रायपुर : वो बस्तर जहाँ कभी बंदूक की आवाज़ें आम थीं, आज वहाँ से बच्चों की हँसी, खेलों की गूंज और विज्ञान की प्रयोगशालाओं की चहचहाहट सुनाई दे रही है। कभी दहशत के लिए जाना जाने वाला दंतेवाड़ा, आज छत्तीसगढ़ की शिक्षा क्रांति का अग्रदूत बन गया है। और जब देश के प्रधानमंत्री 'मन की बात' के मंच से इस बदलाव की बात करते हैं, तो सिर्फ गर्व ही नहीं, उम्मीद भी सिर उठाती है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मन की बात की 122वीं कड़ी
में जब बस्तर और
दंतेवाड़ा का जिक्र किया, तो
यह केवल प्रशंसा भर नहीं थी — यह उस बदलाव की आधिकारिक मुहर थी, जो जमीन पर साकार हुआ है। उन्होंने कहा,
“दंतेवाड़ा जो कभी माओवाद का गढ़ माना
जाता था, आज वहां शिक्षा और
खेलों का परचम लहरा रहा है।” यह बात हमें केवल आंकड़ों से नहीं समझनी चाहिए,
बल्कि उन चेहरों को देखकर महसूस करनी
चाहिए जो अब भय नहीं, भरोसे
से भरे हैं।
उन्होंने दंतेवाड़ा जिले की 10वीं कक्षा में 95% से अधिक रिजल्ट की बात की, जो प्रदेश में टॉप पर रहा, तो वहीं 12वीं में भी यह जिला छठे स्थान पर आया।
ज़रा सोचिए, ये वही इलाका है जिसे
कभी देश की सबसे बड़ी समस्याओं में गिना जाता था — नक्सलवाद, पिछड़ापन, भय। लेकिन अब वहाँ विज्ञान की
प्रयोगशालाएँ हैं, बच्चे
विज्ञान को लेकर जुनूनी हैं, और
बस्तर ओलंपिक जैसे आयोजन हो रहे हैं जिनमें बंदूक नहीं, भाला और तीर चमक रहा है।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व
में छत्तीसगढ़ की सरकार ने जिस तरह से जनसहभागिता, तकनीक और संस्कृति को एकसाथ पिरोकर एक
समावेशी विकास मॉडल खड़ा किया है — वह सचमुच प्रशंसा के योग्य है। दिल्ली के अशोक
होटल में आयोजित मुख्यमंत्री परिषद की
बैठक में भी जब उन्होंने ‘बस्तर मॉडल’ का प्रजेंटेशन दिया, तो दिल्ली के अशोक होटल में मौजूद सिर्फ
मंत्री और अधिकारी नहीं, देश
के सबसे बड़े नेता — प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी — भी प्रभावित हुए। ये कोई मामूली
बात नहीं कि एक आदिवासी क्षेत्र, जिसे
कभी समस्या समझा गया, आज
समाधान का मॉडल बन चुका है।
"बस्तर ओलंपिक" और
"बस्तर पंडुम" जैसे आयोजन प्रस्तुत किए, तो सिर्फ प्रधानमंत्री ही नहीं, अन्य राज्यों के मुख्यमंत्री भी प्रभावित
हुए। बस्तर
ओलंपिक, सिर्फ
एक खेल प्रतियोगिता नहीं रही। ये एक सामाजिक क्रांति है। जब 1.65 लाख प्रतिभागी 11 पारंपरिक खेलों में शामिल होते हैं,
तो सिर्फ खेल नहीं होता — संस्कृति,
पहचान, और चेतना भी दौड़ पड़ती है। मुख्यमंत्री
ने ठीक ही कहा, “हमने
युवाओं के हाथों से बंदूकें छीनकर खेल के उपकरण थमा दिए।”

और जब पुनेन सन्ना जैसे खिलाड़ी
व्हीलचेयर दौड़ में जीतते हैं, तो
लगता है जैसे बस्तर खुद अपनी सीमाओं को पार कर रहा है। वह बस्तर जो कभी खुद को देश
