नरेन्द्र पाण्डेय : भारतीय दर्शकों का सिनेमा-प्रेम किसी से छुपा नहीं है।
हमने बचपन से फ़िल्मों में सीखा है कि अगर चोर हीरो है, तो उसकी चोरी भी कला है, और पुलिस से बच निकलना तो उसकी बहादुरी। “डॉन को पकड़ना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है” — ये डायलॉग हमें इतना भाया कि असल ज़िंदगी में भी हम उसे लागू करने लगे।
आज राजनीति में भी वही पटकथा चल रही है।
नेता जी पर आरोप लगते हैं — घोटाले, दलाली, ज़मीन कब्ज़ा, हवाला… लेकिन जनमानस की प्रतिक्रिया देखिए:
“अरे भाई, क्या चालाकी है, देखो कैसे बच निकले!”
जैसे ये देश का बजट नहीं, उनकी पसंदीदा फ़िल्म का क्लाइमेक्स हो, और हीरो को आख़िर तक बचना ही चाहिए।
विडंबना यह है कि फ़िल्म में चोर का पैसा हमारा नहीं होता, इसलिए हम बिंदास ताली बजाते हैं।
लेकिन राजनीति में चोर का पैसा… हमारा ही होता है — टैक्स, सुविधा शुल्क, या फिर महंगाई के रूप में जेब से निकाला गया।
फिर भी हम उसी को हीरो बनाए बैठे हैं।
क्यों?
क्योंकि हमारे भीतर कहीं एक छुपी हुई मानसिकता पलती है —
जो सिस्टम को चकमा दे सकता है, वो काबिल है, चाहे उसने कानून तोड़ा हो।
हम उसकी ‘हुशियारी’ पर फ़िदा हो जाते हैं, भूल जाते हैं कि सिस्टम में सेंध लगने का मतलब है हमारे अधिकार, हमारे संसाधन और हमारा भविष्य खोना।
राजनीति की ये “ब्लॉकबस्टर” हर चुनाव में नया सीक्वल लेकर आती है।
हीरो वही, चोरी वही, बस मंच बदल जाता है — कभी संसद, कभी विधानसभा, कभी जनता के बीच मंच से दिया गया “भावुक भाषण”।
और दर्शक — यानी हम — अब भी टिकट खरीद कर ताली बजा रहे हैं।
शायद वक्त आ गया है कि हम ये तय करें कि हमें पर्दे पर हीरो चाहिए या संसद में।
फ़िल्म में चोर को बचाना मज़ेदार है,
लेकिन लोकतंत्र में चोर को बचाना,
हमारे भविष्य पर डकैत डालने जैसा है।