमरा गवाह बन जाए
आज का समाज कैमरों से घिरा हुआ है। मोबाइल फोन हर हाथ में है। सड़क, बाजार, स्कूल, कॉलेज—हर जगह कोई न कोई कैमरा मौजूद है।
लेकिन क्या हमारी सुरक्षा व्यवस्था इतनी ही मजबूत है कि अपराध होने से पहले उसे रोक सके? जमुई की घटना में पुलिस ने वायरल वीडियो सामने आने के बाद कार्रवाई की। पुलिस ने दोनों नाबालिगों की पहचान की, उनके बयान दर्ज किए और FIR दर्ज की। मामले में POCSO और BNS की धाराओं के तहत कार्रवाई की जानकारी सामने आई है। तीन आरोपियों की गिरफ्तारी भी हुई है। यह कार्रवाई जरूरी है। लेकिन इससे एक दूसरा सवाल भी पैदा होता है— क्या हमारी व्यवस्था अभी भी घटना के बाद जागने वाली व्यवस्था है?
लड़की की गलती क्या थी?
इस घटना को केवल “छेड़खानी” या “बदसलूकी” जैसे शब्दों में सीमित कर देना शायद इसके सामाजिक अर्थ को छोटा कर देगा।
क्योंकि यहां दो नाबालिग बच्चे थे। वे कहां गए थे, क्यों गए थे, किसके साथ गए थे—इन सवालों से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि किसी भी व्यक्ति को उन्हें रोकने, घेरने, अपमानित करने या उनके शरीर को उनकी इच्छा के विरुद्ध छूने का अधिकार किसने दिया?
किसी लड़की का कपड़ा, उसका दोस्त, उसका बाहर निकलना या उसका किसी जगह जाना—इनमें से कोई भी चीज किसी दूसरे व्यक्ति को उसके साथ दुर्व्यवहार का अधिकार नहीं देती।
सुरक्षा का मतलब यह नहीं कि लड़कियों की आजादी कम कर दी जाए। सुरक्षा का मतलब है कि अपराध करने वाले की आजादी पर कानून की सीमा हो।
असली परीक्षा अब शुरू होती है
तीन गिरफ्तारियां हो चुकी हैं। SIT जांच कर रही है। वीडियो में दिखाई देने वाले अन्य लोगों की भूमिका भी जांच के दायरे में है। पुलिस यह भी देख रही है कि वीडियो किसने बनाया और सोशल मीडिया पर कैसे पहुंचा।
लेकिन किसी भी मामले में गिरफ्तारी अंतिम न्याय नहीं होती।
अब जांच को यह तय करना होगा कि—
- घटना में कौन-कौन शामिल था?
- प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका क्या थी?
- किसने वीडियो बनाया?
- किसने उसे प्रसारित किया?
- क्या वीडियो से छेड़छाड़ हुई है या नहीं?
- पीड़ितों के साथ वास्तव में क्या हुआ?
- और कानून की कौन-कौन सी धाराएं प्रत्येक आरोपी पर लागू होती हैं?
इन सवालों का जवाब जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही सामने आएगा।
और एक सवाल सोशल मीडिया से भी
इस घटना का वीडियो वायरल हुआ और उसी वीडियो ने पुलिस को कार्रवाई तक पहुंचने में मदद की। लेकिन यहीं सोशल मीडिया की दूसरी जिम्मेदारी शुरू होती है। नाबालिग पीड़ितों का वीडियो वायरल करना न्याय नहीं है।
वीडियो को बार-बार शेयर करना, चेहरा दिखाना या पहचान बताने की कोशिश करना पीड़ितों के लिए दूसरी तरह की परेशानी पैदा कर सकता है। पुलिस और राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी संवेदनशील वीडियो को आगे प्रसारित न करने और पीड़ितों की निजता की रक्षा करने पर जोर दिया है। हमें अपराध का विरोध करना है— पीड़ित की पहचान का प्रचार नहीं।
समाज का आईना है यह घटना
जमुई की घटना को केवल बिहार की कानून-व्यवस्था के सवाल के रूप में देखना आसान है। लेकिन समस्या उससे बड़ी है।
जब कुछ युवक सड़क पर किसी लड़की को घेरते हैं और बाकी लोग तमाशबीन बने रहते हैं, तब सवाल केवल अपराधियों का नहीं होता। सवाल उस मानसिकता का होता है जो किसी लड़की को अपनी संपत्ति समझती है। सवाल उस भीड़ का होता है जो गलत होते हुए भी चुप रहती है। सवाल उस व्यवस्था का होता है जो कई बार शिकायत के बाद सक्रिय होती है। और सवाल हम सबका भी है—
क्या हम ऐसी घटनाओं को रोकने वाला समाज बन रहे हैं या केवल उनका वीडियो देखकर नाराज होने वाला समाज? जमुई में पुलिस की कार्रवाई आगे बढ़ रही है। गिरफ्तारियां हुई हैं और जांच जारी है। अब जरूरत सिर्फ आरोपियों तक पहुंचने की नहीं है।
जरूरत उस संदेश को मजबूत करने की है कि— सड़क किसी की जागीर नहीं। किसी लड़की का शरीर किसी की संपत्ति नहीं।
और किसी नाबालिग की मजबूरी किसी भीड़ के मनोरंजन का विषय नहीं।
क्योंकि किसी अपराध का सबसे खतरनाक हिस्सा सिर्फ अपराध नहीं होता। कभी-कभी उससे भी खतरनाक होता है—
उसे देखकर चुप रह जाना।