डीएसपी कल्पना वर्मा को कौन बचा रहा है


नरेन्द्र पाण्डेय : रायपुर के चौक–चौराहों, चाय की दुकानों और सोशल मीडिया की गलियों में इन दिनों एक ही सवाल गूंज रहा है— यह सवाल किसी व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी का नहीं है, न ही किसी चाय दुकान की अफवाह भर। यह सवाल सिस्टम से जुड़ा है।

सवाल सीधा है—

नक्सलियों से जुड़ी खुफिया

जानकारी लीक करने की आरोपी डीएसपी कल्पना वर्मा को आखिर कौन बचा रहा है?यह सवाल इसलिए नहीं उठ रहा कि कोई अफवाह उड़ रही है,

यह सवाल इसलिए उठ

रहा है क्योंकि सिस्टम का तराजू एक तरफ झुका हुआ साफ़ दिख रहा है। क्योंकि इसी प्रदेश में तीस हज़ार रुपये की रिश्वत लेने के आरोप में एक

पुलिस अधिकारी को तत्काल सस्पेंड कर दिया जाता है। न कोई जांच पूरी, न कोई लंबी प्रक्रिया—बस फाइल

खुली और करियर बंद

कानून ने फुर्ती

दिखाई, नैतिकता जाग गई, अनुशासन याद आ गया। मगर दूसरी तरफ़ तुला डगमगा गया

नक्सलियों से जुड़ी खुफिया

जानकारी लीक करने का गंभीर आरोप।

यानी सीधे-सीधे राज्य की सुरक्षा, सुरक्षाबलों की जान, और ऑपरेशनों की गोपनीयता से खिलवाड़। लेकिन यहाँ न फुर्ती है, न आदेश, न सस्पेंशन, न गिरफ्तारी, बस… खामोशी। और यही खामोशी अब सवाल बन चुकी है।

सिस्टम का मौन सबसे खतरनाक बयान होता है . जब सत्ता और सिस्टम चुप हो जाते हैं, तो जनता अपने निष्कर्ष खुद निकालती है। रायपुर के गलियारों में कहा जा रहा है— “मैडम के पीछे कोई बहुत ऊपर बैठा है।” “फाइल आगे बढ़ते-बढ़ते रुक जाती है।” “जांच है, पर दिखाई नहीं देती।”

यह बातें अगर झूठ हैं, तो सरकार को सामने आकर बताना चाहिए। और अगर सच हैं, तो यह सिर्फ कल्पना वर्मा का मामला नहीं, यह पूरे सिस्टम की साख का मामला है। कानून का रंग खाकी के कंधों पर क्यों बदल जाता है? एक निरीक्षक करे तो विभागीय जांच, और जब मामला डीएसपी स्तर तक पहुंचे—तो कानून अचानक संवेदनशील हो जाता है? क्या नक्सलियों को सूचना लीक करना 30 हजार की रिश्वत से कम बड़ा अपराध है? अगर नहीं, तो कार्रवाई में यह असमानता क्यों?

छत्तीसगढ़ में जब सरकार नक्सलवाद पर “जीरो टॉलरेंस” की बात करती है, तो उस नीति की परीक्षा ऐसे ही मामलों में होती है। आज अगर एक डीएसपी बच जाती है, तो कल कोई और बचेगा, और परसों सिस्टम ही कटघरे में होगा।

रायपुर पूछ रहा है— क्या वर्दी का रंग बराबरी का नहीं रहा? क्या कुर्सी की ऊँचाई तय करती है कि अपराध कितना बड़ा है? क्या “खुफिया जानकारी” का अपराध तीस हज़ार की रिश्वत से छोटा हो गया है? या फिर किसी अदृश्य छतरी के नीचे खड़ी हैं डीएसपी कल्पना वर्मा, जहाँ कानून की बारिश नहीं होती?

सिस्टम की यही दोहरी भाषा नक्सलियों को ताकत देती है और जनता के भरोसे को छलनी कर देती है।

सवाल कल्पना वर्मा

का नहीं है, सवाल उस संरक्षण तंत्र का है जो कुछ नामों को कार्रवाई से पहले ही “अछूत” बना देता है। अगर तीस हज़ार का अपराध सस्पेंशन है, तो खुफिया जानकारी लीक करना क्या है? प्रमोशन का विषय? रायपुर चुप नहीं है। चौक–चौराहे चुप नहीं हैं। और यह सवाल भी अब चुप नहीं रहेगा— आख़िर डीएसपी कल्पना वर्मा को बचा कौन रहा है?

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