से कटा हुआ मानता था, आज
राष्ट्रीय आत्मा का अभिन्न हिस्सा बन चुका है।
‘बस्तर
पंडुम’ एक और ऐसी पहल है, जिसने आदिवासी लोकजीवन को सिर्फ संजोया नहीं, मंच भी दिया। 47,000 से अधिक प्रतिभागियों, 1,743 सांस्कृतिक दलों और 2.4 करोड़ की प्रोत्साहन राशि के साथ यह
सिर्फ महोत्सव नहीं, संस्कृति
का पुनर्जागरण था। बुजुर्ग, युवा, महिलाएँ, बच्चे — सब जुड़े और बस्तर ने खुद को
फिर से परिभाषित किया।
इस सम्पूर्ण बदलाव के पीछे एक स्पष्ट
सोच है — कि सरकार की योजनाएँ सिर्फ फाइलों में न रहें, जमीनी सच्चाई में उतरें, जनभागीदारी से संवरें और संवेदनशीलता से
लागू हों।
‘अटल मॉनिटरिंग पोर्टल’ जैसे डिजिटल
उपकरण, ‘सुशासन एवं अभिसरण
विभाग’ जैसी संस्थागत संरचनाएँ, और
केंद्र की योजनाओं — जैसे उज्ज्वला, आयुष्मान, पीएम
आवास, जल जीवन मिशन — को
ग्रामसभा और जनसंवाद से जोड़कर जो काम छत्तीसगढ़ सरकार ने किया है, वो एक मॉडल बन चुका है।
मुख्यमंत्री परिषद की बैठक में कई
राज्यों को बोलने का मौका मिला, लेकिन
जब बात बस्तर मॉडल की हुई, तो
सबने माना — यही असली विकास है। ऐसा विकास जो सिर्फ जीडीपी नहीं बढ़ाता,
बल्कि समाज की आत्मा को भी उठाता है।
प्रधानमंत्री मोदी ने सही कहा — “बस्तर
ओलंपिक, बस्तर
की आत्मा का उत्सव है।”
और अगर आत्मा का उत्सव कहीं मनाया जा
रहा है, तो यकीन मानिए,
वहाँ से नया भारत बनता है।
बैठक में छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा ‘सुशासन एवं अभिसरण विभाग’ और ‘अटल मॉनिटरिंग पोर्टल’ जैसे नवाचारों की भी
चर्चा हुई, जो योजनाओं की
निगरानी और पारदर्शिता को सुनिश्चित करते हैं। यही वह "डिजिटल और
लोकतांत्रिक" मेल है, जिसकी
आज देश को सबसे अधिक जरूरत है।
प्रधानमंत्री
मोदी ने जब कहा कि "बस्तर जैसे क्षेत्रों में हो रहे बदलाव हम सबको गर्व से
भर देते हैं" — तो यह सिर्फ एक क्षेत्र की बात नहीं थी। यह भारत के हर उस कोने की आवाज़ थी,
जो अभी भी विकास की मुख्यधारा से थोड़ा
दूर है, पर उसकी क्षमता अनंत
है।
आज
सवाल सिर्फ छत्तीसगढ़ की तारीफ का नहीं है। सवाल यह है कि क्या अन्य राज्य इस
बस्तर मॉडल को अपनाने के लिए तैयार हैं? क्या बाकी देश भी यह स्वीकार करेगा कि जब योजनाएं सिर्फ कागज़
पर नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति और
जनभागीदारी के साथ लागू होती हैं — तो विकास केवल एक सरकारी शब्द नहीं, बल्कि एक
जनान्दोलन बन जाता है।
बस्तर अब सिर्फ भूगोल
नहीं, एक
संदेश है — कि जहाँ इच्छाशक्ति हो, वहाँ बदलाव असंभव नहीं। और जहाँ खेल,
संस्कृति और शिक्षा
की त्रिवेणी हो, वहाँ
भविष्य उज्ज्वल ही होता है।
अब बस्तर को देखने का नजरिया बदलिए,
क्योंकि वहाँ के बच्चे, अब सिर्फ कल का हिस्सा नहीं, आज के भारत की प्रेरणा बन चुके हैं।